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वैश्विक बैंकिंग की उज्ज्वल संभावनाएं

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Last Updated- December 10, 2022 | 11:12 AM IST

दुनिया की वित्तीय प्रणाली बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है, लेकिन वैश्विक वित्तीय संकट के सबक की वजह से बैंकों ने खुद को संभालने में कामयाबी दिखाई है। बता रहे हैं टीटी राम मोहन 
वर्ष 2007 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से यूक्रेन संघर्ष ने वृद्धि के लिए सबसे बड़ी चुनौती वाली स्थिति बना दी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का कहना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था वर्ष 2022 में 3.2 प्रतिशत और 2023 में 2.7 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। वर्ष 2020 के महामारी वर्ष को छोड़ दें तो 2023 में वृद्धि वर्ष 2010 के बाद सबसे कम होगी।
धीमी वृद्धि और बढ़ती ब्याज दरें बैंकों के लिए बुरी हैं। धीमी वृद्धि से फंसे हुए कर्ज में बढ़ोतरी होती है। बढ़ती ब्याज दरें बॉन्ड बाजार के घाटे में तब्दील हो जाती हैं। हैरानी की बात यह है कि ऐसा प्रतीत होता है कि वैश्विक बैंकिंग प्रणाली को इस कठिन समय में दिवालिया होने जैसे किसी भी बड़े जोखिम का सामना नहीं करना पड़ रहा है। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि वर्ष 2023 के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था सामान्य हो सकती है।
साथ ही हम यह भी मानकर चल रहे हैं कि किसी भी तरह के परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं होने जा रहा है और हम बड़े जोखिम की स्थिति से बच रहे हैं। दुनिया की वित्तीय प्रणाली धीमी वृद्धि और बढ़ती ब्याज दरों के अलावा बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। आईएमएफ की वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (जीएफएसआर, अक्टूबर 2022) ने इन चुनौतियों की सूची बनाई है:
चीन के आवासीय बाजार की चिंता: चीन में लॉकडाउन के सख्त नियमों की वजह से घरों की बिक्री प्रभावित हुई है। खरीदार संपत्ति की खरीद के लिए कोई अग्रिम भुगतान नहीं करना चाहते हैं। नतीजतन, डेवलपरों को नकदी के दबाव का सामना करना पड़ता है और कई दिवालिया हो गए हैं। इन संपत्ति में बैंकों का निवेश कुल ऋण का 28 प्रतिशत है। (भारत में प्रॉपर्टी बाजार में 10 फीसदी से ज्यादा का बैंक निवेश जोखिमपूर्ण माना जाता है)। आईएमएफ का अनुमान है कि चीन के बैंकों के नमूने लें तो उसमें से 15 प्रतिशत (ज्यादातर छोटे बैंक), न्यूनतम पूंजी आवश्यकता को पूरा करने में विफल हो सकते हैं।
बाजार में नकदी की कमी: केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीति में सख्ती ला रहे हैं और अपनी बैलेंसशीट को कम कर रहे हैं। इससे बाजार में नकदी कम हो गई है। ब्याज दरें बढ़ने पर निवेशक अपनी प्रतिभूतियां बेचना चाहेंगे। जब नकदी सीमित होती है, तब कीमतों में गिरावट तेज हो सकती है। प्रतिभूतियों को बेचकर बाहर निकलने की कोशिश करने वाले निवेशकों को अगर नुकसान उठाना पड़ता है तो इससे घबराहट की स्थिति पैदा हो सकती है।
जोखिम में कॉरपोरेट ऋण: बढ़ती ब्याज दरें, ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों के लिए चुनौतियां पैदा करती हैं। विकसित और उभरते बाजारों की समग्र तस्वीर सुंदर नहीं है। आईएमएफ के संवेदनशीलता विश्लेषण से पता चलता है कि तनाव की स्थिति में 50 प्रतिशत छोटी कंपनियों को ऋण चुकाने में कठिनाई होगी। ऐसे में बैंकों पर असर पड़ना तय है। आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि छोटी कंपनियों में दिवालियापन रोकने के लिए सरकारी समर्थन की आवश्यकता हो सकती है।
दबाव में लीवरेज्ड फाइनैंस: लीवरेज्ड फाइनैंस मूलतः ज्यादा कर्ज वाली या उधारी के खराब रिकॉर्ड वाली कंपनियों को उधार देने से जुड़ा है। ऐसे में यह ज्यादा प्रतिफल देने वाला वाली एक किस्म है। हाल के वर्षों में लीवरेज्ड फाइनैंस का बढ़ता हिस्सा ‘निजी उधारी’ या विनियमित बैंक बाजार और वित्तीय बाजारों के दायरे से बाहर मिलने वाले ऋण से जुड़ा है और इसकी गुणवत्ता खराब होती है। नतीजतन, आज अमेरिका में, लीवरेज्ड फाइनैंस का 50 प्रतिशत हिस्सा बी रेटिंग वाली कंपनियों से जुड़ा है या इसमें अपेक्षाकृत रूप से डिफॉल्ट का ज्यादा जोखिम रहता है। लीवरेज्ड फाइनैंस बाजार मौजूदा परिस्थितियों में जोखिम से भरा है।
आवास की कीमत में गिरावट: बढ़ती ब्याज दरें दुनिया भर में आवास की कीमतों में भारी गिरावट की स्थिति ला सकती हैं। जीएसएफआर का अनुमान है कि गंभीर रूप से प्रतिकूल परिदृश्य में, अगले तीन वर्षों में उभरते बाजारों में आवास की कीमतों में 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह गिरावट 10 प्रतिशत तक रह सकती है। गिरावट का बैंकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
बैंक इस तरह के गंभीर जोखिम से जुड़े हुए हैं। कोई यह सोच सकता है कि इनका मेल बैंकों के लिए आपदा का पिटारा खोल सकता है। जीएसएफआर की रिपोर्ट में सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि दुनिया के बैंक सबसे खराब स्थिति से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। इस समय वृद्धि से जुड़े सभी पूर्वानुमान आर्थिक परिस्थितियों पर आधारित हैं। इस वक्त यूक्रेन संघर्ष मौजूदा स्तर पर बना हुआ है। आसार हैं कि  तेल की कीमतें लगभग 92 डॉलर प्रति बैरल होंगी, मुद्रास्फीति अगली कुछ तिमाहियों में सामान्य स्तर पर होगी। लेकिन अगर हालात बिगड़ते हैं तब क्या होगा? अगर यूक्रेन संघर्ष बढ़ता है और अमेरिका के साथ उसके सहयोगी भी दूसरी बार प्रतिबंध लगा देंगे तब क्या होगा?
अभी हमने जिन जोखिम का जिक्र किया अगर वे सभी मिलकर एक परिणाम के रूप में दिखने लगते हैं तब क्या होगा? निश्चित रूप से  वैश्विक आर्थिक वृद्धि बुरी तरह प्रभावित होगी। आईएमएफ एक बेहद ही खराब परिदृश्य को देख रहा है। वृद्धि दर 2023 में 3.2 प्रतिशत के आधारभूत अनुमान से घटकर -3 प्रतिशत के नीचे आ गई और 2024 में यह सुधरकर लगभग 3 प्रतिशत हो गया है। बैंकिंग में वैश्विक कॉमन इक्विटी टियर 1 अनुपात (शुद्ध इक्विटी घटक) के जोखिम वाली परिसंपत्तियों के 2021 के 14.1 प्रतिशत से घटकर 2023 में 11.4 प्रतिशत और 2024 में 11.5 प्रतिशत होने के आसार हैं। ये सभी नियामक के न्यूनतम 4.5 प्रतिशत से ऊपर हैं।
उभरते बाजारों में बैंकों को एक गंभीर समस्या का सामना करना पड़ेगा: बैंकिंग परिसंपत्तियों के एक-तिहाई में योगदान देने वाले बैंकों को आवश्यक न्यूनतम पूंजी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, वैश्विक स्तर पर  जो बैंक 4.5 प्रतिशत की न्यूनतम पूंजी से नीचे हैं, वे वैश्विक बैंकिंग परिसंपत्तियों के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे। मान लीजिए कि वैश्विक वृद्धि प्रतिकूल परिस्थिति में 2024 में आईएमएफ के 3 प्रतिशत से अधिक के अनुमान से नीचे रहती है फिर भी, औसत तरीके से यह उम्मीद की जा सकती है कि वैश्विक स्तर पर बैंक, नियामकीय मानदंड से ऊपर होंगे।
हम इन परिणामों की व्याख्या कैसे करते हैं? वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से बैंकिंग तंत्र में बड़ा बदलाव आया है। बैंकरों को अहसास हो गया है कि यह नियामकीय मानदंडों से अधिक पूंजी रखने के लिए भुगतान करता है। बाजार उन्हें मूल्य  और बुक वैल्यू के अधिक अनुपात के साथ पुरस्कृत करता है क्योंकि यह इन बैंकों को जोखिम के लिहाज से कम संवेदनशील देखता है। नतीजतन, जब पूंजी पर्याप्तता की बात आती है तब बैंक नियामकीय दायरे से काफी आगे निकल जाते हैं।
इसी वजह से कठिन समय में भी बैंकिंग प्रणाली अच्छी स्थिति में खड़ी दिखती है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली के बारे में यह सच है। सिवाय इसके कि अन्य देशों की बैंकिंग प्रणाली के तनाव से दूर भारतीय बैंक आज बेहतर स्थिति में दिखाई देते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के 12 बैंकों ने मिलकर दूसरी तिमाही में पिछले साल की तुलना में कर के बाद मुनाफे में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की है। निजी बैंकों ने इसी अवधि में कर के बाद मुनाफे में 65 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की है। बैंकिंग प्रणाली में ऋण 17 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। अगर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य गंभीर हैं तब भारतीय बैंकों ने इस पर ध्यान नहीं दिया है!

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First Published - November 21, 2022 | 9:48 PM IST

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