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शहरी सहकारी बैंक: अतीत की चुनौतियों से बदलता भविष्य, RBI ने फिर खोला ऑन-टैप लाइसेंसिंग

बाइस साल के अंतराल के बाद भारतीय रिजर्व बैंक नए शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) के लिए ऑन-टैप लाइसेंसिंग का रास्ता खोलने जा रहा है

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तमाल बंद्योपाध्याय   
Last Updated- August 20, 2026 | 10:36 PM IST

बाइस साल के अंतराल के बाद भारतीय रिजर्व बैंक नए शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) के लिए ऑन-टैप लाइसेंसिंग का रास्ता खोलने जा रहा है। केंद्रीय बैंक ने इसके लिए मसौदा दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। इसका मतलब यह है कि लाइसेंस किसी निर्धारित समय वाले विंडाे की जगह हर समय लगातार दिए जाएंगे। इन मानकों के तहत पात्र विविध राज्य ऋण सहकारी समितियां जिनके पास कम से कम 10 साल के संचालन का रिकॉर्ड हो और न्यूनतम 10,000 करोड़ रुपये की जमा राशि तथा 300 करोड़ रुपये की हैसियत हो, वे यूसीबी में रूपांतरण के लिए आवेदन कर सकती हैं।

यह ऐसे समय पर हो रहा है जब रिजर्व बैंक यूसीबी के लघु वित्त बैंकों (एसएफबी) में स्वैच्छिक बदलाव को प्रोत्साहित कर रहा है। शिवालिक मर्केंटाइल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड पहला ऐसा यूसीबी है जो सफलतापूर्वक रूपांतरित हुआ। एक अन्य बड़ा यूसीबी नियामकीय बचाव अभियान के माध्यम से एसएफबी क्षेत्र में प्रवेश कर गया। घोटाले से प्रभावित पंजाब एवं महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी बैंक) का विलय कर उसे यूनिटी स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में बदल दिया गया। इतिहास पर नजर डालें तो भारत की पहली ऋण सहकारी समिति 1903 में बंगाल में स्थानीय सरकार के समर्थन से बनी थी और इसे ब्रिटिश सरकार के फ्रेंडली सोसाइटीज ऐक्ट के तहत पंजीकृत किया गया था। इसके बाद 25 मार्च, 1904 को भारत का सहकारी ऋण समिति अधिनियम लागू किया गया।

1911 तक 5,300 समितियां थीं जिनकी संयुक्त सदस्यता 3 लाख से अधिक थी। 1912 के सहकारी समिति अधिनियम ने एक औपचारिक त्रिस्तरीय संरचना पेश की: गांव स्तर पर प्राथमिक ऋण समितियां, जिला स्तर पर केंद्रीय बैंक और राज्य स्तर पर शीर्ष राज्य बैंक जो अल्पकालिक व मध्यम अवधि का ऋण प्रदान करते थे। रिजर्व बैंक की सहकारी ऋण आंदोलन में औपचारिक भागीदारी 1951 में ऑल इंडिया रूरल क्रेडिट सर्वे कमेटी की नियुक्ति के साथ गंभीरता से शुरू हुई। समिति ने व्यवस्थागत विफलताओं को स्वीकार किया और एकीकृत ग्रामीण ऋण दृष्टिकोण की वकालत की। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 1919 के मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत सहकारिता राज्य का विषय बन गई थी। 

ढांचागत बदलाव मार्च 1966 में आया जब कम से कम एक लाख रुपये की चुकता पूंजी और मुद्रा भंडार वाले सहकारी बैंकों को बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत लाया गया। इस अधिनियम में संशोधन कर रिजर्व बैंक की नियामकीय अधिकारिता सभी सहकारी बैंकों तक बढ़ा दी गई जिन्हें तब तक केवल राज्य-विशिष्ट सहकारी कानूनों के तहत ही नियंत्रित किया जाता था। इसने दोहरे नियमन की जटिल व्यवस्था कायम की। रिजर्व बैंक जहां बैंकिंग परिचालन और निगरानी करता था वहीं यूसीबी का प्रशासनिक प्रबंधन राज्य सरकारों के पास था।

 एस.एस. मराठे समिति (1991) की अनुशंसाओं के बाद रिजर्व बैंक ने यूसीबी के लाइसेंसिंग मानक शिथिल किए ताकि वित्तीय समावेशन बढ़ाया जा सके। 1993 से पहले नए यूसीबी के लिए एक जिला, एक बैंक का सिद्धांत लागू था। 1993 की नीति के बाद यह प्रतिबंध समाप्त हो गया और एक जिले में कई यूसीबी को इजाजत मिली बशर्ते कि उनके लिए बाजार मौजूद हो। अन्य बातों के अलावा नीति ने विशेष लक्षित समूहों द्वारा और उनके लिए प्रोत्साहित किए गए यूसीबी के गठन को बढ़ावा दिया। जैसे महिलाओं के सहकारी बैंक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति द्वारा प्रोत्साहित बैंक, तथा आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में ऋणदाता।

इस उदारीकरण ने तीव्र विस्तार को जन्म दिया। मई 1993 से जून 2001 के बीच रिजर्व बैंक ने कम से कम 823 नए लाइसेंस जारी किए और यूसीबी की कुल संख्या 1993 में 1,311 से बढ़कर मार्च 2004 तक लगभग 1,926 हो गई। ये आंकड़े एक अंतर्निहित अस्थिरता को उजागर करते हैं। 2001 में माधवपुरा मर्केंटाइल कोऑपरेटिव बैंक का बहुचर्चित पतन इस क्षेत्र की कमजोरियों को उजागर कर गया। परिणामस्वरूप, 2004 में रिजर्व बैंक ने नए यूसीबी लाइसेंस जारी करना पूरी तरह से निलंबित कर दिया और अपना ध्यान विस्तार से हटाकर पुनर्गठन, एकीकरण और बैलेंस शीट की सफाई पर केंद्रित कर दिया। इसके बाद परिसमापन और स्वैच्छिक विलयों के कारण भारत में परिचालन कर रहे यूसीबी की कुल संख्या मार्च 2004 में 1,926 से घटकर मार्च 2025 तक 1,457 रह गई। केवल वित्त वर्ष 25 में ही सात विलय हुए। इस प्रकार वित्त वर्ष 2005 से 2025 के बीच कुल यूसीबी विलयों की संख्या 163 हो गई। 

सदी की शुरुआत से वित्त वर्ष 26 तक 488 असफल बैंकों के जमाकर्ताओं ने डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (डीआईसीजीसी) से 18,931.40 करोड़ रुपये का दावा किया। यह रिजर्व बैंक की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है जो प्रति जमाकर्ता, प्रति बैंक 5 लाख रुपये तक की जमा राशि का बीमा करती है। कुल दावों का 98.7 फीसदी असफल सहकारी बैंकों के समाधान में गया जबकि वाणिज्यिक बैंक डीआईसीजीसी के वार्षिक बीमा प्रीमियम राजस्व का लगभग 94 फीसदी योगदान करते हैं। सहकारी बैंक ‘एक सदस्य एक वोट’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत पर आधारित हैं। 

हालांकि उन्हें राजनीतिक कब्जे से बचाने के बजाय अक्सर इसका दुरुपयोग किया गया है। प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार को छोड़ दें तो भी राज्य सरकारों ने ऐतिहासिक रूप से राज्य सहकारी अधिनियमों के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग प्रबंधन समितियों को भंग करने, चुनावों में देरी करने और बोर्डों को राजनीतिक नामांकितों से भरने के लिए किया है। फिर भी कुछ सकारात्मक उदाहरण मौजूद हैं। सारस्वत सहकारी बैंक और कॉसमॉस सहकारी बैंक जैसे ऋणदाता दिखाते हैं कि अच्छी तरह से प्रबंधित सहकारी संस्थाएं फल-फूल सकती हैं और जमाकर्ताओं की रक्षा के लिए कमजोर साथियों को भी आत्मसात कर सकती हैं। ऑन-टैप यूसीबी लाइसेंसिंग को फिर से शुरू करने का निर्णय इस बात का संकेत है कि नियामक को अब भरोसा है कि सांवि​धिक संचालन सुधारों ने पर्याप्त सुरक्षा उपाय स्थापित कर दिए हैं।

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 के माध्यम से किए गए संशोधनों ने सहकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की प्रत्यक्ष और व्यापक निगरानी के अधीन ला दिया जिसमें ऐसे संचालन, अंकेक्षण और प्रबंधन मानक लागू किए गए जो वाणिज्यिक बैंकों पर लागू होते हैं। वित्त वर्ष 25 में सभी शहरी सहकारी बैंकों की समेकित बैलेंस शीट 4.4 फीसदी बढ़कर 7.39 लाख करोड़ रुपये हो गई जिसमें ऋण 6.7 फीसदी बढ़ा जबकि जमा वृद्धि 5.2 फीसदी रही। आदर्श रूप में यूसीबी भारत की ग्रामीण और कस्बाई आबादी को आखिरी छोर का वित्तीय संपर्क प्रदान करते हैं। अब यह इस क्षेत्र पर निर्भर है कि वह साबित करे कि वह नियामक के विश्वास के योग्य है।


 (लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक में वरिष्ठ सलाहकार हैं।)

First Published : August 20, 2026 | 10:36 PM IST