लेख

बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत और धोखाधड़ी का काला खेल, जानें कैसे खाली हो रही है एफडी?

2026 की शुरुआत में राज्यसभा में पेश सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत वाले धोखाधड़ी के मामले वित्त वर्ष 21 के 2,624 से घटकर वित्त वर्ष 25 में 1,935 रह गए।

Published by
तमाल बंद्योपाध्याय   
Last Updated- July 30, 2026 | 9:59 PM IST

एक प्रवासी भारतीय (एनआरआई) ग्राहक दो वर्ष बाद जब अपनी बैंक शाखा पहुंचीं तो उन्होंने देखा कि उनकी एक टर्म डिपॉजिट पर ‘लियन’ लगा था यानी उन्हें रकम निकालने या इधर-उधर करने की अनुमति नहीं थी। उन्हें यह देखकर काफी हैरानी हुई क्योंकि उन्होंने इस डिपॉजिट को गिरवी रखकर कर्ज नहीं लिया था बल्कि उन्होंने उस बैंक से ही कभी कोई कर्ज नहीं लिया था।

लियन किसी ग्राहक के धन या संपत्ति पर किसी बैंक का कानूनी अधिकार होता है, जिसके जरिये कर्ज की अदायगी पक्की हो जाती है। बैंक खाते पर लियन लगा हो तो उसमें पड़ी रकम का एक हिस्सा कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है। ग्राहक को खाते में वह रकम दिखाई तो देगी मगर वह उसे न तो निकाल सकता है, न ही कहीं भेज सकता है या खर्च कर सकता है।

छानबीन हुई तो उस प्रवासी ग्राहक के पैरों तले जमीन खिसक गई। यह मामूली धोखाधड़ी नहीं थी बल्कि इसमें कई बैंकों से जुड़े आपराधिक सिंडिकेट का हाथ था, जिसने कर्मचारियों की मिलीभगत, जाली दस्तावेजों, फर्जी ऋण और रियल एस्टेट सौदों का जाल बुना था। पूरा खेल उन लोगों के टर्म डिपॉजिट या फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) की गुपचुप चोरी पर टिका है, जो उसे मुश्किल से पकड़ पाएंगे जैसे सालों तक बाहर रहने वाले एनआरआई और डिजिटल बैंकिंग से नावाकिफ बुजुर्ग।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी द्वारा 2026 की शुरुआत में राज्य सभा में पेश सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2021 में बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत वाले धोखाधड़ी के 2,624 मामले दर्ज किए गए थे, जिनकी संख्या वित्त वर्ष 2025 में घटकर 1,935 रह गई। वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में ऐसे मामले और भी घटकर केवल 400 रह गए। लेकिन मामलों की संख्या घटने से यह पता नहीं चलता कि धोखाधड़ी कितनी पेचीदा है। आईआईएम बेंगलूरु के एक शोध पत्र में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि लगभग 34 प्रतिशत बैंकिंग धोखाधड़ी बैंक के कनिष्ठ और मध्य स्तर के कर्मचारी ही करते हैं। इससे बैंकों की ईमानदारी, विश्वसनीयता और प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े होते हैं।

एनआरआई के साथ हुई धोखाधड़ी इस तरह की पहली घटना नहीं है। देश में कई जगहों पर वर्षों पर ऐसा होता रहा है। मगर इस फर्जीवाड़े की शुरुआत कैसे होती है?

सबसे पहले बैंकिंग प्रणाली तक पहुंच रखने वाला कोई कर्मचारी जाली कागज इस्तेमाल कर एनआरआई के टर्म डिपॉजिट के बदले कर्ज दिखाता है। टर्म डिपॉजिट की असली रसीद दी ही नहीं जाती। इससे प्रणाली में तो उस पर लियन रहता है मगर एनआरआई ग्राहक को पता नहीं चलता। इसके बाद एक शाखा दूसरी शाखा को बचाने आती है। एनआरआई के लौटने से पहले दूसरी शाखा में किसी और के टर्म डिपॉडिट पर एक और कर्ज लिया जाता है और उस पैसे से पहला कर्ज चुका दिया जाता है। इस तरह लियन हट जाता है, सबूत खत्म हो जाता है और दूसरे खाते से नई चेक बुक जारी कर दी जाती हैं, जिसकी जानकारी खाताधारक को नहीं होती।

आखिर में अपराधियों का सिंडिकेट हरकत में आता है। शक होने पर जब कोई एनआरआई शिकायत करता है, आंतरिक जांच शुरू होती है और पैसे का लेनदेन पकड़ा जाता है तब पता चलता है कि कोई बेईमान कर्मचारी अकेले काम नहीं कर रहा था बल्कि एक ही शहर के कई बैंकों के कर्मचारी मिलकर एक दूसरे को बचाने के लिए धोखाधड़ी वाला ऋण एक जगह से दूसरी जगह घुमा रहे थे। ऋण की रकम आम तौर पर जायदाद के सौदों में इस्तेमाल की जाती है। शक होने पर जब ग्राहक पूछताछ करता है तो कोई नया कर्ज लेकर उसके खाते का ऋण खत्म कर दिया जाता है।

ऐसी वारदात बैंकिंग कारोबार में विश्वास का गलत फायदा उठाकर अंजाम दी जाती हैं। बैंक शाखाओं में कर्मचारी जमा का रीन्यूअल कर सकते हैं, एनआरआई व अन्य ग्राहकों की मदद कर सकते हैं और बुजुर्ग खाताधारकों के कागजात संभाल सकते हैं। उन पर नजर भी नहीं रखी जाती।

मैं कहानी नहीं बना रहा हूं। चेन्नई में 2025 में संगठित अपराधों की जांच करने वाली केंद्रीय अपराध शाखा ने फर्जीवाड़े और अनधिकृत निकासी से जुड़े 18 मामलों में 49 बैंक कर्मचारी गिरफ्तार किए थे, जिनमें एनआरआई की एफडी को निशाना बनाने वाले क्लर्क, कैशियर और प्रबंधक तक शामिल थे। उसी वर्ष मोहाली में एक सार्वजनिक बैंक के शाखा प्रबंधक को एक रिटायर्ड शिक्षक की एफडी गिरवी रख 93 लाख रुपये का कर्ज लेने के आरोप में पकड़ा गया। पता तब चला, जब कर्ज लिए जाने के छह महीने बाद शिक्षक यूं ही बैंक पहुंच गए। 2025 में ही कोटा में बहुत बड़े निजी बैंक का 26 साल का एक रिलेशनशिप मैनेजर पकड़ा गया, जिसने 41 ग्राहकों के 110 खातों से 4.58 करोड़ रुपये इधर-उधर कर दिए थे। इनमें ज्यादातर खाते वरिष्ठ नागरिकों के थे और यह पैसा इक्विटी डेरिवेटिव्स में लगाया गया था।

कोर बैंकिंग सॉल्यूशंस (सीबीएस) आने से पहले हिसाब-किताब हाथ से लिखा जाता था और धोखाधड़ी के सबूत मिल जाते थे जैसे अलग स्याही, गुम पर्चियां, अलग लिखावट। हर एंट्री पर कर्मचारी के दस्तखत भी होते थे। इसलिए बड़ा फर्जीवाड़ा करना मुश्किल था। लेकिन सीबीएस ने सब बदल दिया। मानवीय गलतियां खत्म करने, तत्काल लेनदेन मुमकिन बनाने और अलग-अलग शाखाओं के ग्राहकों को आसानी से जोड़ने के लिए लाई गई सीबीएस ने यह सब तो किया मगर भीतर बैठकर धोखाधड़ी करने वालों की राह भी आसान कर दी, जिसका पता रोजाना होने वाले लाखों लेनदेन के बीच नहीं लग पाता।

सीबीएस से बैंक लेन-देन तो व्यवस्थित हो गए मगर निगरानी उतनी दुरुस्त नहीं हो पाई। धोखाधड़ी के जोखिम प्रबंधन के लिए जुलाई 2024 में जारी रिजर्व बैंक के मास्टर निर्देशों में धोखाधड़ी पर नजर रखने के लिए बोर्ड की खास समितियां बनाने, आरंभिक चेतावनी प्रणाली लागू करने और महाप्रबंधक या उससे ऊपर के स्तर पर धोखाधड़ी जोखिम प्रबंधन का काम अनिवार्य कर दिया गया।

इस प्रणाली में सावधि जमा पर किसी भी लेनदेन जैसे खाता समय से पहले बंद करने, कर्ज उठाने या चेक बुक जारी करने की सूचना जमाकर्ताओं को फौरन देने वाली अनिवार्य सक्रिय सूचना प्रणाली का अभाव है। एनआरआई और वरिष्ठ नागरिकों के अधिक जोखिम वाले खातों में लियन लगाने, कर्ज देने या समय से पहले बंद करने से पहले एसएमएस या ईमेल के जरिये पुष्टि की जाए तो खतरा कम हो जाएगा।

अंदरखाना की गई धोखाधड़ी में सबसे चिंता की बात यह है कि कई बैंकों के कर्मचारी गिरोह बनाकर काम करते हैं। मौजूदा प्रणाली में किसी अकेले बेईमान कर्मचारी से तो निपटा जा सकता है मगर कई बैंकों के कर्मचारियों का गिरोह काम करे और कर्ज खत्म करने या कर्ज की रकम को वैध बनाने में अपने-अपने बैंकों का इस्तेमाल करे और इसकी खबर भी किसी को नहीं लगने दे तो क्या किया जाए।

ऐसी धोखाधड़ी का पता चलने पर क्या होता है? कई बार बैंक कर्मचारी जेल तो गए हैं मगर एक ढर्रा साफ नजर आता है। ऐसे मामले अनजाने में सामने आ जाते हैं, वसूली आधी-अधूरी होती है और जवाबदेही नहीं रहती क्योंकि बैंक अपनी साख बचाने के लिए फौजदारी मामला चलाने के बजाय चुपचाप समझौता करना पसंद करते हैं। इसे कैसे रोका जाए? इस पर अलग से लेख लिखा जा सकता है।


(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं) 

 

First Published : July 30, 2026 | 9:59 PM IST