प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) को लेकर जारी बहस के बीच सरकार ने 2027 से स्नातक स्तर की मेडिकल प्रवेश परीक्षा को वर्तमान कागज और कलम यानी ऑफलाइन प्रणाली के बजाय कंप्यूटर आधारित प्रारूप में आयोजित करने का निर्णय लिया है। इसे एक महत्त्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। इस कदम का उद्देश्य प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं के बाद परीक्षा की सुरक्षा को मजबूत करना, पारदर्शिता बढ़ाना और लोगों का भरोसा बहाल करना है।
ये सभी पहलू इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की वैधता उसकी सुरक्षा और विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। ऐसी परीक्षा पर उन लाखों छात्रों का भरोसा होना चाहिए जिनका भविष्य उसके परिणामों पर टिका होता है।
हर वर्ष सीमित संख्या वाली मेडिकल सीटों के लिए लाखों छात्र-छात्राएं नीट के माध्यम से प्रतिस्पर्धा करते हैं। यह देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक है इसलिए इसकी विश्वसनीयता भारत की पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
कलम और कागज से कंप्यूटर-आधारित परीक्षा की ओर बदलाव परीक्षा की तैयारी की प्रकृति को ही बदल देता है। डिजिटल इंटरफेस पर नेविगेट करने की आदत, स्क्रीन पर प्रश्नों की समीक्षा करना, इलेक्ट्रॉनिक रूप से समय प्रबंधन करना और परीक्षा के दबाव में आत्मविश्वास के साथ जवाब देना आदि सभी कौशल केवल बार-बार अभ्यास से ही विकसित होते हैं। इन्हें अचानक हासिल नहीं किया जा सकता। ये धीरे-धीरे अवसरों के माध्यम से बनते हैं। एक बार परीक्षा डिजिटल हो जाने पर, कंप्यूटर तक पहुंच तैयारी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है।
इस बदलाव की सफलता परीक्षा प्रणाली की तत्परता पर भी निर्भर करती है। यह सही है कि कई प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाएं पहले से ही कंप्यूटर-आधारित प्रारूप में आयोजित की जाती हैं लेकिन नीट सबसे बड़ी परीक्षा होगी जो यह बदलाव करेगी और इसके लिए कई दिनों में कई पालियों में काम करने की आवश्यकता हो सकती है।
इससे यह चुनौती पैदा होती है कि विभिन्न सत्रों में प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर को तुलनीय कैसे रखा जाए और बाद में अंकों का उचित सामान्यीकरण कैसे किया जाए। जहां ये प्रशासनिक और लॉजिस्टिक चुनौतियां परीक्षा की ईमानदारी बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं वहीं अधिक बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या हर अभ्यर्थी को डिजिटल परीक्षा की तैयारी का समान अवसर मिला है।
हाल ही में एनसीएईआर-क्वांटम हब रिपोर्ट (भारत मानव विकास सर्वेक्षण, आईएचडीएस-3, 2022-24 तथा गांगुली एवं अन्य, 2026) से प्राप्त साक्ष्य दर्शाते हैं कि शहरी-ग्रामीण विभाजन में प्रौद्योगिकी स्वामित्व में बड़ी खाई मौजूद है।
ग्रामीण परिवारों में केवल 4.7 फीसदी के पास डेस्कटॉप कंप्यूटर या लैपटॉप है जबकि शहरी परिवारों में यह अनुपात 14.9 फीसदी है। आर्थिक समूहों में भी डिजिटल विभाजन उतना ही स्पष्ट है। सबसे गरीब परिवारों में कंप्यूटर या लैपटॉप का स्वामित्व केवल 1.2 फीसदी है जबकि सबसे अमीर परिवारों में यह 23.1 फीसदी तक पहुंचता है। कुछ छात्रों के लिए घर पर कंप्यूटर-आधारित मॉक टेस्ट उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा होंगे लेकिन कई अन्य छात्रों के लिए अभी कंप्यूटर ही पहुंच से बाहर रहेंगे।
कंप्यूटर या लैपटॉप का मालिक होना समस्या का केवल एक हिस्सा है। डिजिटल तैयारी भी उतनी ही असमान है। आईएचडीएस-3 के आंकड़े बताते हैं कि 18-30 वर्ष आयु वर्ग के केवल 32.4 फीसदी पुरुष और 19.1 फीसदी महिलाएं ही कंप्यूटर चलाना जानती थीं।
जिनके पास घर पर कंप्यूटर है वे डिजिटल इंटरफेस में बिना किसी अतिरिक्त लागत के परिचित होने, गति और आत्मविश्वास कायम करने का अनुचित लाभ उठा सकते हैं। जिन छात्रों के पास घर पर कंप्यूटर नहीं है वे डिवाइस खरीदकर, कोचिंग संस्थानों में दाखिला लेकर या निजी कंप्यूटर केंद्रों का उपयोग करके इसकी भरपाई कर सकते हैं, अगर वे ऐसा करने में सक्षम हैं। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के छात्रों के लिए यह अतिरिक्त शैक्षिक लागत थोप सकता है।
इस प्रकार वे अपेक्षाकृत संपन्न और शहरी छात्रों की तुलना में पिछड़ सकते हैं। जो छात्र कंप्यूटर से परिचित हैं वे परीक्षा इंटरफेस को समान रूप से सक्षम लेकिन सीमित अनुभव वाले छात्रों की तुलना में अधिक गति, सहजता और आत्मविश्वास के साथ निभा ले जाने की संभावना रखते हैं।
हर तकनीकी सुधार में बदलाव की एक लागत होती है और ये लागत शायद ही कभी समान रूप से वितरित होती है। इसलिए डिजिटल तैयारी में निरंतर निवेश कंप्यूटर-आधारित परीक्षण की ओर संक्रमण के साथ-साथ होना चाहिए।
सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर प्रयोगशालाओं का विस्तार करना, मुफ्त कंप्यूटर-आधारित मॉक परीक्षाएं उपलब्ध कराना, जिला स्तर पर डिजिटल अभ्यास केंद्र स्थापित करना और छात्रों के परीक्षा हॉल तक पहुंचने से पहले ही कंप्यूटर साक्षरता को मजबूत करना आदि कुछ ऐसे कदम हो सकते हैं जो समान अवसर प्रदान करने के लिए उठाए जा सकते हैं।
ये निवेश यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि कंप्यूटर-आधारित परीक्षण की ओर बदलाव निष्पक्ष बना रहे न केवल नीट के लिए बल्कि उन सभी उच्चस्तरीय परीक्षाओं के लिए जो इस प्रारूप को अपनाती हैं।
कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं को अपनाने की दिशा में बढ़ना अनिवार्य और वांछनीय दोनों है। लेकिन डिजिटल परीक्षाओं की ओर बदलाव के साथ तैयारी के लिए समान अवसर भी होने चाहिए।
जैसे ही नीट डिजिटल युग में प्रवेश करता है यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हर छात्र-छात्रा चाहे उसका भौगोलिक स्थान या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, नई व्यवस्था के अनुरूप होने का समान अवसर पाए। कंप्यूटर-आधारित परीक्षण परीक्षा को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बना सकता है। तैयारी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना इसे निष्पक्ष भी बनाएगा। भारत को दोनों की आवश्यकता है।
(लेखिका एनसीएईआर-नैशनल डेटा इनोवेशन सेंटर में एसोसिएट फेलो हैं। ये उनके निजी विचार हैं)