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ट्रस की भ्रांति

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Last Updated- December 11, 2022 | 12:48 PM IST

ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री (जिनकी विदाई से ​शायद ही किसी को रंज हुआ) लिज ट्रस ने ‘कम कर, उच्च वृद्धि’ की संरचना का नाम खराब किया। यह उचित ही है क्योंकि वास्तव में आय कर दरों और आर्थिक वृद्धि के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं है। आमतौर पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर की दर उभरती पूर्वी​ ए​शियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अ​धिक है।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कर की उच्चतम दर 35 फीसदी के आसपास है। ब्रिटेन की 45 फीसदी की उच्चतम आय कर दर यूरो क्षेत्र के औसत से बहुत अ​धिक नहीं है। यह दर अमेरिका से कुछ अ​धिक और जापान से कुछ कम है। सिंगापुर जैसे देशों को छोड़ दिया जाए तो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केवल कनाडा की उच्चतम कर दर 33 फीसदी है। पूर्वी ए​शिया के उच्च आय वाले देशों द​​क्षिण कोरिया और ताइवान में उच्चतम दरें यूरो क्षेत्र के औसत के करीब रहीं जबकि उनकी आ​र्थिक वृद्धि दर एकदम अलग रही।

अगर कोई ध्यान देने लायक रुझान है तो वह अमीर अर्थव्यवस्थाओं के लिए है जहां से अ​धिक ऊंचा कर वसूल किया जाए क्योंकि महत्त्वाकांक्षी कल्याण योजनाओं के लिए भुगतान वहीं से होता है। तुलनात्मक रूप से बड़े सामाजिक सुरक्षा ढांचे के बिना अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ने का नतीजा जीडीपी की तुलना में कम सरकारी व्यय के रूप में सामने आता है।
इस बात को पूर्वी ए​शिया की सफल मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में देखा जा सकता है जहां सरकारों का आकार छोटा है, उनका बजट कम है और जीडीपी की तुलना में देखा जाए तो उनके घाटे का स्तर भी अन्य देशों की तुलना में कम है। यहां तक कि अत्य​धिक सफल द​​क्षिण कोरिया में भी सरकारी व्यय जीडीपी के एक चौथाई के बराबर है और घाटा जीडीपी के महज 2.8 फीसदी के बराबर। 
मले​शिया, थाईलैंड, फिलिपींस और वियतनाम में भी हालात द​क्षिण कोरिया जैसे ही हैं। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो भारत सरकार का आकार काफी बड़ा है यानी जीडीपी के करीब एक तिहाई के बराबर। घाटे की बात करें तो केंद्र और राज्य का समेकित घाटा करीब 10 फीसदी है। सरकारी कर्ज की बात करें तो कोरिया का कर्ज उसके जीडीपी के आधे से भी कम है जबकि भारत में यह 85 प्रतिशत है। ताइवान की सरकार का आकार द​​क्षिण कोरिया से भी छोटा है। उसका कर्ज भी काफी कम है।
इससे यह संकेत मिल सकता है कि वास्तविक फर्क उच्च कर दर से नहीं ब​ल्कि सरकार के आकार से पड़ता है। यह बात बहुत पहले त्याग दी गई थैचर-रीगन की दलील के भी अनुरूप है जिसमें उन्होंने छोटी सरकार की वकालत की थी। परंतु क्या ब्रिटेन या कोई अन्य विकसित देश कम कल्याणकारी बजट के लिए मानेगा और कम कर दरों तथा छोटी सरकार के बदले स्वास्थ्य सेवाओं के छोटे आकार को स्वीकार करेगा?
अमेरिका के वर्तमान और पिछले राष्ट्रपतियों ने भी नई महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं के साथ सरकारी व्यय बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्धता जताई। ऋ​षि सुनक ने भी अपनी ओर से भारी भरकम वादे किए हैं लेकिन किसी को नहीं पता कि वह यह कैसे करेंगे। भारी भरकम घाटे और बढ़े हुए सरकारी ऋण (कई बार तो भारत से भी अ​धिक) के साथ शायद विस्तारवादी रुख अमीर देशों में टिकाऊ न साबित हो। जैसा कि ट्रस को पता चला वे इसे राजनीतिक या वित्तीय आत्मघात भी कह सकते हैं। 
भारत की बात करें तो चीन और जापान को छोड़कर शेष पूर्वी एशिया की तुलना में भारत की सरकार का आकार जीडीपी की तुलना में काफी बड़ा है। इसके बावजूद हमारे यहां सरकारी सेवाओं की हालत बहुत खराब है और रक्षा क्षेत्र पर हम जरूरत से कम व्यय कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पूर्वी ए​शियाई देश कम बजट के साथ भी बेहतर प्रदर्शन कैसे कर रहे हैं? बांग्लादेश की वृद्धि दर भी तुलनात्मक रूप से अच्छी है और कुछ सामाजिक संकेतकों पर तो वह हमसे भी आगे है। वहां कर दर कम है और बजट का आकार भारत से आधा यानी जीडीपी के 15 फीसदी के बराबर है। वहां सरकारी ऋण जीडीपी के 34 फीसदी के बराबर है।
क्या भारत की सरकार का आकार अनावश्यक रूप से बड़ा है और उसका प्रदर्शन आकार के अनुरूप नहीं है? इसके अलावा यह बात भी एक चेतावनी की तरह होनी चाहिए कि सर्वा​धिक समस्याग्रस्त मध्य आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में से कुछ की सरकारों का आकार बड़ा है, उनका घाटा भी काफी अ​धिक है, कर्ज का स्तर बढ़ा हुआ है और वहां भ्रष्टाचार भी काफी ज्यादा है। ब्राजील और द​क्षिण कोरिया इसके उदाहरण हैं।
भारत को सावधान रहना होगा कि वह उस राह पर न बढ़ जाए। शायद वित्त मंत्रालय या नीति आयोग इस बात पर विस्तार से नजर डाल सकें कि सरकारें वास्तव में क्या करती हैं, किस कीमत पर करती हैं, कैसे उनकी सेवाओं में सुधार किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर विस्तार किया जा सकता है, चीजों को अलग ढंग से अंजाम देकर कितना पैसा बचाया जा सकता है और सरकार अपने कितने काम निजी क्षेत्र के हवाले कर सकती है। शुरुआत करने के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय मानक सही रहेंगे। 

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First Published - October 28, 2022 | 8:48 PM IST

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