देश में खाद्य उपलब्धता और देश की दो तिहाई आबादी के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में आने के बावजूद कुपोषण बढ़ रहा है। खासतौर पर बच्चों में इसका बढऩा चिंता का विषय है। विभिन्न अध्ययनों और सर्वेक्षणों में बार-बार इस कड़वे सच को रेखांकित किया गया है। इस विषय में ताजा चेतावनी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-20 से आई है जिसे स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी किया। सर्वे दर्शाता है कि सन 2015-16 के पिछले ऐसे सर्वे से अब तक औसत से कम वजन और कम लंबाई वाले बच्चों तथा खून की कमी के शिकार बच्चों की तादाद में इजाफा हुआ है। इससे पहले अक्टूबर में जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 में भारत को 107 में से 94वां स्थान दिया गया था और उसे भूख के मामले में गंभीर श्रेणी में रखा गया था। ऐसा मोटे तौर पर पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण और अल्पपोषण की वजह से किया गया। अपर्याप्त और असंतुलित पोषण शारीरिक एवं और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है और वयस्क होने पर यह हमारी उत्पादकता को भी प्रभावित करता है। शोध से पता चलता है कि मस्तिष्क का 90 प्रतिशत विकास पांच वर्ष की उम्र तक हो जाता है। ऐसे में शुरुआत में उचित पोषण भविष्य में उत्पादकता को 50 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है।
स्वास्थ्य सर्वे से पता चला कि जिन 18 राज्यों के आंकड़े जुटाए गए उनमें से 11 राज्यों में ऐसे बच्चों की तादाद तेजी से बढ़ी है जिनका औसत कद उम्र के अनुपात में कम है। वहीं 14 राज्यों में बच्चों का वजन कम है जबकि 17 राज्यों में वे रक्त अल्पता के शिकार हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि औसत वजन में कमी का सीधा संबंध भोजन में कमी से है और इसे ऊंचाई की तुलना में अपर्याप्त वजन से समझा जा सकता है। माना जा रहा है कि यह समस्या कई अन्य राज्यों में फैल गई है। हर पांच में से एक बच्चा अब कम वजन वाला है। रक्त अल्पता के मामले भी चिंताजनक स्तर पर हैं। सन 2015-16 के बाद से असम में ऐसे मामलों में 33 प्रतिशत और गुजरात में 63 फीसदी बढ़े हैं। असम में रक्त की अल्पता वाले बच्चों की तादाद 68 फीसदी और गुजरात में 80 फीसदी हो गई है। यह देश के पोषण प्रोफाइल और खाद्य नीतियों की कमी दर्शाता है। अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों और आबादी के समृद्ध धड़े में ऐसे मामले सामने आना चिंताजनक है। सरकार की प्रमुख पोषण योजना यानी राष्ट्रीय पोषण अभियान मार्च 2018 में शुरू किया गया था। इसकी योजनाओं के तहत बच्चों और माताओं को समग्रतापूर्ण भोजन नहीं मिलने के कारण इस अभियान के परिणाम भी सामने नहीं आ रहे।
सर्वे के नतीजों के अहम नीतिगत निहितार्थ हैं। मसलन भूख और कुपोषण के बीच स्पष्ट भेद करने की आवश्यकता है। भूख कमोबेश समाप्त हो गई है जबकि कुपोषण बरकरार है। मोटापा भी एक तरह का कुपोषण है जो कई तरह की दिक्कतों को जन्म देता है। देश के अधिकांश पूरक आहार कार्यक्रम भोजन या कैलरी पर केंद्रित रहते हैं जबकि संतुलित पोषण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि बच्चों और गर्भवती तथा नवजात शिशुओं की माताओं को सरकारी योजनाओं के तहत विविधतापूर्ण भोजन मिले। मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ी जैसी योजनाओं के तहत दिए जाने वाले भोजन में विविधता बढ़ाई जानी चाहिए। इन योजनाओं के तहत दिए जाने वाले भोजन में मोटे अनाज, अंडे, दूध और प्रसंस्कृत पोषण युक्त आहार बढ़ाकर यह किया जा सकता है। ऐसे तमाम बदलाव बिना अतिरिक्त लागत के भी किए जा सकते हैं। यदि कुछ अतिरिक्त खर्च होता है तो भी इसके दूरगामी लाभ को देखते हुए यह किया जाना चाहिए।