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भारत की नीतिनिर्माण प्रक्रिया को सिर्फ अनुमान नहीं, रणनीतिक परिदृश्यों पर देना होगा जोर

तेजी से बदलती दुनिया में नीतियां अनुमान नहीं बल्कि बदलती परिस्थितियों और तस्वीरों के आधार पर बननी चाहिए। विस्तार से बता रहे हैं नितिन देसाई

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नितिन देसाई   
Last Updated- May 27, 2026 | 9:44 PM IST

दुनिया में 1990 के दशक से आर्थिक प्रणाली राजनीतिक दांव-पेच से मुक्त व्यापार और वित्तीय संबंधों पर आधारित थी। इसने चीन में आर्थिक रफ्तार को तेज गति दी और भारत को भी इसका काफी फायदा मिला। विनिर्माण और व्यापार में चीन के असाधारण दबदबे और कुछ हद तक भारत के उभार से जो खुलापन आया, उसे लेकर कुछ चिंताएं भी हुईं। मगर अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अब बड़ा बदलाव हुआ है।

विकसित और उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ते संबंधों के साथ काफी हद तक राजनीति से मुक्त वैश्वीकरण का युग अब ऐसी प्रणाली का गवाह बन गया है जहां देशों के बीच संबंधों (व्यापार, प्रौद्योगिकी और वाणिज्यिक वित्त क्षेत्रों तक में) के तार सुरक्षा और सामरिक विचारों से जुड़ चुके हैं। इससे एक हद तक राष्ट्रवाद और कि व्यापारवाद को बढ़ावा मिल रहा है और ऐसा खास तौर पर अमेरिका द्वारा किया जा रहा है, जो वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और वित्त तक पर राजनीतिक प्रतिबंध लगा रहा है।

इस बदलाव को कई मायनों में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इस साल स्विटजरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन में बखूबी उजागर किया था। उन्होंने कहा था, ‘महाशक्तियों ने आर्थिक एकीकरण को हथियार, शुल्कों को अपना दबदबा जमाने, वित्तीय ढांचे को उत्पीड़न और आपूर्ति श्रृंखलाओं के जोखिम को शोषण के लिए इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।’ मुझे लगता है कि महाशक्तियों से कार्नी का मतलब मुख्य रूप से ट्रंप और अमेरिका से था।

ऐसी जटिल दुनिया में विभिन्न सरकारों या वैश्विक वित्तीय या विनिर्माण कंपनियों के व्यवहार का पहले से अनुमान लगाना कठिन है। लिहाजा ऐसी नीतियां बनाना भी उचित नहीं है, जो इस अनुमान पर आधरित होती हैं कि आज जैसी वैश्विक उथल-पुथल आगे भी जारी रहेगी। वास्तव में हमें ऐसे विश्लेषण की आवश्यकता है, जो विभिन्न संभावनाओं का संकेत दे मसलन क्या संबंधों का मौजूदा स्वरूप चलता रहेगा, क्या नए स्वरूप सामने आएंगे या क्या अमेरिका या अन्य महाशक्तियों की ताकत की नुमाइश में कोई बदलाव आएगा।

हमारी नीति वैश्विक अर्थव्यवस्था के किसी पूर्वानुमान पर अधारित नहीं होनी चाहिए बल्कि ऐसी नीति होनी चाहिए, जो परिस्थितियां बदलने पर फौरन बदली जा सके। भारत जैसे बड़े देश में सरकार वैश्विक संभावनाओं को सीधे प्रभावित करने में अपनी भूमिका पर भी विचार कर सकती है।

भविष्यवाणियों या अनुमानों के बजाय आगे की परिस्थित्यों पर यह जोर अमेरिका द्वारा बढ़ते अलगाववाद और एकतरफा शक्ति प्रदर्शन से भी सही साबित हुआ है। प्रसिद्ध किताब ‘ट्रस्ट: द सोशल वर्चूज ऐंड द क्रिएशन ऑफ प्रॉस्पैरिटी’ लिखने वाले फ्रांसिस फुकुयामा अब कहते हैं, ‘अगर मुझे ट्रस्ट आज फिर से लिखनी होती तो मैं अमेरिका को ज्यादा भरोसे वाला समाज नहीं बताता।’

असल में फुकुयामा कह रहे हैं कि वैश्विक संबंधों की हमारी नीति भरोसे पर नहीं बल्कि प्रमुख वैश्विक साझेदारों की संभावित क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के आकलन पर आधारित होनी चाहिए। चूंकि इन घटनाओं का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता इसलिए अलग-अलग परिस्थितियों की कल्पना करनी होगी और ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो परिस्थितियों के हिसाब से बदली जा सकती हैं।

संभावित परिस्थितियों या तस्वीरों पर यह ध्यान महाशक्तियों के साथ हमारे संबंधों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। व्यापार और वित्त के मुद्दों पर विचार करते हैं। भारत के तीन प्रमुख साझेदार अमेरिका, यूरोप और चीन हैं। उनके साथ 2024-25 में हमारा व्यापारिक संबंध लगभग 380 अरब डॉलर का था, जो हमारे वैश्विक व्यापार का लगभग एक तिहाई है। अगर शुद्ध सेवा व्यापार, धन प्रेषण और निवेश भुगतान में अमेरिका और यूरोप की कुल हिस्सेदारी जोड़ दी जाए तो अनुपात और भी ज्यादा होगी।

सबसे पहले हमें वह उदाहरण लेना चाहिए, जो शायद सबसे ज्यादा प्रासंगिक है – अमेरिका के साथ व्यापार और वित्त के संबंध। वर्ष 2029 के बाद अमेरिकी वैश्विक नीति की दो वैकल्पिक तस्वीरें इस बात पर निर्भर करती हैं कि अमेरिका में राष्ट्रपति कौन चुना जाता है – ट्रंप की नीतियों का समर्थक या विरोधी। वास्तव में हमें थोड़ा और आगे बढ़कर यह सोचना होगा कि व्यापार और बहुपक्षवाद पर जो अलगाववादी तथा आक्रामक नीतियां अमेरिकी नीति की बुनियाद हैं, क्या वहां के नागरिकों की राय भी उन्हीं के पक्ष में बन रही है। ऐसी नीति तैयार की जाए, जो अमेरिकी सरकार के वर्तमान रुख से निपट सके मगर इतनी लचीली हो कि अगर वहां कम अलगाववादी, व्यापार नीतियों से राजनीति कम करने की इच्छुक और अपनी विनिर्माण तथा वित्तीय कंपनियों की दुनिया भर में चल रही गतिविधियों में ज्यादा दखल की मंशा नहीं रखने वाली नई सरकार आती है तो उसका फायदा उठाया जा सके।

दूसरी महाशक्ति चीन के लिए इसी तरह की परिस्थितियों पर आधारित नीति बनाना और भी जरूरी है। क्या चीन दुर्लभ धातुओं जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के व्यापार पर बंदिशें जारी रखेगा या अमेरिका के साथ रिश्तों में तनाव की वजह से वह दूसरे देशों को बंदिशों से ढील देगा? उसकी वैश्विक व्यापार नीति पर राजनीतिक नियंत्रण बना रहेगा या उसकी निजी कंपनियों की दुनिया भर में बढ़ती पैठ से यह नियंत्रण कमजोर हो जाएगा? क्या चीन हमारे लिए निर्यात का महत्त्वपूर्ण ठिकाना बन सकता है? क्या हमें चीन से पूंजी की आवक पर बंदिशें कम करनी चाहिए? ऐसे ही कई अन्य प्रश्न हैं, जिनका हल जरूरी है और ऐसी नीति तैयार करना आवश्यक है, जो चीन में होने वाले बदलावों के हिसाब से ढल सके।

यूरोप के साथ रिश्तों में परिस्थितियों की कल्पना करना जरूरी है क्योंकि नए मुक्त व्यापार समझौतों के जरिये यूरोप तथा यूनाइटेड किंगडम के साथ बेहतर व्यापार संबंधों पर हमारी निर्भरता बहुत ज्यादा है। यूरोपीय देशों के अमेरिका से दूर जाने के संकेत भी मिल रहे हैं। अमेरिका ने हाल ही में जब जी-7 शिखर सम्मेलन में कनाडा को प्रवेश देने से इनकार कर दिया तो चारों यूरोपीय देशों और जापान ने शिखर सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया।

फिलहाल जी-7 की अध्यक्षता कर रहे फ्रांस ने औपचारिक रूप से ‘अमेरिका रहित जी7’ के स्थायी ढांचे की बात तो नहीं की है मगर वहां के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने वैश्विक आर्थिक असंतुलन दूर करने और लोकतांत्रिक देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए 2026 के जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और केन्या को बुलाने का फैसला किया है। इस समय सबसे कारगर संभावना यह बन रही है कि यूरोप व्यापार और वित्त के कई क्षेत्रों में अमेरिका की जगह ले सकता है। मगर रूस के साथ यूरोप के संबंध और खराब हुए या यूरोप एक बार फिर अमेरिका के करीब चला गया तो जो परिस्थितियां बनेंगी, हमारी नीतियों को उन पर भी विचार करना चाहिए।

मैंने अपना ध्यान मुख्य रूप से व्यापार, वित्त और प्रौद्योगिकी की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर रखा है। मगर राजनीतिक और रक्षा संबंधों के लिए भी ऐसी तस्वीरें खींचना ज्यादा जरूरी है। तस्वीरों में ऐसी संभावनाएं शामिल हो सकती हैं जो अभी नजर नहीं आ रही हैं। वर्ष 1987 में पांच साल बाद का अनुमान लगाने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं सोच सकता था कि सोवियत संघ में साम्यवाद का पतन हो जाएगा, पश्चिमी जर्मनी में क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार के नेतृत्व में जर्मनी के दोनों हिस्से एक हो जाएंगे और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद खत्म हो जाएगा तथा नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनेंगे।

उस समय इन तीनों नाटकीय घटनाओं की संभावना नहीं लग रही थी मगर ये हो भी सकती थीं। ये तीनों घटनाएं हुईं और यही कारण है कि नीति निर्माण के लिए पूर्वानुमानों के बजाय परिस्थितियों या तस्वीरों पर आधारित अनुमान ज्यादा कारगर होते हैं। अगर हमने ऐसी संभावनाओं को शामिल करते हुए एक तस्वीर तैयार की होती तो रूस के साथ हमारे व्यापारिक संबंधों में क्षरण और दक्षिण अफ्रीका में नई संभावनाओं को हमने भांप लिया होता। यही कारण है कि सरकार को विशेषज्ञों और अफसरशाहों के बीच ऐसा संवाद शुरू करना चाहिए, जो बेहद सटीक पूर्वानुमान लगाने की कोशिश न करे बल्कि वैश्विक आर्थिक संबंधों की संभावित तस्वीरें खींचे।

First Published : May 27, 2026 | 9:44 PM IST