प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी | फाइल फोटो
इतिहास खुद को दोहराता है, इस पर हम किस की बात मानें, कार्ल मार्क्स की या मार्क ट्वेन की? इस पर मतभेद हो सकता है। मार्क्स ने कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहली बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार प्रहसन के रूप में। ट्वेन ने तर्क दिया कि इतिहास खुद को दोहराता नहीं है मगर अक्सर पहले जैसा लगता है। आजकल की घटनाओं पर नजर डालें तो लगता है कि हम 1973 के ऐतिहासिक संकट की ओर लौट रहे हैं। फिर आप चाहें मार्क्स के शब्द चुनें या ट्वेन के।
मैं मार्क्स के बजाय ट्वेन को चुनूंगा क्योंकि अगर गलती होने का जोखिम हो तो मैं आशावाद के साथ गलती पसंद करूंगा। यदि आज की घटनाएं 1973 से मिलती-जुलती लगती हैं तो संगीत की भाषा में उनकी धुन कोमल, शुभ या रोमानी नहीं होगी। ये भविष्य में विलाप की धुनें हैं, मगर हम इन्हें प्रलयकारी नहीं कहेंगे। इसकी वजह यह है कि भारत पिछले 53 साल में काफी मजबूत हो चुका है।
बात करते हैं 1973 की। इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनावों में एकतरफा जीत हासिल की थी। अपने साझेदारों के साथ उन्होंने 80 फीसदी सीटें जीत ली थीं। साझेदारों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) शामिल थीं। उसी साल उन्होंने पाकिस्तान को पराजित किया और बांग्लादेश का जन्म हुआ। अगले साल 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चुनाव हुए, जिनमें से 15 में उन्होंने जबरदस्त जीत दर्ज की। जिन चार राज्यों – मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और गोवा में उनकी हार हुई, वे छोटे थे और मिजोरम, गोवा तो केंद्रशासित प्रदेश थे। वह अपनी सत्ता और शोहरत के शिखर पर थीं। पार्टी, कैबिनेट और संसद उनकी मुट्ठी में थे। किसी भारतीय नेता का वैसा जलवा नहीं रहा है। नरेंद्र मोदी अब उसके करीब हैं और यह बात भी 1973 के जैसी ही है।
उसके बाद हालात नाटकीय ढंग से बदले। पहले 1972-73 में लगातार मॉनसून खराब रहा। ऐसा कम ही होता है कि लगातार मॉनसून खराब हो। इससे पहले 1965-66 में ऐसा हो चुका था। इससे कृषि अर्थव्यवस्था वाले देश में हरित क्रांति के फायदे बेअसर हो गए। 1973 में योम किपुर युद्ध के साथ तेल का झटका लगा जब पहली बार पश्चिम एशिया के इस्लामिक देशों ने तेल को हथियार बना लिया। तेल की कमी और बढ़ती कीमतों ने सूखे की मुश्किलों को और बढ़ा दिया। इससे देश के युवाओं में नाराजगी पैदा हुई। इसकी शुरुआत गुजरात से हुई।
वहां नवनिर्माण आंदोलन राजनीतिक नहीं था। बेरोजगारी, किराये और बढ़ती कीमतों से हो रही आर्थिक दिक्कतों ने हर किसी को प्रभावित किया था। वहां कॉलेज छात्रावासों के मेस का शुल्क बढ़ाने से चिंगारी भड़क उठी और फिर मामला गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के विरुद्ध भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों में बदल गया, जहां ‘चिमन चोर’ के नारे लगने लगे। जल्द ही बिहार में छात्र कार्यकर्ताओं ने अपनी बिहार छात्र संघर्ष समिति बना ली और महंगाई तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ दमदार जंग छेड़ दी। इनमें लालू प्रसाद और नीतीश कुमार प्रमुख थे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया।
इंदिरा गांधी चौकन्नी हो गईं और कई तरीके से जवाब दिया। चिमनभाई पटेल को हटा दिया गया। बिहार में अब्दुल गफूर ने 1974 तो किसी तरह गुजार लिया मगर अप्रैल 1975 में उन्हें भी जाना पड़ा। 1974 की गर्मियों में गांधी ने पोखरण परमाणु परीक्षण भी किया। उन्होंने कहा कि विदेशी ताकतें, खास तौर पर सीआईए उनकी सरकार गिराना चाहती हैं। लेकिन जनता का रुख नहीं बदला। बदलता भी कैसे जब बेरोजगारी चरम पर थी और 1974 में महंगाई 29 फीसदी हो गई थी। उसी साल सितंबर में महंगाई 34.68 फीसदी तक जा पहुंची।
तब इंदिरा ने अपनी ही जनता पर एक भीषण हथियार चला दिया। आपातकाल हमारे लोकतंत्र के लिए हमेशा कलंक बना रहेगा और वह भी उन्हें बचा नहीं पाया। निष्पक्ष चुनाव और अपमान भरी हार ही 1977 में उनके लिए गंगा स्नान बनी।
पिछले 18 महीनों की घटनाओं पर नजर डालें और आगे देखें। पश्चिम एशिया के युद्ध के साथ एक नया तेल संकट सामने है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने इतनी भारी निकासी की है कि 20 अरब डॉलर देश से बाहर चले गए। शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) लगभग शून्य है क्योंकि कई बड़ी भारतीय कंपनियां विदेश में निवेश कर रही हैं। रुपये के लिए यह सब भारी पड़ रहा है और विडंबना यह है कि कमजोर होते डॉलर के सामने भी रुपया गिर रहा है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के अंतिम वर्षों में रुपये की मजबूती को सियासी मुद्दा बनाकर बड़ी गलती कर दी थी। अब यह क्रिकेट के नर्वस नाइंटी जैसा मामला हो गया है मगर कुछ उलटी स्थिति है। क्रिकेट में 90 रन पार करने के बाद बल्लेबाज यह सोचकर घबराता रहता है कि एक-दो रन पहले आउट होकर 100 रन बनाने से चूक न जाए। यहां घबराहट यह सोचकर है कि रुपया 1-2 रुपये और गिरकर डॉलर के मुकाबले 100 पर न पहुंच जाए। आपकी मुद्रा वैश्विक बाजारों और आपकी अर्थव्यवस्था की सेहत के हिसाब से चलेगी। मुद्रा का राष्ट्रवाद बेतुकी बात थी और हमेशा रहेगी। कम से कम चीनियों से हमें यह सीखना चाहिए, जिन्होंने बहुत जल्दी समझ लिया था कि मुद्रा कमजोर रखने में उनका फायदा है।
यह तेल संकट 1973 की याद दिलाता है। सरकार को मूल्य वृद्धि का बोझ उपभोक्ताओं पर ही डालना होगा, महंगाई बढ़ेगी, बेरोजगारी और चुभेगी। 1973 की मॉनसून विफलताओं की याद भी चेतावनी देती है कि यह अल नीनो का साल है। हालांकि हमें नहीं पता कि इसका असर क्या होगा। 1973 के मुकाबले अब कृषि हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का बहुत छोटा हिस्सा है लेकिन लोगों पर कृषि संकट से ज्यादा असर कोई और संकट नहीं डालता। यही कारण है कि सबके मिजाज पर नजर रखें, खासकर युवाओं पर।
कुछ संकेत स्पष्ट हैं। नीट विवाद इस गुस्से को दर्शाता है। हमारी सरकार कारेाबारी सुगमता की बात करती है, लेकिन उन युवाओं की कठिनाई भी देखिए, जिन्हें गिनी-चुनी नौकरियों या नौकरी दिलाने लायक शिक्षा के लिए होड़ करनी पड़ती है। कैट, नीट, जेईई, क्लैट, यूपीएससी, एनडीए, आईएमए और यहां तक कि अग्निवीर में भर्ती के लिए परीक्षाएं हो रही थीं और अब कॉलेज में दाखिले के लिए सीयूईटी भी है।
इन सबके बीच आज का युवा कोचिंग सेंटर अर्थव्यवस्था के चक्रव्यूह में फंस गया है। मध्य वर्ग की पहले ही बिगड़ी माली हालत को यह और भी बिगाड़ रहा है और निम्न मध्य वर्ग तो कर्ज में धंसता जा रहा है। इतने सब के बाद भी हमें पता चलता है कि कुछ लोग सिस्टम को धोखा दे रहे हैं, परीक्षा रद्द हो रही है और हमें पूरी कवायद एक बार फिर करनी पड़ रही है।
जरा सोचिए कि युवा भारतीय और उनके माता-पिता कितने गुस्से में होंगे? खासकर तब, जब उन्हें सरकार का जवाब मिलता है – हम धोखेबाजों को जेल में डालेंगे और परीक्षा फिर से कराएंगे। यह कहना कठिन है कि यह गुस्सा उतना ही तगड़ा है, जितना 1973-74 में गुजरात में कॉलेजों की फीस या बिहार में महंगाई पर था। परंतु भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक बिना सोचे कही एक बात पर मजाक के तौर पर शुरू हुई कॉकरोच जनता पार्टी जितने बड़े स्तर पर पहुंच गई है, उससे हमें कुछ संकेत मिलते हैं। हफ्ते भर में ही लाखों युवा भारतीय इसके सोशल मीडिया हैंडल्स पर उमड़ पड़े, जिससे घबराई सरकार को इसका एक्स हैंडल बंद कराना पड़ा। जब यह लेख लिखा जा रहा था तब इंस्टाग्राम पर इसके 2.1 करोड़ फॉलोअर थे, जो भारतीय जनता पार्टी के फॉलोअरों से ढाई गुना हैं। हां, प्रधानमंत्री 10.1 करोड़ फॉलोअर के साथ बहुत आगे हैं।
हम कह ही चुके हैं कि यह अलग किस्म का और ज्यादा मजबूत भारत है। महंगाई तो बढ़ेगी ही, वृद्धि धीमी पड़ेगी ही और सरकार की माली हालत पर असर पड़ेगा ही। फिर भी कुछ वृद्धि होगी और होर्मुज स्ट्रेट भी एक न एक दिन खुल ही जाएगा। मोदी सरकार की चुनौती इसलिए भी कम हो जाती है कि आज के विपक्ष और उसके प्रमुख नेता की 1973 के नेताओं जैसी विश्वसनीयता नहीं है।
उनके पास पहले से ही जन आंदोलनों, संसदीय कौशल, ट्रेड यूनियनों और किसानों के आंदोलनों का लंबा रिकॉर्ड था। सबसे बड़ी बात यह थी कि 1960 के दशक के अंत में संयुक्त विधायक दल के क्षणिक दौर को छोड़ दें तो वे सत्ता से लगभग अछूते थे। उन पर यह आरोप नहीं लग सकता था कि सब एक जैसे ही हैं।
यही अंतर देखकर हम मार्क्स के बजाय ट्वेन को चुनते हैं। आज का दौर 1973 से मेल खाता है। ऊपर बताई बातें मोदी सरकार को कुछ राहत देती हैं मगर पूरी तरह बख्श नहीं देती हैं। अगर सरकार इस राहत या गुंजाइश का इस्तेमाल समझदारी से नहीं करती है, पारदर्शिता नहीं दिखाती है, वास्तविक सुधार खास तौर पर उच्च शिक्षा में सुधार नहीं करती है तो यह गुंजाइश भी खत्म हो जाएगी।
‘मैं भी एक कॉकरोच हूं’ की भावना मात्र चेतावनी नहीं है। अगर हम भारतीय पक्षियों का उदाहरण लें तो यह गुस्साए हुए मोर की आवाज की तरह है।