प्रतीकात्मक तस्वीर
जनवरी में टिकटॉक विवाद को सुलझाने का डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन का निर्णय आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के युग में डेटा संप्रभुता के विरोधाभास को उजागर करता है। उस निर्णय ने अमेरिकी कांग्रेस और सर्वोच्च न्यायालय दोनों द्वारा समर्थित रुख को पलट दिया। हालांकि बाइटडांस ने अपनी हिस्सेदारी निर्धारित सीमा से कम कर दी और अमेरिकी उपयोगकर्ताओं का डेटा ऑरेकल के क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर में स्थानांतरित कर दिया गया, फिर भी उसने टिकटॉक के अनुशंसा एल्गोरिद्म पर नियंत्रण बनाए रखा, जो यह निर्धारित करता है कि अमेरिकी क्या देखते हैं, वे कितनी देर तक जुड़े रहते हैं और उनके व्यवहार को किस तरह से आकार मिलता है।
इस समझौते से डेटा के भंडारण का स्थान तो बदल गया, लेकिन उससे जानकारी निकालने वाले व्यक्ति पर कोई असर नहीं पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि एक बार किसी विदेशी प्लेटफॉर्म के किसी राष्ट्र के समाज में गहराई से समाहित हो जाने के बाद डिजिटल संप्रभुता को पुनः प्राप्त करना कितना कठिन हो जाता है।
टिकटॉक प्रकरण डेटा के लिए चल रही एक व्यापक वैश्विक प्रतिस्पर्धा की झलक दिखाता है, जिसके परिणाम हमारे समय की किसी भी सैन्य प्रतिद्वंद्विता के समान महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। विशाल डेटासेट का उपयोग करने वाले राष्ट्र एआई प्रणालियों के विकास में निर्णायक बढ़त हासिल करेंगे जो अर्थव्यवस्थाओं और समाजों को आकार देती हैं। लेकिन दांव केवल एआई तक ही सीमित नहीं हैं। जनसंख्या-स्तरीय व्यवहार संबंधी डेटा तक पहुंच रखने वाली कोई विदेशी खुफिया एजेंसी सामाजिक विभाजन और व्यवहार संबंधी कमजोरियों की पहचान कर सकती है, जिससे सोशल इंजीनियरिंग हमले कहीं अधिक प्रभावी हो जाते हैं।
वैश्विक डेटा परिदृश्य के दो अलग-अलग स्तर हैं। पहला है अमेरिका-चीन का एकाधिकार। दूसरा स्तर उन मध्यम शक्तियों का है जो एकाधिकार पर अपनी निर्भरता कम करते हुए डेटा संप्रभुता रणनीतियों को मजबूत करने का प्रयास कर रही हैं। अन्य देश संप्रभु विकल्पों के लिए आवश्यक निवेश विकसित करना अभी शुरू ही कर रहे हैं।
पिछले एक दशक में चीन ने डेटा को एक रणनीतिक संपत्ति में बदल दिया है। इसने भूमि, श्रम, पूंजी और प्रौद्योगिकी के अतिरिक्त डेटा को उत्पादन के पांचवें कारक के रूप में मान्यता दी है, राष्ट्रीय डेटा प्रशासन की स्थापना की है और डेटा की कुछ श्रेणियों को कंपनियों की बैलेंस शीट में संपत्ति के रूप में मान्यता देने की अनुमति दी है। इसके साइबर सुरक्षा और व्यक्तिगत सूचना संरक्षण कानून डेटा के स्थानीयकरण के माध्यम से संप्रभु नियंत्रण को मजबूत करते हैं, जबकि राष्ट्रीय खुफिया कानून राज्य को डेटा तक पहुंच प्रदान करता है।
चीन के विपरीत, अमेरिका ने बाजार-आधारित नवाचार के माध्यम से डेटा के क्षेत्र में अपनी बढ़त बनाई है। अमेरिकी कंपनियां क्लाउड कंप्यूटिंग, ऑपरेटिंग सिस्टम और सोशल मीडिया पर अपना दबदबा बनाए हुए हैं, जिनके माध्यम से दुनिया की अधिकांश डिजिटल गतिविधियां संचालित होती हैं। हालांकि, इसका रणनीतिक प्रभाव समान है: वैश्विक डेटा जिस बुनियादी ढांचे पर मौजूद है, उस पर नियंत्रण।
क्लाउड ऐक्ट के तहत अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपने नियंत्रण में मौजूद डेटा, चाहे वह भौतिक रूप से कहीं भी संग्रहीत हो, अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि डेटा संप्रभुता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि डेटा कहां स्थित है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि प्लेटफॉर्म को कौन नियंत्रित करता है।
विदेशी डिजिटल अवसंरचना पर दीर्घकालिक निर्भरता आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम पैदा करती है, जिसकी वजह से देश डेटा संप्रभुता के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण अपना रहे हैं। इससे चार महत्त्वपूर्ण बातें सामने आती हैं। पहली, डेटा संप्रभुता अब केवल नियामक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक मुद्दा बन गई है। दूसरी, एक बार विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म गहराई से स्थापित हो जाने पर संप्रभुता को पुनः प्राप्त करना कठिन हो जाता है। तीसरी, केवल डेटा का स्थानीयकरण ही पर्याप्त नहीं है; डेटा से जानकारी निकालने वाले एल्गोरिदम पर नियंत्रण भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। अंत में, प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है और कार्रवाई करने का समय अब आ गया है।
भारत, जिसे विश्व का सबसे बड़ा डेटा उत्पादक माना जा सकता है, अमेरिकी प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक का भुगतान प्रणालियों के लिए 2018 का डेटा स्थानीयकरण निर्देश और डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने की योजनाएं वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े रहते हुए डिजिटल संप्रभुता को मजबूत करने के देश के दृढ़ संकल्प को दर्शाती हैं। डीपीडीपी अधिनियम, 2023, गोपनीयता, संप्रभु निगरानी और अंतरराष्ट्रीय डेटा प्रवाह को संतुलित करते हुए एक सुविचारित दृष्टिकोण अपनाता है। भा
रत का सबसे मौलिक योगदान डेटा सशक्तीकरण एवं संरक्षण आर्किटेक्चर/अकाउंट एग्रीगेटर (डीईपीए) ढांचा है। पारंपरिक प्लेटफार्म मॉडल के विपरीत, जहां कंपनियां उपयोगकर्ता डेटा से उत्पन्न अधिकांश आर्थिक मूल्य पर कब्जा कर लेती हैं, डीईपीए व्यक्तियों को वित्तीय या अन्य लाभ प्राप्त करने के लिए अपने डेटा को सुरक्षित रूप से साझा करने में सक्षम बनाता है। सिलिकॉन वैली ने डेटा का मुद्रीकरण करने वाले प्लेटफॉर्म बनाए, यूरोप ने डेटा पर अधिकारों को मजबूत किया और चीन ने राज्य के नेतृत्व वाले डेटा पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया। भारत ने एक ऐसे मॉडल का नेतृत्व किया है जहां व्यक्ति अपने डेटा को नियंत्रित करते हैं।
पहले से ही अपनाए जा रहे उपायों के अलावा, भारत डेटा संप्रभुता को मजबूत करने के लिए पांच-स्तंभ वाली रणनीति अपना सकता है। उसे स्वदेशी एआई मॉडल और कंप्यूटिंग क्षमताओं का निर्माण करके इंटेलिजेंस संप्रभुता को आगे बढ़ाना चाहिए, यह मानते हुए कि एआई युग में, इंटेलिजेंस पर नियंत्रण उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि डेटा पर नियंत्रण। उसे जोखिम-आधारित ढांचे के तहत रणनीतिक डेटासेट को वर्गीकृत करना चाहिए और उनमें अलग-अलग सुरक्षा उपाय लागू करने चाहिए। डीईपीए का विस्तार वित्त क्षेत्र से आगे बढ़कर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों तक किया जाना चाहिए।
भारत को क्लाउड, एआई, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर को शामिल करते हुए एक संप्रभु डिजिटल प्रौद्योगिकी स्टैक भी विकसित करना चाहिए। अंत में, वह अपने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना स्टैक का लाभ उठाते हुए, डेटा प्रवाह, एआई शासन और डिजिटल वाणिज्य के लिए विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय साझेदारी बनाने में वैश्विक नेतृत्व कर सकता है।
डेटा के लिए प्रतिस्पर्धा अभी शुरू ही हुई है। जो लोग केवल डेटा उत्पन्न करते हैं, वे किसी और के भविष्य को बढ़ावा देंगे। जो लोग इसे नियंत्रित करते हैं, वे अपना भविष्य खुद तय करेंगे।
(लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष और पूर्व रक्षा सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)