प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
पिछले महीने जारी हुई नीति आयोग की रिपोर्ट ‘रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत ऐट 2047’ यानी ‘2047 के विकसित भारत के लिए कौशल की नए सिरे से परिकल्पना’ अपने शीर्षक के अनुरूप और बेहतर हो सकती थी। रीइमेजिनिंग का तात्पर्य है उन बातों को स्पर्श करना और प्रश्न करना जिन पर अब तक प्रश्न नहीं उठाए गए हैं। यह केवल मौजूदा मशीनी प्रक्रियाओं को सुधारने या परिचालन व्यवस्था को उन्नत करने की बात नहीं है बल्कि ढांचे और मूल सवालों को हल करने की बात है। इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर एकदम अलग समाधान भी तैयार किया जा सकता है।
रिपोर्ट ने खोज, पहुंच, वहनीयता, इंटर्नशिप और प्रमाणन जैसी चीजों में सुधार की पेशकश की है। फिर भी यह एक ऐसी फैक्ट्री जैसी लगती है जिसे दक्षता, पैमाने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए पुनः डिजाइन किया गया है बिना यह पूछे कि जो उत्पाद यह तैयार कर रही है उन्हें मूल रूप से अलग होना चाहिए या नहीं और क्या यह फैक्ट्री उन्हें बना सकती है या बनाना चाहिए।
रिपोर्ट ने युवाओं से मौजूदा कौशल प्रणाली की समस्याओं पर बात की और ग्राहकों की बात सुनी लेकिन यह सवाल कि मौजूदा पेशकश में क्या सही या गलत लगता है, यह प्रश्न अभी भी उत्पाद केंद्रित है न कि उपभोक्ता केंद्रित।
नए सिरे से परिकल्पित कौशल-विकास व्यवस्था का निर्माण काम की बदलती दुनिया को केंद्र में रखकर किया जाना चाहिए। मसलन आर्टिफिशल इंटेलिजेंस उद्योग की बेतहाशा वृद्धि के परिणामस्वरूप हजारों की संख्या में इलेक्ट्रीशियन और बढ़ई भर्ती किए जा रहे हैं।
जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित एक हालिया लेख में यह अनुमान दिया गया कि 2030 तक स्वायत्त एआई मानव-सहायता प्राप्त देखभाल से आगे निकल सकता है और यह भी कि निर्णय-प्रक्रिया में मनुष्यों को बनाए रखना, एआई के प्रदर्शन में बाधा डाल सकता है। यहां तक कि समानुभूति के मामले में भी जिसे आमतौर पर मनुष्य का आखिरी मजबूत पक्ष माना जाता है। लेख के अनुसार चैटबॉट इसमें मनुष्यों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
भविष्य लगातार आकार ले रहा है। उसकी रूपरेखा का अनुमान लगाना कठिन है और कौशल की मांग की हर नई लहर का जीवनकाल भी संभवतः छोटा होने वाला है। इसलिए वास्तव में नए सिरे से कल्पना करने का अर्थ ऐसे ‘मेटा सिस्टम’ की संरचना तैयार करना है जो लगातार हो रहे बदलावों को पहचान सके उन्हें समझ सके और उनके अनुरूप लगातार प्रतिक्रिया दे सके।
रिपोर्ट की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह ‘उद्योग’ नाम की चीज पर बहुत अधिक निर्भर करती है। यह उद्योग पाठ्यक्रमों को सह-डिजाइन करेगा, अप्रेंटिसशिप का स्वामित्व संभालेगा, प्लेसमेंट उपलब्ध कराएगा और इसी तरह की अन्य भूमिकाएं निभाएगा। लेकिन ‘उद्योग’ को बड़े कारोबारी समूहों और संगठित क्षेत्र की उन कंपनियों के रूप में देखने की धारणा जो बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करती हैं, अब अप्रासंगिक हो चुकी है। आज ऐसे उद्योग में कार्यबल का केवल एक बहुत छोटा हिस्सा ही रोजगार पाता है। यह मानकर चलना कि 2047 तक स्थिति उलट जाएगी जोखिम भरा हो सकता है।
नए सिरे से कल्पना करने में यह सवाल शामिल है कि आज उद्योग क्या है और क्या वह वे सभी भूमिकाएं निभा सकता है जिनकी अपेक्षा यह रिपोर्ट उससे करती है? क्या छोटे और मझोले उपक्रम जो आज भारत में सबसे बड़े नियोक्ता हैं, वही उद्योग बन सकते हैं जो इन अपेक्षाओं को पूरा करे? इसकी संभावना कम है जब तक कि उन्हें इस भूमिका को निभाने में सक्षम और इच्छुक बनाने के लिए कुछ नए सिरे से कल्पना न की जाए।
बैंकों को शिक्षा ऋण अधिक आसानी से और बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने के लिए कैसे तैयार किया जा सकता है इस पर नए सिरे से विचार करना बेहद उपयोगी होता। हां, आजीवन सीखने के लिए वाउचर भविष्य में मुफ्त खाद्यान्न की तरह एक नया सार्वभौमिक सहारा बन सकते हैं।
कौशल-विकास संस्थाओं को उनके प्लेसमेंट के आधार पर वित्तपोषित करने की सिफारिश चिंताजनक है। वास्तव में लक्ष्य तो ऐसे उच्चस्तरीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों का निर्माण होना चाहिए जो बदलती दुनिया के लिए उच्च गुणवत्ता वाले ‘उत्पाद’ यानी लोगों को तैयार करने, उन्हें प्रभावी ढंग से शिक्षा-प्रशिक्षण देने और अपनी व्यवस्था को लगातार बदलती जरूरतों के अनुरूप ढालने में सक्षम हों।
रिपोर्ट जिस परिणामोन्मुखी व्यवस्था की वकालत करती है उसका अर्थ यह होना चाहिए कि संस्थानों को अनुदान ऐसे संस्थागत मानकों के आधार पर दिया जाए जो शिक्षा के लिए अधिक उपयुक्त हैं न कि प्लेसमेंट के आधार पर जो किसी बिक्री एजेंसी के लिए तो अधिक उपयुक्त हो सकता है और जिसमें हेराफेरी की आशंका भी रहती है। शिक्षा मंत्रालय पहले ही ऐसे गुणवत्ता मानकों पर काम कर चुका है।
रिपोर्ट में अन्य देशों का भी संदर्भ दिया गया है लेकिन उनसे चुनिंदा चीजें ही ली गई हैं। अमेरिका में भी व्यावसायिक शिक्षा को लेकर विमर्श बदल रहा है। दिलचस्प बात यह है कि वहां स्नातक डिग्री हासिल कर चुके उन लोगों के लिए भी अनुदान उपलब्ध हैं, जो दोबारा प्रशिक्षण लेकर अपना कौशल बदलना चाहते हैं। भारत के लिए यह बेहद प्रासंगिक और आसानी से अपनाया जा सकने वाला उपाय है।
इससे कौशल-विकास को मुख्य धारा में लाने का लक्ष्य भी हासिल हो सकता है और पारंपरिक कॉलेज शिक्षा तथा कौशल विकास के बीच मौजूद उस कथित पदानुक्रम या वर्ग-व्यवस्था को कमजोर किया जा सकता है, जिसका उल्लेख रिपोर्ट स्वयं करती है।
यह पूरी दुनिया में एक आम समस्या है और जर्मनी दोनों व्यवस्थाओं के बीच अधिक समानता स्थापित करके इससे निपटने की कोशिश कर रहा है।
शायद कौशल-विकास शब्द को ही नए सिरे से परिभाषित करने पर विचार करना चाहिए। अमेरिका और जर्मनी दोनों ही अपने-अपने संदर्भ में शिक्षा शब्द को शामिल करते हैं। क्रमशः करियर और तकनीकी शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण और शिक्षा। क्या कौशल शब्द में बहुत अधिक राजनीतिक पूंजी निवेश हो चुकी है? या फिर क्या कौशल विकास मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय से अलग अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखनी चाहिए?
आज हमारे पास कौशल विकास की मौजूदा व्यवस्था के इंजन की काफी हद तक अच्छी दोबारा इंजीनियरिंग और ट्यूनिंग हो चुकी है। अब हम उस वास्तविक नई परिकल्पना का इंतजार कर रहे हैं यानी मानव विकास के क्षेत्र में हमारे 1991 के क्षण का।
(लेखिका ग्राहक आधारित कारोबार रणनीति के क्षेत्र में कारोबारी सलाहकार हैं)