खबरों के मुताबिक सरकार जल्दी ही 75 डिजिटल बैंक शुरू करने वाली है। परंतु अगर आप सोचते हैं कि ये नये बैंक पहले से मौजूद बैंकों को चुनौती देंगे तो आप गलत हैं। खुलने वाले बैंक डिजिटल बैंक हैं। वास्तव में यह मौजूद बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की डिजिटल योजनाओं को पेश करने का नया तरीका है।
डिजिटल बैंक दरअसल क्या हैं? भारतीय रिजर्व बैंक ने इनके लिए चार पंक्तियों की एक परिभाषा दी है। संक्षेप में कहें तो ये ऐसे केंद्र हैं जहां लोग अपने आप बैंकिंग योजनाओं का लाभ ले सकते हैं। वहां उनकी मदद के लिए लोग होंगे लेकिन उनकी तादाद न्यूनतम होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो डिजिटल बैंकों को सामान्य बैंकों की डिजिटल शाखा माना जा सकता है। यदि इनके पीछे तर्क कम पहुंच वाले इलाकों के समावेशन का है तो इसमे आशंकाएं बरकरार हैं। बहुत पढ़े लिखे ग्राहक भी सामान्य बैंक शाखा में जाकर अपना काम करना पसंद करते हैं।
डिजिटल बैंक जमा को तेजी से बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम है कि वे परिसंपत्ति के मोर्चे पर अथवा शुल्क आय के क्षेत्र में कुछ खास कर पाएंगे। बैंकों की कम पहुंच वाले इलाकों में डिजिटल उत्पादों और योजनाओं को बढ़ावा देने के लिए बैंकों को पर्याप्त और उच्च प्रशिक्षण वाले कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। डिजिटल बैंक अधिक से अधिक कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ाने और प्रोसेसिंग में लगने वाले समय की बचत कर सकते हैं। यह एक तरीका है जिसके माध्यम से डिजिटल उत्पादों की पेशकश की जा सकती है। इस मॉडल में डिजिटल उत्पाद बैंक में बने रहते हैं। इन उत्पादों की पेशकश डिजिटल बैंकिंग की अनुषंगियों अथवा अलग डिजिटल बैंकों के माध्यम से भी की जा सकती है। सन 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक के आरंभ में जब ऑनलाइन बैंकिंग विदेशों में शुरू हुई तो बैंकों ने डिजिटल बैंकिंग अनुषंगियों के साथ प्रयोग किए। ये उपाय कारगर नहीं रहे। इंटरनेट बैंकिंग पर आधारित अलहदा बैंक भी कारगर नहीं रहे।
अलहदा डिजिटल बैंक जिन्हें नियो बैंक भी कहा जाता था, मोबाइल फोन की बदौलत उन्होंने वापसी की। वे फिनटेक के व्यापक परिदृश्य का हिस्सा हैं। फिनटेक की व्यवस्था इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के जरिये वित्तीय उत्पादों के लिए की गई है। ये तीन तरह से काम करती हैं। पहला ऐसी कंपनियों के रूप में जो बैंकों से प्रतिस्पर्धा करें, दूसरा ऐसी संस्थाओं के रूप में जो बैंकों के साथ सहयोग करके केवाईसी की जांच, ऋण प्रसंस्करण और छंटनी, ऋण संग्रह, जोखिम का आकलन, ग्राहक प्रबंधन आदि करती हैं। तीसरा, वे ऐसी संस्थाओं के माध्यम से काम करती हैं जो वित्तीय बिचौलियों की जरूरत खत्म कर देती हैं। बैंकों को सीधी चुनौती उन डिजिटल बैंकों से है जो अकेले अपने दम पर काम करते हैं। भारत में ऐसे बैंक नहीं हैं। लेकिन दुनिया में अन्य स्थानों पर उनकी मौजूदगी के उदाहरण हैं। अप्रैल 2022 की वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट उपयोगी जानकारी देती है। इसके मुताबिक डिजिटल बैंकों से संभावित जोखिम को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया गया है।
ब्राजील, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में इनका तेज विकास हुआ है। इनमें से सबसे अच्छे डिजिटल बैंकों का बाजार पूंजीकरण शीर्ष बैंकों के समान है क्योंकि ऋण वृद्धि बहुत तेजी से हुई है। ये बैंकों से सीधा मुकाबला नहीं करते बल्कि वे उच्च जोखिम वाले ग्राहकों पर ध्यान देते हैं जिनसे बैंक बचते हैं। मसलन कम आय या खराब ऋण प्रदर्शन वाले लोग, वाणिज्यिक अचल संपत्ति तथा असुरक्षित ऋण आदि। ज्यादा जोखिम उठाने के बावजूद उनकी प्रॉविजनिंग कवरेज सामान्य बैंकों से कम है। ऋण पर उनका प्रतिफल कमोबेश बराबर है। उनके पास वफादार जमाकर्ता नहीं हैं लेकिन उनका तरलता अनुपात कम है।
शुल्क आय के मामले में इन बैंकों के पास कमाई की कम संभावना है क्योंकि उनके ग्राहक कम आय वाले होते हैं। आप सोच सकते हैं उनका परिचालन खर्च भी कम होगा क्योंकि वहां अधिकांश काम डिजिटल हैं। ऐसा नहीं है। उनके विपणन का व्यय उनकी बचत पर भारी पड़ता है। यही कारण है कि ज्यादातर ऐसे बैंक घाटे में हैं। डिजिटल बैंक इंटर-बैंक बाजार के माध्यम से सामान्य बैंकों से जुड़े हुए हैं। विभिन्न सेवाओं के माध्यम से भी उनका जुड़ाव है। फिलहाल उनका नियमन बहुत सख्त नहीं है लेकिन उनका आकार बढ़ने पर नियमन सख्त करना होगा। डिजिटल बैंक, बैंकों के लिए नहीं बल्कि बैंकिंग की स्थिरता के लिए अवश्य खतरा हैं क्योंकि उनके साथ व्यवस्थागत जोखिम जुड़ा हुआ है।
व्यापक फिनटेक क्षेत्र पर भी यही बात लागू होती है। फिनटेक ने भुगतान जगत पर छाप छोड़ी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मूलभूत बैंकिंग कार्यों के लिए भी चुनौती बन सकते हैं। बीते दो दशक का अनुभव बताता है कि बैंकिंग में शाखाओं की अहमियत बरकरार है। डिजिटल बैंकिंग शाखा के माध्यम से होने वाली बैंकिंग को पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। यह एक अतिरिक्त सेवा के समान है जो बैंक अपने ग्राहकों को साथ बनाए रखने के लिए पेश करते हैं। शाखा की प्रासंगिकता बरकरार है क्योंकि वे बैंक शाखा की उपस्थिति ग्राहक को सहज बनाती है। जैसा कि हमने पहले भी कहा डिजिटल बैंकिंग ने ग्राहकों को जोड़कर रखने में अहम भूमिका निभायी है। लागत के मोर्चे पर बेहतर स्थिति में न होने के कारण डिजिटल बैंकों को जोखिम भरे उत्पादों और ग्राहकों का सहारा लेना पड़ा।
फिनटेक कंपनियों के कारण उत्पन्न खतरे को देखते हुए बैंक भी चुप नहीं बैठे। उन्होंने भी फिनटेक कंपनियों के कई उपाय अपना लिए और अपने कारोबार को नया रूप देने का प्रयास किया। उन्होंने फिनटेक कंपनियों का अधिग्रहण भी किया। वे अपनी गतिविधियां इन कंपनियों को आउटसोर्स भी कर रहे हैं।
हम अन्य चुनौती देने वालों या नवाचार करने वालों के साथ भी ऐसा होते देख चुके हैं। एक समय एनबीएफसी को बड़ा खतरा माना जाता था क्योंकि वे बड़े बैंकिंग प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में ज्यादा सक्रिय थीं। बैंकों ने भी उच्च प्रतिफल वाली योजनाओं के साथ प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ऐसा या तो स्वयं किया या एनबीएफसी अनुषंगी की मदद से किया। हम ऐसे मोड़ पर पहुंच चुके हैं जहां एनबीएफसी खुद को बैंक में बदलना चाहते हैं। सूक्ष्म वित्त के साथ भी यही हुआ। बैंकों ने सूक्ष्म वित्त में प्रवेश का तरीका तलाश ही लिया। भुगतान योजनाओं के साथ भी यही हुआ।
एनबीएफसी, सूक्ष्म वित्त तथा भुगतान करने वाली संस्थाओं ने बैंकों को विवश किया कि वे अपने कारोबारी मॉडल पर पुनर्विचार करें और उन्हें बेहतर बनाएं। फिनटेक भी ऐसा ही करती दिखती हैं। यह सोचना गलत है कि फिनटेक बैंकों को प्रतिस्थापित करेंगी। बैंक ही उनका अनुसरण करेंगे या उन्हें अपना हिस्सा बना लेंगे।