प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
जब दो लोग एक ही कंपनी में, एक ही पद पर काम कर रहे हों और दोनों के बैंक खाते में हर महीने एक जैसी सैलरी आती हो, तो पहली नजर में यही लगता है कि दोनों की आर्थिक स्थिति बिल्कुल एक समान है। लेकिन जब यही दोनों लोग बैंक में लोन के लिए अप्लाई करते हैं, तो अक्सर नतीजे हैरान करने वाले होते हैं। एक को जहां आसानी से बड़ा लोन मिल जाता है, वहीं दूसरे का आवेदन या तो खारिज हो जाता है या फिर उसे बहुत कम लोन और महंगी ब्याज दरों पर संतोष करना पड़ता है।
इसको लेकर आम लोगों के मन में यह सवाल हमेशा उठता है कि जब कमाई बराबर है, तो बैंक का पैमाना अलग क्यों हो जाता है? आइए एक्सपर्ट के माध्यम से समझते हैं कि इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं।
FincFriends के CEO आर्टेम एंड्रीव का कहना है कि सिर्फ सैलरी देखकर लेंडर्स को इतना ही पता चलता है कि आप हर महीने कितना कमाते हैं। लेकिन इससे यह नहीं पता चलता कि बाकी खर्चों के बाद आपके पास नए लोन की EMI चुकाने के लिए कितने पैसे बचेंगे या आपने पहले लिए गए लोन को समय पर और जिम्मेदारी से चुकाया है या नहीं।
आर्टेम एंड्रीव कहते हैं, “मान लीजिए दो लोगों की सैलरी एक जैसी है, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति बिल्कुल अलग हो सकती है। एक व्यक्ति पहले से ही तीन लोन की EMI भर रहा हो और उसके क्रेडिट कार्ड का बिल भी काफी ज्यादा आता हो। वहीं, दूसरे व्यक्ति पर न कोई पुराना लोन हो और न ही किसी तरह की दूसरी आर्थिक जिम्मेदारी। ऐसे में दोनों की लोन चुकाने की क्षमता एक जैसी नहीं मानी जा सकती।”
एंड्रीव के मुताबिक, यही वजह है कि बैंक और दूसरे संस्थान सिर्फ आपकी सैलरी नहीं देखते। वे यह भी जांचते हैं कि आपकी हर महीने की कमाई का कितना हिस्सा पहले से ही EMI, लोन या दूसरी आर्थिक जिम्मेदारियों में जा रहा है। इसे फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेशियो (FOIR) कहा जाता है।
FOIR से बैंक यह समझते हैं कि सभी जरूरी खर्चों और पुरानी किस्तों के बाद आपके पास नए लोन की EMI चुकाने की कितनी क्षमता बचती है। इसी आधार पर वे तय करते हैं कि आपको कितना लोन दिया जा सकता है।
नियमों के अनुसार, किसी भी बैंक या रेगुलेटेड लेंडर को लोन देने से पहले यह जांचना होता है कि ग्राहक नई EMI आराम से चुका पाएगा या नहीं। यही वजह है कि अगर दो लोगों की सैलरी बराबर भी हो, लेकिन एक पर पहले से ज्यादा लोन या दूसरी आर्थिक जिम्मेदारियां हों, तो दोनों को मिलने वाली लोन की रकम अलग-अलग हो सकती है।
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इस विषय पर True Balance के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) सौम्यजीत घोष का कहना है कि सिर्फ सैलरी के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति लोन चुकाने में कितना सक्षम है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि वह अपनी कमाई का इस्तेमाल और पैसों को कैसे मैनेज करता है।
घोष का कहना है कि बैंक और लेंडर्स सिर्फ यह नहीं देखते कि आपकी सैलरी कितनी है। वे यह भी जांचते हैं कि हर महीने घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और दूसरी जरूरी जिम्मेदारियां निभाने के बाद आपके पास कितने पैसे बचते हैं। इसके अलावा आपकी उम्र, नौकरी या बिजनेस कितना स्थिर है, आप क्या काम करते हैं और लोन किस मकसद से ले रहे हैं, ये सभी बातें भी तय करती हैं कि आपको कितना लोन मिल सकता है।
सौम्यजीत घोष का कहना है कि अब लोन देने का तरीका पहले जैसा नहीं रहा। आज के समय में लेंडर्स सिर्फ आपकी मौजूदा सैलरी देखकर फैसला नहीं लेते, बल्कि यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि भविष्य में आपकी लोन चुकाने की क्षमता कितनी मजबूत रहेगी।
इसके लिए वे आपके क्रेडिट स्कोर (जैसे CIBIL), बैंकिंग हिस्ट्री और डिजिटल फाइनेंशियल रिकॉर्ड जैसी कई बातों को साथ में देखते हैं। उनका मकसद सिर्फ यह तय करना नहीं होता कि आपको आज लोन दिया जाए या नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होता है कि आप पूरी लोन अवधि के दौरान बिना ज्यादा आर्थिक दबाव के हर महीने अपनी EMI समय पर चुका सकें।
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आर्टेम एंड्रीव का कहना है कि अब लोन के मामले में हर ग्राहक के लिए एक जैसे नियम नहीं होते। आज ज्यादातर बैंक और NBFC रिस्क-बेस्ड प्राइसिंग अपनाते हैं। यानी आपको किस ब्याज दर पर लोन मिलेगा, यह आपकी ‘फाइनेंशियल प्रोफाइल’ और रिस्क के स्तर पर निर्भर करता है।
यही बात लोन की रकम और अवधि पर भी लागू होती है। अगर आप पहली बार लोन ले रहे हैं और आपका कोई पुराना क्रेडिट रिकॉर्ड नहीं है, तो बैंक जोखिम कम रखने के लिए आपको कम रकम या कम अवधि का लोन दे सकते हैं। वहीं, जिन लोगों का क्रेडिट रिकॉर्ड अच्छा होता है, उन्हें अक्सर ज्यादा रकम, लंबी अवधि और बेहतर ब्याज दर पर लोन मिलने की संभावना रहती है।
इसके अलावा, RBI के नियमों के मुताबिक हर बैंक और लेंडर को लोन देने से पहले ब्याज दर, सभी शुल्क और एनुअल परसेंटेज रेट (APR) जैसी जरूरी जानकारी की फैक्ट स्टेटमेंट (KFS) में साफ-साफ बतानी होती है, ताकि ग्राहक पूरी जानकारी के साथ फैसला ले सके।
सौम्यजीत घोष का कहना है कि अब लोन देने की प्रक्रिया को ज्यादा सटीक बनाने में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) अहम भूमिका निभा रहा है। AI आधारित अंडरराइटिंग और रिस्क सिस्टम पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा स्मार्ट हो गए हैं।
ये सिस्टम रियल टाइम में ग्राहक के सैकड़ों तरह के आर्थिक और दूसरे जरूरी डेटा का विश्लेषण करते हैं। इससे बैंक यह बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि कोई व्यक्ति किसी अस्थायी आर्थिक परेशानी की वजह से पेमेंट करने में दिक्कत झेल रहा है या फिर उसकी आदत ही समय पर लोन नहीं चुकाने की है। इसी आधार पर लोन से जुड़ा फैसला ज्यादा सटीक तरीके से लिया जाता है।
इस तकनीक का एक बड़ा फायदा यह भी है कि जिन लोगों की कोई पुरानी क्रेडिट हिस्ट्री नहीं होती, उनके लिए भी लोन लेना आसान हो जाता है। यही वजह है कि आज एक जैसी सैलरी पाने वाले दो लोगों को भी उनकी अलग-अलग ‘फाइनेंशियल प्रोफाइल’ और जोखिम के आधार पर अलग-अलग शर्तों पर लोन मिल सकता है।
आर्टेम एंड्रीव का कहना है कि अगर आप भविष्य में कम ब्याज दर पर और बेहतर शर्तों के साथ लोन पाना चाहते हैं, तो अच्छी आर्थिक आदतें अपनाना बेहद जरूरी है। इसके लिए सबसे पहले अपने सभी लोन की EMI और क्रेडिट कार्ड के बिल हमेशा समय पर चुकाएं, क्योंकि आपका पेमेंट रिकॉर्ड ही आपके क्रेडिट स्कोर पर सबसे ज्यादा असर डालता है।
इसके अलावा, कोशिश करें कि क्रेडिट कार्ड की पूरी लिमिट का इस्तेमाल न करें। अगर आप हमेशा पूरी लिमिट खर्च करते हैं, तो बैंक इसे आर्थिक दबाव का संकेत मान सकते हैं। नया लोन लेने से पहले छोटे-मोटे पुराने लोन निपटा देना भी फायदेमंद रहता है। इससे आपका FOIR बेहतर होता है और बैंक आपको ज्यादा रकम का लोन देने के लिए तैयार हो सकते हैं।
साथ ही, अपनी आय और आर्थिक जानकारी को पूरी तरह पारदर्शी और सही रखें। इसके लिए अकाउंट एग्रीगेटर (Account Aggregator) फ्रेमवर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे आपकी जानकारी सुरक्षित तरीके से साझा होती है और लोन की प्रक्रिया भी आसान और तेज हो जाती है।
सौम्यजीत घोष का भी मानना है कि मजबूत क्रेडिट प्रोफाइल एक दिन में नहीं बनती। इसके लिए लंबे समय तक अच्छी आर्थिक आदतें बनाए रखना जरूरी होता है।
उनके मुताबिक, कम समय में कई बैंकों या लेंडर्स के पास बार-बार लोन के लिए आवेदन करने से बचना चाहिए। हर आवेदन के साथ होने वाली हार्ड इंक्वायरी आपके क्रेडिट स्कोर पर बुरा असर डाल सकती है। इसके अलावा, नौकरी या आय में स्थिरता बनाए रखना और समय-समय पर अपनी क्रेडिट रिपोर्ट जांचते रहना भी जरूरी है, ताकि अगर उसमें कोई गलती हो तो उसे समय रहते ठीक कराया जा सके।
घोष का कहना है कि आज के दौर में लोन सिर्फ आपकी सैलरी के आधार पर नहीं मिलता। बैंक आपके पूरे आर्थिक हिसाब-किताब व्यवहार को देखते हैं। इसलिए सिर्फ कमाई बढ़ाने पर नहीं, बल्कि समय पर पेमेंट करने और पैसों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने जैसी अच्छी आर्थिक आदतों पर भी ध्यान देना चाहिए। यही बातें आपको बैंकों की नजर में एक भरोसेमंद व्यक्ति बनाती हैं।