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नीट केवल परीक्षा नहीं, सामाजिक बदलाव का माध्यम भी है

नीट में बैठने वाले विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आता है। उनके माता-पिता कम पढ़े-लिखे हैं और कम आमदनी तथा अनिश्चितता भरी नौकरी करते हैं।

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रमा बिजापुरकर   
Last Updated- July 29, 2026 | 9:45 PM IST

छात्र आंदोलनों पर तीखी सार्वजनिक बहस के दौरान इस विषय पर गंभीर, व्यापक और गहन चर्चा देखने को मिली, जो स्वागत योग्य है। जब इस आंदोलन की कमान युवाओं ने संभाली तब खास तौर पर लोगों में आलोचना के बजाय सहानुभूति ज्यादा दिखी। आजकल किसी भी मुद्दे पर लोगों को अक्सर या तो ‘भक्त’ कहकर खारिज कर दिया जाता है या ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताकर बदनाम किया जाता है, लेकिन इस बहस में ऐसा कम देखने को मिला। दूसरे कई मुद्दों की तरह यह मुद्दा समाज के किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है।

कुछ भारतीय और विदेशी टीकाकारों ने इसे ‘मध्यम वर्ग’ का आंदोलन बताया। उनका मतलब अंग्रेजी बोलने वाले उन युवाओं से था, जो आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों से आते हैं, जिनके माता-पिता शिक्षित हैं और जो प्रतिष्ठित पेशेवर डिग्री हासिल करना चाहते हैं। लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है।

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (स्नातक) यानी नीट में बैठने वाले विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा ऐसे परिवारों से आता है, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है। उनके माता-पिता कम पढ़े-लिखे हैं और कम आमदनी तथा अनिश्चितता भरी नौकरी करते हैं। इनमें से कुछ परिवारों में तो इन बच्चों से पहले किसी ने कॉलेज का मुंह ही नहीं देखा होता है। ये बच्चे नीट में बैठते हैं, जो आज केवल एमबीबीएस में दाखिले का दरवाजा नहीं रह गया है बल्कि नर्सिंग, पशु चिकित्सा, आयुष चिकित्सा, फिजियोथेरेपी और अन्य स्वास्थ्य संबंधी पाठ्यक्रमों में प्रवेश का भी प्रमुख रास्ता बन गया है।

यही वर्ग वास्तव में हसरतों से भरे भारत का बड़ा हिस्सा है। इनके सपने केवल मोबाइल फोन खरीदने, बाइक चलाने या मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं। वे मध्य वर्ग में पहुंचना चाहते हैं, ऐसी नौकरी और ऐसी डिग्री हासिल करना चाहते हैं, जिससे उन्हें नियमित आय मिले, समाज में सम्मान बढ़े और आने वाले समय में आर्थिक तथा सामाजिक उन्नति का रास्ता खुले।

केवल व्यक्तिगत अनुभवों से पूरी तस्वीर नहीं बनती लेकिन जब हम आम लोगों की कहानियां सुनते हैं तब समझ आता है कि सरकारी प्रतियोगी परीक्षाएं लोगों के लिए प्रतीकात्मक तौर पर भी इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं। इन परीक्षाओं के साथ इतनी गहरी भावनाएं और उम्मीदें क्यों जुड़ी हैं और इनका चुनावी राजनीति पर इतना असर क्यों पड़ता है।

दक्षिण भारत के बड़े शहरों में बुजुर्गों की देखभाल करने वाले कर्मचारी मुहैया कराने वाली एक लोकप्रिय एजेंसी झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के गाव-कस्बों की 20-22 वर्ष की युवतियों को काम पर रखती है। जिन युवतियों से हमारी बातचीत हुई, वे मेहनती, समझदार हैं और सीखना चाहती हैं। वे अपने घर छोड़कर पहली बार अनजाने शहरों, नई भाषाओं और अलग तरह के खानपान वाले माहौल में काम करने आती हैं। उनका मकसद इतना पैसा कमाना होता है कि बीएससी (नर्सिंग) की फीस भरी जा सके।

नीट में अच्छे अंक मिलने पर उन्हें किसी सरकारी कॉलेज में कम खर्च पर प्रवेश मिल सकता है। लेकिन अंक कम आए तो निजी कॉलेज ही बचते हैं, जहां फीस सरकारी कॉलेज की तुलना में पांच से दस गुना होती है और उसे भरना अधिकतर परिवारों के लिए कठिन होता है। उत्तर प्रदेश सरकार निजी कॉलेज में बीएससी नर्सिंग पढ़ने वालों को लगभग 20,000 रुपये सालाना छात्रवृत्ति देती है मगर इन कॉलेजों की सालाना फीस लगभग 1 लाख रुपये होती है।

पेपर लीक होने पर दोबारा परीक्षा देने की भी कीमत चुकानी पड़ती है। दोबारा परीक्षा के लिए छुट्टी लेने पर नौकरी जाने का खतरा रहता है। घर आने-जाने का खर्च अलग से उठाना पड़ता है। ऐसे में उन्हें अपने रोजगार और अपने भविष्य के सपने के बीच कठिन चुनाव करना पड़ता है।

नर्सिंग के डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी हैं, जिनमें प्रवेश के लिए नीट की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन बीएससी नर्सिंग की तुलना में इनमें रोजगार और आय की संभावना बहुत कम होती हैं। आज देश का माहौल भी बदल चुका है। पहले लोगों से कहा जाता था कि ‘जितनी औकात है उतना ही लो’, लेकिन अब युवाओं को अपनी पूरी क्षमता के साथ ऊंचे लक्ष्य हासिल करने को कहा जाता है।

लखनऊ के पास एक गांव की एक युवती का उदाहरण लें। उसके पिता मुंबई में कपड़े इस्तरी करते हैं। युवती ने बीएड की डिग्री ली और दो वर्ष तक उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (यूपीटीईटी) तथा सुपरटीईटी की तैयारी की ताकि उसे सरकारी शिक्षक की नौकरी मिल सके। निम्न आय वर्ग के अधिकांश युवाओं और युवतियों की तरह उसके लिए भी सरकारी नौकरी वरदान से कम नहीं है क्योंकि इससे नियमित आय, सुरक्षित नौकरी और समाज में सम्मानजनक मध्यमवर्गीय पहचान मिलती है। उसका भाई भी सेना में भर्ती होने के लिए दो वर्षों तक तैयारी करता रहा लेकिन भर्ती ही नहीं निकलीं। बाद में उसने सीमा सुरक्षा बल की शारीरिक और लिखित परीक्षा पास कर ली लेकिन पेपर लीक होने पर अदालत ने लिखित परीक्षा रद्द कर दी। आज वह भी अपने पिता के साथ कपड़े इस्तरी कर रहा है।

उत्तर प्रदेश का ही एक अन्य युवक स्नातक करने के बाद चार वर्षों से सरकारी नौकरी की परीक्षाएं दे रहा है। दो बार परीक्षा ही नहीं हुई और दो बार वह सफल नहीं हो पाया। उसके पिता से पूछा गया कि वे अपने बेटे को चार वर्षों तक उस नीट की तैयारी क्यों करने दे रहे हैं, जिस नीट को सोशल मीडिया पर मजाक में ‘नॉट इन एजुकेशन, इम्प्लॉयमेंट ऑर ट्रेनिंग’(न पढ़ाई में, न नौकरी में, न किसी प्रशिक्षण में) कहा जाता है। उनका जवाब था कि उनका बेटा परिवार का पहला ऐसा व्यक्ति है जो कॉलेज में पढ़ा है और वे उसके सपने पूरे करने में साथ देना चाहते हैं।

नीट और ऐसी अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं का महत्व इसलिए बहुत अधिक है क्योंकि माना जाता है कि उनमें सभी को योग्यता के आधार पर समान अवसर मिलता है। इनके जरिये कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को बेहतर बनाने और सामाजिक-आर्थिक रूप से आगे बढ़ने का अवसर हासिल कर सकता है। लेकिन जब इन परीक्षाओं की निष्पक्षता पर भरोसा टूटता है तब युवाओं और उनके माता-पिता में विश्वासघात का भाव और गहरा आक्रोश पनपता है, जो कई बार चुनाव परिणामों को भी प्रभावित कर सकता है।

निम्न आय वर्ग के युवाओं पर अपने अध्ययन ‘ड्राइवर्स ऑफ डेस्टिनी’ में हमने पाया कि युवा बेरोजगारी के लिए सरकार को सीधे जिम्मेदार नहीं मानते। इसे वे ‘बाजार’ की समस्या है। लेकिन इस मामले में योग्यता के आधार पर मिलने वाले कुछ गिने-चुने निष्पक्ष अवसर भी खत्म हो रहे हैं, जिसकी दोषी सरकार मानी जा रही है। वह इसलिए ज्यादा दोषी है क्योंकि शिक्षा में प्रवेश की व्यवस्था लगातार केंद्रीकृत होती जा रही है।

विपक्षी दलों के लिए सुझाव

यदि वे चुनावों में प्रभावी घोषणा-पत्र देना चाहते हैं तो उन्हें देश-विदेश के विशेषज्ञों और सफल मॉडल के आधार पर शिक्षा सुधार के लिए एक विश्वसनीय संस्था बनाने की पेशकश करनी होगी। उन्हें ऐसे ठोस विचार और कार्य योजनाएं लानी चाहिए, जिनसे नई शिक्षा व्यवस्था के निर्माण और उसके प्रभावी क्रियान्वयन का स्पष्ट खाका सामने आए।

भारत सरकार के लिए सुझाव

इंस्टाग्राम पर पैठ बढ़ाने से ज्यादा विश्वसनीयता शिक्षा में गहरे सुधारों से आएगी। असली महत्व उस काम का होता है जो जमीनी स्तर पर दिखाई देता है।

First Published : July 29, 2026 | 9:45 PM IST