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क्विक कॉमर्स में एमेजॉन और फ्लिपकार्ट की एंट्री से मचा हड़कंप, वितरकों ने FDI नियमों पर उठाए सवाल

एमेजॉन और फ्लिपकार्ट के क्विक कॉमर्स में उतरने से पारंपरिक एफएमसीजी वितरकों ने एफडीआई नीति के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए वाणिज्य मंत्रालय से समीक्षा की मांग की है

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शार्लीन डिसूजा   
उदिशा श्रीवास्तव   
Last Updated- July 07, 2026 | 10:49 PM IST

हाल ही में ई-कॉमर्स की बड़ी कंपनियों एमेजॉन और फ्लिपकार्ट के क्विक कॉमर्स में उतरने से एफएमसीजी के पारंपरिक वितरकों में चिंता बढ़ गई है। वितरकों के संगठन ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय को पत्र लिखकर यह समीक्षा करने की मांग की है कि क्या विदेशी निवेश वाली ई-कॉमर्स कंपनियां मौजूदा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति के तहत वैध रूप से इन्वेंट्री-आधारित क्विक कॉमर्स मॉडल चला सकती हैं।

अ​खिल भारतीय उपभोक्ता उत्पाद वितरक महासंघ ने अपने पत्र में उस बदलाव, स्पष्टीकरण या मंजूरी के बारे में जानकारी मांगी है, जिसके तहत एमेजॉन और फ्लिपकार्ट जैसी विदेशी फंडिंग वाली मार्केटप्लेस ई-कॉमर्स कंपनियों को गोदामों या डार्क स्टोर के जरिये क्विक कॉमर्स संचालित करने की अनुमति मिलती है।

पत्र में कहा गया है, ‘समेकित एफडीआई नीति, खास तौर पैराग्राफ 5.2.15.2 और डीपीआईआईटी प्रेस नोट 2 (2018 सीरीज) के अनुसार ई-कॉमर्स के मार्केटप्लेस मॉडल में ही 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत है जबकि ई-कॉमर्स के इन्वेंट्री आधारित मॉडल में एफडीआई पर रोक है।’

संगठन ने कहा है कि मौजूदा क्विक कॉमर्स मॉडल ऐसे गोदाम या डार्क स्टोर के नेटवर्क के जरिये काम करता है जो ग्राहकों से लगभग 3 से 5 किलोमीटर के दायरे में होते हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने इस पत्र को देखा है। इसमें कहा गया है, ‘असल में ये डार्क स्टोर केंद्रीय रूप से संचालित होते हैं, जहां इन्वेंट्री प्लानिंग, भंडारण, मूल्य निर्धारण, प्रमोशनल योजना, छूट, लॉजिस्टिक और ग्राहक अनुभव को प्लेटफॉर्म के जरिये ही सीधे तौर पर नियंत्रित किया जाता है।’

इस बारे में जानकारी के लिए फ्लिपकार्ट और एमेजॉन को ईमेल किया गया मगर खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं आया।

हालांकि एक बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी के वरिष्ठ कार्या​धिकारी ने 2022 में सरकार द्वारा उठाए गए नीतिगत कदमों का जिक्र किया। उस साल सरकार ने कहा था कि खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए स्वत: मार्ग के तहत 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी गई है। साथ ही भारत में बने खाद्य उत्पादों की खुदरा बिक्री (जिसमें ई-कॉमर्स के जरिये होने वाली बिक्री भी शामिल है) के लिए सरकारी मंजूरी वाले मार्ग से 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत दी गई थी।

मद्रास उच्च न्यायालय के वकील के नरसिम्हन ने कहा, ‘भारत सरकार ने फूड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति दी है लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि खाद्य उत्पाद भारत में ही बने होने चाहिए। यह छूट वै​श्विक रिटेलरों और फूड कंपनियों को भारत में पूरी तरह से अपने स्वामित्व वाले फूड रिटेल संचालन शुरू करने की इजातज देती है, बशर्ते वे ऐसे उत्पादों की बिक्री करें जो देश में बने हों।’

वितरकों के संगठन ने सरकार से उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण, व्यापार संघों, वितरकों और उपभोक्ता प्रतिनिधियों को मिलाकर एक उच्च-स्तरीय समिति गठित करने का आग्रह किया गया है ताकि प्रतिस्पर्धा, रोजगार, निवेश, उपभोक्ता कल्याण और भारत के खुदरा पारिस्थितिकी तंत्र पर क्विक कॉमर्स के दीर्घकालिक प्रभाव का व्यापक अध्ययन किया जा सके।

पत्र में कहा गया है, ‘लगभग 1.4 करोड़ खुदरा विक्रेताओं, 4.5 लाख वितरकों और भारत के खुदरा व्यापार पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से निर्भर करोड़ों नागरिकों की आजीविका की रक्षा करते हुए, निष्पक्ष, पारदर्शी और समान अवसर को बनाए रखने के लिए आवश्यक नीतिगत और नियामक उपाय करें।’

वितरकों के निकाय ने कहा कि खुदरा और वितरक समुदाय में चिंता है और बताया कि हाल के वर्षों में डिजिटल कॉमर्स प्लेटफॉर्मों के बढ़ते दबाव के कारण बड़ी संख्या में खुदरा विक्रेताओं को अपना कारोबार बंद करना पड़ा है।

संगठन ने पत्र में कहा है, ‘यदि विदेशी निवेश वाली मार्केटप्लेस कंपनियों को इन्वेंट्री-नियंत्रित मॉडल का उपयोग करके क्विक कॉमर्स में प्रवेश करने की अनुमति दी जाती है तो रोजगार, उद्यमिता और छोटे व्यवसायों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है।’

इसमें कहा गया है कि भारी छूट, आक्रामक मूल्य निर्धारण और आक्रामक प्रचार अभियानों के लिए बड़ी रकम खर्च करने के चलन ने पारंपरिक खुदरा क्षेत्र को बाधित कर दिया है।

First Published : July 7, 2026 | 10:49 PM IST