प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
जानकारी के मुताबिक देश का अग्रणी स्टॉक एक्सचेंज नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) कानूनों के मुताबिक कामकाज करने में नाकाम रहने के पुराने आरोप भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के साथ निपटाने जा रहा है। इसके लिए एनएसई 1,800 करोड़ रुपये चुकाएगा।
एक तरह से यह विनियमित संस्था और उसके वैधानिक नियामक के बीच निपटारा है। लेकिन अहम बात यह है कि इसमें दो ऐसी संस्थाएं शामिल हैं, जो वैधानिक नियामकीय काम करती हैं। प्रस्तावित प्रतिभूति बाजार संहिता के लिहाज से यह और भी अहम हो जाती है। इस संहिता में स्टॉक एक्सचेंजों को बाजार बुनियादी ढांचा संस्थाओं (एमआईआई) का दर्जा दिया जाएगा और उन्हें नियामक जैसी भूमिका सौंपी जाएगी।
नियामकीय विफलता पर जुर्माना भुगतना अब एमआईआई के लिए आम बात हो गई है, चाहे निपटारे में भरें या न्यायिक फैसले से। कभी-कभी इनके साथ गैर-मौद्रिक बंदिशें भी लगती हैं। इससे नीतिगत प्राथमिकता पता चलती है: अधिकार खत्म करने जैसे गंभीर प्रणालीगत कदम अक्सर अव्यावहारिक होते हैं क्योंकि नियामकीय बाधाएं भी होती हैं और प्रणाली पर इसके बड़े नतीजे भी होते हैं। ऐसे दंड से आंतरिक शासन और अनुपालन प्रोत्साहन पर असर पड़ सकता है मगर उनका निवारक प्रभाव स्पष्ट नहीं है, विशेषकर तब जब वित्तीय बोझ अंततः एमआईआई के शेयरधारकों और व्यापक बाजार के निवेशकों पर पड़ता है । यह वही समूह हैं जिनकी सुरक्षा नियामकीय ढांचा करना चाहता है।
यह एक गहरी बुनियादी चिंता को जन्म देता है और वह है जवाबदेही में विषमता। आर्थिक कानून जिम्मेदारियों को राज्य के विभिन्न अंगों (मंत्रालयों, नियामकों, न्यायिक संस्थाओं) और निजी प्रतिभागियों के बीच बांटते हैं जिनमें कंपनियां और व्यक्ति शामिल हैं। लेकिन जवाबदेही की व्यवस्था असमानता भरी हैं। निजी प्रतिभागी एक घनी व्यवस्था में काम करते हैं, जिसमें उल्लंघन और दंड को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। इसके उलट राज्य के अंगों के लिए जवाबदेही अधिक बिखरी हुई होती है और उसमें नियामकीय विफलता पर सीधे या विफलता के अनुपात में कार्यवाही की गुंजाइश हमेशा नहीं होती।
प्रतिभूति कानून में यह साफ तौर पर पता चलता है। अधिनियम और उसके विनियमों में निजी संस्थाओं द्वारा उल्लंघन एवं दंड की सूची सावधानी के साथ बनाई गई है और सूची से बाहर के उल्लंघनों के लिए भी एक प्रावाधान है। लेकिन इनमें वैधानिक कार्य करने में नियामक की नाकामी जैसे निर्णय लेने में देर या तय मियाद के भीतर कार्रवाई नहीं करने पर कदम उठाने वाला उसी तरह का कोई ढांचा नहीं है। न ही वे सार्वजिनक संस्थाओं की चूक पर कानूनी नियमों तथा नतीजों की उसी तरह की व्यवस्था प्रदान करते हैं। विभिन्न क्षेत्रीय व्यवस्थाओं में भी ऐसा ही देखा जा सकता है, जहां निजी प्रतिभागियों के लिए अनुपालन की लंबी-चौड़ी व्यवस्था है मगर सार्वजनिक संस्थाओं की चूक पर कार्रवाई के लिए व्यवस्था अपरिपक्व हैं।
व्यावहारिक स्तर पर इससे असंतुलन उत्पन्न होता है। उल्लंघनों का आकलन उनके स्वरूप या प्रभाव से नहीं किया जाता बल्कि इस बात से किया जाता है कि उल्लंघन किया किसने है। एमआईआई और सेबी दोनों ही सौंपे गए नियामकीय कार्य करते हैं जिनमें अक्सर अंतर नहीं किया जा सकता। फिर भी उनकी जवाबदेही में बुनियादी फर्क होता है। जब एमआईआई जैसी कोई निजी संस्था चूक करती है तो परिणाम तयशुदा और प्रत्याशित होते हैं। लेकिन जब कोई उसी भूमिका में कोई नियामक या सार्वजनिक संस्था विफल होती है तो परिणाम परोक्ष और विवेकाधीन माध्यमों से आते हैं, जैसे न्यायिक हस्तक्षेप या ऑडिट के नतीजे। अदालतों ने कभी-कभी राज्य एजेंसियों पर जुर्माने लगाए हैं या मुआवजा देने को कहा है, लेकिन ऐसे नतीजे वैधानिक व्यवस्था से नहीं बल्कि खास मामलों में आते हैं, जिन्हें अक्सर अपील करने पर कम या रद्द कर दिया जाता है।
राज्य की संस्थाओं पर मौद्रिक या निजी देनदारी थोपने के खिलाफ पारंपरिक आपत्ति निराधार नहीं हैं। सरकारी विभागों पर वित्तीय दंड से सार्वजनिक धन का आवंटन नए तरीके से हो सकता है मगर सार्थक तरीके से निवारण नहीं होता, जबकि संस्थागत नाकामी के लिए निजी दंड पहले से ही बंदिश भरे माहौल में फैसले लेने से रोक सकता है। कई विफलताएं व्यक्तिगत कदाचार के बजाय प्रणालीगत या नीतिगत बंदिशों से उत्पन्न होती हैं।
फिर भी इन चिंताओं के कारण सब कुछ रोक देना ठीक नहीं है। वित्त, दूरसंचार और बुनियादी ढांचा जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक संस्थाएं देर या चूक कर दें तो बाजार तथा नागरिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। उदाहरण के लिए न्यायिक संस्थाएं ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत मंजूरी में देर करें तो समाधान के नतीजे में विलंब हो सकता है बेशक बाजार प्रतिभागी अपनी भूमिका ठीक से निभाएं। जिस व्यवस्था में नाकामी के ऐसे जोखिमों के लिए ठीक से इंतजाम नहीं किए गए हों वह समूचे नियामकीय अनुशासन को कमजोर कर सकता है।
प्रवर्तन व्यवस्थाएं संस्थागत भूमिकाओं के साथ विकसित होती हैं। स्टॉक एक्सचेंज दशकों तक बिना औपचारिक दंड व्यवस्था के चलते रहे। उन्हें 2019 में विधायी परिवर्तनों के जरिये जुर्माने के दायरे में लाया गया। इस परिवर्तन के जरिये माना गया कि चूंकि एक्सचेंजों की बड़ी नियामकीय जिम्मेदारी हैं, इसलिए जवाबदेही की व्यवस्था भी गहरी होनी चाहिए। ऐसी ही व्यवस्था अब बाजार अर्थव्यवस्था में इसी तरह के काम कर रही राज्य संस्थाओं के लिए भी जरूरी है।
इसलिए सरकारी और निजी संस्थाओं के लिए एक जैसा बरताव जरूरी नहीं है बल्कि सुसंगत और अनुपात में जवाबदेही की व्यवस्था जरूरी है, जो काम के साथ विकसित होता जाएगा। ऐसी व्यवस्था राज्य अधिकारियों द्वारा नियामकीय या प्रशासनिक विफलताओं की श्रेणी तय कर सकती है, प्रणालीगत कमियों और व्यक्तिगत कदाचार के बीच अंतर कर सकती है और संतुलित परिणाम तय कर सकती है। परिणामों में संस्थागत सुधार उपाय एवं पूरक उपाय से लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई तक कुछ भी हो सकता है। जहां किसी व्यक्ति का दोष स्पष्ट हो और जानबूझकर किया गया हो तो जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराना चाहिए।
यहां सुरक्षा के उपाय महत्त्वपूर्ण हैं। वैधानिक सीमाओं के भीतर सद्भावना से किए गए कार्यों को स्पष्ट प्रावधानों के जरिये सुरक्षा दी जानी चाहिए। जवाबदेही वहां बने, जहां स्पष्ट नाकामी हो। यह नाकामी भी परिभाषित मानकों जैसे दुर्भावना, गंभीर लापरवाही या वैधानिक जिम्मेदारियों की जानबूझकर अवहेलना पर खरी उतरनी चाहिए न कि उन परिणामों पर, जो नीतियों की या संसाधनों की कमी के कारण आए हैं।
पारदर्शिता इसमें पूरक भूमिका निभा सकती है। कानून सरकारी विभागों एवं एजेंसियों और निजी प्रतिभागियों पर लगाए गए जुर्मानों एवं प्रतिकूल बातों को समय-समय पर सार्वजनिक करने के लिए कह सकता है। ऐसी जानकारी को स्पष्ट और सुलभ तरीके से साझा करने पर नागरिक अनुपालन तथा संस्थागत प्रदर्शन के तरीकों को ठीक से समझ पाएंगे। इससे चुनावी पसंद भी प्रभावित हो सकती हैं और मतदाता ऐसी सरकारों का समर्थन कर सकते हैं, जिन पर कम दंड लगे हों। यह अधिक प्रभावी और वैध प्रशासन का संकेत है। समय के साथ यह प्रणालीगत सुधारों को भी प्रेरित कर सकता है और दंड की व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर हुए बगैर जिम्मेदारी की संस्कृति को ताकत दे सकता है।
इस प्रकार की व्यवस्था में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में जिम्मेदारी को जवाबदेही के साथ जोड़ा जा सकेगा। इससे संस्थागत स्वायत्तता बनी रहेगी और यह भी सुनिश्चित होगा कि राज्य या नियामकीय काम करने वाली संस्थाएं सार्वजनिक शक्तियों का इस्तेमाल करेंतो नाकामी की सूरत में उन्हें तय दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ें। ऐसी समानता के बिना कानून के समक्ष समानता का वादा अधूरा रहेगा। इसे व्यवहार में लागू करने से नियामकीय अनुशासन मजबूत होगा, संस्थागत वैधता बढ़ेगी और एक सरल सिद्धांत की पुष्टि होगी कि जवाबदेही को अधिकार के साथ कदमताल करनी चाहिए और कानून उन सभी पर लागू होना चाहिए, जो इसका इस्तेमाल करते हैं।
(लेखक विधिक पेशेवर हैं और उन्होंने सेबी के लिए कार्य किया है। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं)