संशोधित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) श्रृंखला के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 24, वित्त वर्ष25 और वित्त वर्ष 26 में क्रमशः 7.2 फीसदी, 7.1 फीसदी और 7.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। यह वास्तव में बहुत अच्छा प्रदर्शन है। विशेषकर उस वातावरण में जो यूक्रेन संघर्ष, पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में ऊंची ब्याज दरों और ट्रंप टैरिफ से प्रभावित था। अमेरिका द्वारा भारत के अधिकांश निर्यात पर 50 फीसदी से अधिक की शुल्क दर लगाने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी गति से आगे बढ़ती रही।
करीब 3 फीसदी की अत्यंत नरम मुद्रास्फीति दर के साथ ऐसा लगा कि भारत कठिन वैश्विक वातावरण में भी 7 फीसदी के वृद्धि पथ पर स्थिर हो गया है। परंतु ईरान में संघर्ष छिड़ने के बाद (जो अब दो सप्ताह के लिए रुका हुआ है) इन अपेक्षाओं के कमजोर पड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
इस परिदृश्य में सबसे अस्थिर करने वाला तत्व रुपये की विनिमय दर में गिरावट है। यह गिरावट ईरान संघर्ष से पहले शुरू हुई थी। संघर्ष ने केवल एक अंतर्निहित प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। फरवरी 2025 से फरवरी 2026 की अवधि में रुपये की नॉमिनल प्रभावी विनिमय दर 8.5 फीसदी और वास्तविक प्रभावी विनिमय दर 8.1 फीसदी (व्यापार-भारित 40 मुद्रा बास्केट) गिर गई है। बाद वाला रिजर्व बैंक के 5 फीसदी के सहज क्षेत्र से काफी अधिक है।
7 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर, 3 फीसदी से कम की मुद्रास्फीति दर और 0.8 फीसदी का चालू खाता घाटा इस स्तर की गिरावट को उचित नहीं ठहराते। यह गिरावट पूरी तरह से पूंजी प्रवाह से संबंधित है। वित्त वर्ष 26 में लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) बाहर गया है। यह किसी भी वर्ष में अब तक की सबसे बड़ी एफपीआई निकासी है। यह कोविड प्रभावित वर्ष 2021-22 में हुए लगभग 1.22 लाख करोड़ रुपये की निकासी से भी अधिक है।
आज वृद्धि का परिदृश्य जितना सकारात्मक है, वर्ष 2021-22 में उतना नहीं था। उस समय मुद्रास्फीति दर 5.5 फीसदी थी। बैंकिंग प्रणाली काफी दबाव में थी। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) का पलायन पूरी तरह से समझ में आता था। अब भला एफआईआई क्यों ऐसी अर्थव्यवस्था से बाहर निकलना चाहेंगे जो 7 फीसदी से अधिक की दर से बढ़ रही हो, जहां मुद्रास्फीति 3 फीसदी हो और बैंकिंग प्रणाली के संकेतक अत्यंत अनुकूल हों? यह माना गया कि ट्रंप द्वारा दंडात्मक शुल्क लगाए जाने के कारण विदेशी निवेशक बाहर गए। कहा गया कि एफआईआई ने अमेरिकी प्रशासन के भारत के प्रति रुख को अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक कारण माना। यह एक जोखिम था जिसने भारत में निवेश बनाए रखने के विरुद्ध तर्क दिया।
शुल्क का मुद्दा फरवरी 2026 में हुए भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते से सुलझ गया। उसी महीने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की शुल्क व्यवस्था को खारिज कर दिया। फिलहाल, भारत अन्य सभी देशों की तरह अमेरिका को अपने निर्यात पर 10 फीसदी शुल्क दे रहा है। अब यह नहीं कहा जा सकता कि शुल्क कारक रुपये की विनिमय दर के लिए कोई महत्त्वपूर्ण कारण है।
वास्तविक कारक ईरान में युद्ध है। इसने हालात को ट्रंप शुल्क की तुलना में कहीं अधिक गंभीर रूप से बदल दिया है। वृद्धि और मुद्रास्फीति पर प्रभाव अभी भी संभालने योग्य है। कई एजेंसियां अब भारत की वृद्धि के 6.5-7 फीसदी या यहां तक कि 6 फीसदी तक रहने का अनुमान लगा रही हें, जो पहले 7 फीसदी था। मुद्रास्फीति 4.5 से 5 फीसदी तक अनुमानित है, जो रिजर्व बैंक के सहनशीलता दायरे में है। इनमें से कोई भी अनुमान डरावना नहीं है।
वास्तविक रूप से प्रभावित चालू खाते की स्थिति है, जो ऊंची तेल कीमतों के कारण बिगड़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें पूरे वर्ष 85 डॉलर प्रति बैरल बनी रहती हैं, तो चालू खाता घाटा (सीएडी) जीडीपी के 1.8 फीसदी तक जा सकता है। यही अनुमान रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 27 के लिए अपनी अप्रैल की मौद्रिक नीति रिपोर्ट में लगाया है। यदि तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर जाती हैं, तो सीएडी जीडीपी के 2 फीसदी से भी अधिक हो सकता है।
यह विदेशी निवेशकों के लिए स्थिति को गंभीर रूप से बदल देता है। भारत के नीति-निर्माताओं का हमेशा मानना रहा है कि जीडीपी के 2.5 फीसदी तक का सीएडी संभालने योग्य है। लेकिन निवेशक जिस पर ध्यान देंगे, वह है पिछले पांच वर्षों की तुलना में बड़ी गड़बड़ी। जब एफआईआई देखते हैं कि सीएडी पिछले पांच वर्षों में जीडीपी के औसतन 0.8 फीसदी से बढ़कर लगभग 2 फीसदी तक जा रहा है, तो रुपये के अवमूल्यन की अपेक्षाएं अपरिहार्य हो जाती हैं। जैसे ही एफआईआई अपने रिटर्न की रक्षा के लिए बाहर निकलते हैं, ये अपेक्षाएं स्वयं-सिद्ध साबित होती हैं।
यह स्पष्ट है कि हाल के वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातों में सुधार ने एक महत्त्वपूर्ण कमजोरी को छिपा दिया था। वह है, 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तेल की कीमतों का सीएडी पर प्रभाव। यह कमजोरी इसलिए ध्यान में नहीं आई क्योंकि विश्व कीमतें नीचे बनी हुई थीं।
पिछले पांच वर्षों में अधिकांश समय तेल की कीमतें 100 डॉलर से नीचे रही हैं, सिवाय 2022 में लगभग चार महीनों के जब यूक्रेन संघर्ष शुरू हुआ था। पिछले दो वर्षों में कीमतें 80 डॉलर से नीचे बनी हुई थीं। बाजारों में यह धारणा थी कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में तेल की कीमतें 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी रहेंगी। पिछले महीने तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर पहुंचने से सभी गणनाएं बिगड़ गईं। आश्चर्य नहीं कि ईरान में युद्धविराम की घोषणा तक रुपये पर नीचे जाने का दबाव लगातार बना रहा। तेल और उससे संबंधित उत्पादों की कीमतों के बारे में सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती। वह अधिकतम आपूर्ति सुनिश्चित करने और उपभोक्ताओं पर मूल्य प्रभाव को कम करने पर ध्यान केंद्रित कर सकती है। अब तक उसने दोनों मोर्चों पर अच्छा काम किया है।
विनिमय दर की बात करें तो रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप केवल रुपये की गिरावट को नियंत्रित कर सकता है, उसे रोक नहीं सकता। यदि युद्ध विराम लंबे समय तक नहीं टिकता और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो केंद्रीय बैंक के पास नीतिगत दर बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। फरवरी 2025 से रिजर्व बैंक की नीतिगत दर में 125 आधार अंकों की कटौती अब कुछ हद तक अविवेकपूर्ण लगने लगी है। जब अर्थव्यवस्था लगभग 7 फीसदी की दर से बढ़ रही थी, तो जनवरी 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप के पदभार ग्रहण करने के बाद से अंतरराष्ट्रीय वातावरण में भारी अनिश्चितताओं को देखते हुए संयम बरतना अधिक समझदारी होती।
यहां नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण सबक है। यदि हमें अर्थव्यवस्था में जोखिमों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करना है और स्थिरता से समझौता नहीं करना है, तो जीडीपी वृद्धि की आकांक्षाओं को सीमित करना आवश्यक है।
अशांत वैश्विक वातावरण में लगभग 7 फीसदी की वृद्धि दर को कमतर नहीं आंकना चाहिए। ऐसी व्यापक आर्थिक नीतियां जो मौजूदा बचत और निवेश स्तर पर वृद्धि दर को और तेज करने का प्रयास करती हैं, अर्थव्यवस्था को अनावश्यक जोखिमों के सामने लाती हैं।