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भारत को FTA उपयोग दर बढ़ाने के लिए नीतियां तैयार करनी होंगी

ऊंचे आयात शुल्क और अनुपालन की जटिल प्रक्रियाएं एफटीए के प्रभावी उपयोग में अब भी बड़ी बाधा हैं। बता रही हैं अमिता बत्रा

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अमिता बत्रा   
Last Updated- June 11, 2026 | 11:58 PM IST

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें यूरोपीय संघ (ईयू) और ब्रिटेन के साथ हुए अपेक्षाकृत व्यापक समझौते भी शामिल हैं। सरकार ने हाल के समय में उद्योग जगत के साथ बातचीत के दौरान बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि इन एफटीए की उपयोगिता दर बढ़ाई जाए। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत के भुगतान संतुलन पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे चालू खाते का बढ़ता घाटा, जिसके पश्चिम एशिया में जारी संकट और महंगे आयातित तेल-गैस के कारण और बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेश प्रवाह में गिरावट तथा डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट भी अहम है।

हालांकि, यह माना जा रहा है कि पश्चिम एशिया के संकट के समाप्त होने के बाद भी पहले की तरह तेल और गैस की आपूर्ति तथा परिवहन व्यवस्था को सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं। ऐसे में केवल उद्योगों से अपील करने भर से काम नहीं चलेगा, बल्कि एफटीए के उपयोग को बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक और व्यापक रणनीति अपनानी होगी। ईयू के साथ हुआ एफटीए अभी अनुमोदन की प्रक्रिया में है, ब्रिटेन वाला समझौता अभी लागू नहीं हुआ है और कनाडा के साथ बातचीत हाल ही में फिर शुरू हुई है ऐसे में भारत के पास यह अवसर है कि वह एफटीए के अधिकतम उपयोग और लाभ सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए।

किसी कंपनी के लिए एफटीए का फायदा उठाना मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करता है। पहला, तरजीही राष्ट्र के लिए सामान्य आयात शुल्क (एमएफएन शुल्क) और एफटीए के तहत लगने वाले कम शुल्क यानी तरजीही शुल्क के बीच कितना अंतर है । दूसरा, सामान कहां बना है इससे जुड़े नियम कितने आसान हैं और तीसरा, एफटीए के नियमों का पालन करने की सरकारी प्रक्रिया कितनी सरल है। आमतौर पर माना जाता है कि यदि सामान्य शुल्क और रियायती शुल्क के बीच 3-4 फीसदी का अंतर हो तभी कंपनियों के लिए एफटीए का उपयोग करना लाभकारी होता है। यदि यह अंतर कम हो, तब जानकारी जुटाने, लॉजिस्टिक्स और नियमों के पालन पर होने वाला खर्च वास्तव में निर्यातकों को एफटीए से मिलने वाले मामूली लाभ से कहीं अधिक हो जाता है। भारत में विनिर्माण क्षेत्र पर लागू औसत आयात शुल्क विकसित और अन्य विकासशील देशों की तुलना में अधिक है। ऐसे में भारत अपने एफटीए साझेदार देशों को अपेक्षाकृत अधिक तरजीही मार्जिन देता है, जबकि भारतीय निर्यातकों को उतना लाभ नहीं मिल पाता।

उदाहरण के तौर पर, भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते को अक्सर नीति-निर्माताओं द्वारा इस बात के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है कि भारतीय कंपनियों ने पहले एफटीए का कम उपयोग किया। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस समझौते में तरजीही मार्जिन का लाभ, भारत की तुलना में आसियान देशों को अधिक मिला। वर्ष 2010 में जब इस एफटीए के तहत शुल्क में कटौती की पहली प्रक्रिया शुरू हुई, तब प्रमुख आसियान देशों में 60 फीसदी से अधिक टैरिफ लाइन पहले से ही शुल्क-मुक्त या 5 फीसदी से कम शुल्क वाली श्रेणी में थीं जो कुल आयात का लगभग 80 फीसदी थीं। ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए एफटीए का उपयोग कर निर्यात करने का कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं था। इसके विपरीत, भारत में 45 फीसदी आयात ऐसी श्रेणी में आते थे जिन पर 5 से 10 फीसदी तक शुल्क लगता था। इससे आसियान देशों को स्पष्ट लाभ मिला।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र में अपने औसत एमएफएन (सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र) आयात शुल्क में और वृद्धि की है। पिछले दशक में 10 से 15 फीसदी तथा 15 से 25 फीसदी शुल्क वाली श्रेणियों में आने वाली टैरिफ लाइन की संख्या काफी बढ़ी है। वर्ष 2014 में ये क्रमशः 1.4 फीसदी और 1.7 फीसदी थीं, जो वर्ष 2024 तक बढ़कर 33.5 फीसदी और 14.9 फीसदी हो गईं। इसका सीधा लाभ भारत के एफटीए साझेदार देशों को मिलता है। यह स्थिति इसलिए और महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि भारत अब यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए), यूरोपीय संघ (ईयू) और ब्रिटेन जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ एफटीए कर रहा है। इन देशों में अधिकांश वस्तुओं पर या तो आयात शुल्क नहीं है या फिर वह 5 फीसदी से कम है। इसके मुकाबले भारत में विनिर्माण क्षेत्र पर औसत एमएफएन शुल्क लगभग 13 फीसदी है। इससे यूरोपीय निर्यातकों को भारत के एफटीए से कहीं अधिक लाभ मिलता है जबकि भारतीय निर्यातकों के लिए लाभ का दायरा बहुत सीमित रह जाता है।

एफटीए के कम उपयोग का दूसरा बड़ा कारण वस्तुओं के तैयार होने की जगह से जुड़े नियमों की जटिलता और मूल देश प्रमाणपत्र हासिल करने की कठिन प्रक्रिया है। जो देश अपनी कंपनियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (जीवीसी) में भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं, वे एफटीए में सामान के बनने से जुड़े सरल और लचीले नियम अपनाते हैं। भारत ने अपने हालिया एफटीए में द्विपक्षीय संचयन और 2025 में मूल प्रमाणन प्रक्रिया को कुछ हद तक सरल बनाया है। लेकिन अतिरिक्त दस्तावेजों की अनिवार्यता ने आयातकों पर अनुपालन का बोझ बढ़ा दिया है। इससे सीमा शुल्क अधिकारियों को जांच शुरू करने का अधिक अधिकार भी मिल जाता है। ऐसी अनिश्चितता और विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े ऊंचे शुल्क घरेलू उद्योगों को एफटीए के तहत जरूरी कच्चा माल आयात करने से हतोत्साहित करते हैं।

इसके अलावा, केवल एफटीए पर हस्ताक्षर हो जाने भर से कंपनियां उनका स्वतः उपयोग नहीं करने लगतीं। कंपनियों को एफटीए के नियमों, रियायतों, मानकों और साझेदार देशों के नियामकीय प्रावधानों की जानकारी होना भी आवश्यक है। केवल मंत्रालय की वेबसाइट पर एफटीए की जानकारी भर उपलब्ध करा देने से समस्या हल नहीं होती क्योंकि उसकी कानूनी भाषा को समझना विशेषकर छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए कठिन होता है।

यह समस्या विशेष रूप से ईयू और ब्रिटेन के साथ हुए व्यापक व्यापार समझौतों में अधिक दिखाई देती है। इन समझौतों का लाभ उठाने के लिए कंपनियों को नए मानकों और नियमों को समझने में समय और धन दोनों खर्च करने पड़ते हैं। यदि शुल्क में मिलने वाली रियायत कम हो और अनुपालन की लागत अधिक, तो कंपनियां एफटीए का उपयोग करने से बचती हैं।  दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों ने इस समस्या का समाधान तकनीकी और वित्तीय सहायता देकर किया। वहां सरकार ने विशेष कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से उद्योगों को एफटीए की जानकारी दी। इसका परिणाम यह हुआ कि 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में जहां एफटीए की उपयोगिता दर लगभग 20 फीसदी थी, वहीं 2010 के दशक में यह बढ़कर करीब 70 फीसदी तक पहुंच गई।

इसी तरह भारत के वाणिज्य मंत्रालय को भी एफटीए के उपयोग से जुड़ी जानकारी और निःशुल्क परामर्श के लिए एक विशेष पोर्टल शुरू करना चाहिए। साथ ही, उद्योग संगठनों के सहयोग से कार्यशालाएं आयोजित कर एफटीए संबंधी जागरूकता बढ़ानी चाहिए। उच्च आयात शुल्क ढांचे की व्यापक समीक्षा को शीघ्र पूरा करने के साथ-साथ सरकार को ऐसे विशेष नीतिगत कदम और जागरूकता कार्यक्रम तैयार करने होंगे, जिनसे भारतीय उद्योग हाल ही में हुए एफटीए का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकें।


(लेखिका जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : June 11, 2026 | 11:58 PM IST