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शीर्ष पदों पर नियुक्ति में अनिश्चय की परंपरा

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Last Updated- December 15, 2022 | 3:13 AM IST

कल्पना कीजिए कि आप तीन वर्षों से एक कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) हैं और एक दिन कंपनी के प्रवर्तक आपसे कहते हैं कि आप उसी पद के लिए साक्षात्कार में शामिल हों। इस बार आपके साथ आपके कुछ वरिष्ठ सहयोगी भी प्रतिस्पर्धी के रूप में उसमें शामिल होंगे। दरअसल देश के सबसे बड़े बैंक के चेयरमैन से यही करने को कहा गया है।
द इकनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक बैंक बोर्ड ब्यूरो ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन रजनीश कुमार से कहा है कि वह उस पद को भरने के लिए साक्षात्कार दें जिसे वह अक्टूबर में खाली करेंगे। इस दौरान उन तीन प्रबंध निदेशकों का भी साक्षात्कार लिया जाएगा जो अभी उन्हें रिपोर्ट करते हैं। यदि ऐसा निजी क्षेत्र में होता तो संदेश एकदम स्पष्ट होता: प्रवर्तक चाहते हैं कि सीईओ पद छोड़ दें।
परंतु सरकारी कंपनियां और बैंक अपने आप में अनूठे हैं। कुमार के मामले में इस पूरे घटनाक्रम का अर्थ एकदम उलट है। हर किसी को यही लग रहा है कि सरकार उन्हें पुरस्कृत करते हुए सेवा विस्तार देगी। यदि ऐसा है तो बाकी तीनों लोग शायद केवल इसलिए साक्षात्कार प्रक्रिया में शामिल होंगे ताकि कोई प्रक्रियागत कमी न रह जाए। यह तो चारों प्रत्याशियों के साथ ज्यादती होगी।
कुमार करीब तीन वर्ष से देश के सबसे बड़े बैंक के चेयरमैन हैं और उनके सेवा विस्तार का निर्णय केवल उनके अब तक के प्रदर्शन के आधार पर ही किया जाना चाहिए। कुमार खामोश हैं लेकिन चर्चा यही है कि वह अब तक इस विषय पर अपना मन नहीं बना पाए हैं। सेबी के पूर्व अध्यक्ष एम दामोदरन को भी ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ा था जब उनसे कहा गया था कि वह उस पद के लिए साक्षात्कार दें जिस पर वह पहले से काबिज थे। दामोदरन ने साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया।
एसबीआई का मामला इसलिए भी अधिक जिज्ञासा का है क्योंकि सरकार ने महज एक महीने पहले जब एक अन्य सरकारी बैंक के मुखिया का कार्यकाल बढ़ाया तो उसने यह तरीका नहीं अपनाया था। इतना ही नहीं कुमार की पूर्ववर्ती अरुंधती भट्टाचार्य को भी एक वर्ष का सेवा विस्तार देते समय साक्षात्कार से नहीं गुजरना पड़ा था। आखिर नियम तो सबके लिए एक समान ही होने चाहिए।
परंतु शायद यह मांग कुछ ज्यादा ही है। सरकारें एक ही समय पर अलग-अलग बैंक के लिए अलग-अलग नियम का पालन करती रही हैं। अवशिष्ट सेवा प्रावधानों को मर्जी से निरस्त किया जाता रहा है, नए प्रावधान लागू किए जाते रहे हैं, समूची प्रक्रिया में पक्षपात और छेड़छाड़ की अटकलों की गुंजाइश बनी रही है।
यह मनमानापन नया नहीं है। भट्टाचार्य को भी एसबीआई चेयरमैन बनने के पहले इसका सामना करना पड़ा था। सरकार ने उनके नाम की घोषणा, उनके पूर्ववर्ती की सेवानिवृत्ति के एक सप्ताह बाद की थी। यह मनमानापन और कम कार्यावधि भी एक वजह है जिसके चलते अधिकांश सरकारी बैंकों के मुखिया अपनी छाप नहीं छोड़ पाए। उनमें से अनेक ने शुरुआती कुछ तिमाहियां यह साबित करने में खपा दीं कि उनके पूर्ववर्ती फंसे हुए कर्ज का बोझ छोड़ गए थे जिसे साफ करना आवश्यक था। यह विडंबना ही है कि जब उनकी सेवानिवृत्ति करीब आई तो उन्होंने भी फंसे कर्ज के मामले में वही कदम उठाया जो पूर्ववर्तियों ने उठाया था।
मनमाने कामकाज का एक उदाहरण सेबी के मौजूदा अध्यक्ष अजय त्यागी के सेवा विस्तार में देखा जा सकता है। सरकार ने पहले उन्हें पांच वर्ष का कार्यकाल दिया। नियुक्ति देते समय इसे घटाकर तीन वर्ष कर दिया गया। इस वर्ष के आरंभ में उसमें छह महीने का इजाफा किया गया। जब यह बढ़ी हुई अवधि समाप्त होने को थी तब अचानक 18 महीने का और विस्तार कर दिया गया। इस तरह त्यागी का कुल कार्यकाल पांच वर्ष होगा लेकिन इसमें दो विस्तार शामिल हैं। क्या बाजार नियामक के साथ ऐसे पेश आना चाहिए?
हालात ऐसे भले ही नहीं हों लेकिन कई सरकारी कंपनियों में ऐसा कुप्रबंधन आमतौर पर देखने को मिलता है। ओएनजीसी के स्वर्गीय चेयरमैन सुबीर राहा के कार्यकाल और उनके उत्तराधिकारी का नाम तय करने के दौरान सामने आया भ्रम इसका उदाहरण है। वह सेवानिवृत्ति की उम्र से कम थे लेकिन उन्हें कार्यकाल के आखिरी दिन बताया गया कि उनका कार्यकाल समाप्त हो गया है। दिलचस्प बात है कि उनके सेवा विस्तार को कैबिनेट सचिव और पेट्रोलियम सचिव दोनों का समर्थन हासिल था। परंतु विभागीय मंत्री जिनसे उनका सार्वजनिक विवाद था, ने ऐसा नहीं किया।
एसबीआई के पूर्व चेयरमैन पी जी काकोडकर की सन 2006 में प्रकाशित पुस्तक ‘माई 40 इयर्स विद एसबीआई’ में उन्होंने एक सरकारी बैंक के चेयरमैन के जीवन के बारे में विस्तार से लिखा है। उनकेपूर्ववर्ती की सेवानिवृत्ति के एक महीने बाद एक शनिवार को उनके पास फोन आया कि उन्हें तत्काल चेयरमैन का पद संभालना है। उन्होंने कहा कि पहले ही काफी देर हो गई है और बैंक बंद हो गया होगा क्योंकि शनिवार को आधे दिन ही काम होता है, तो उनसे कहा गया कि संबंधित लोगों को सूचित कर दिया गया है और वे बैंक में उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मार्च 1997 में कार्यकाल के आखिरी दिन यानी 31 मार्च तक उन्हें नहीं पता था कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। कार्यालय से बाहर निकलने से ऐन पहले मंत्रालय की ओर से उनसे कहा गया कि वह अपने सहकर्मियों को बता दें कि एम एस वर्मा उनके उत्तराधिकारी होंगे। उनसे यह भी कहा गया कि वह मीडिया से इस बारे में बात न करें क्योंकि फाइल पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर होने बाकी थे। कुछ परंपराएं हमेशा बरकरार रहती हैं।

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First Published - August 19, 2020 | 11:38 PM IST

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