लेख

जेनज़ी नहीं, नाराज अभिजात वर्ग बन रहा नए राजनीतिक असंतोष का सबसे बड़ा चेहरा

नीट और बेरोजगारी से उपजा युवा विरोध दरअसल साधन-संपन्न वर्ग के असंतोष को दर्शाता है। इसका स्थायी समाधान सत्ता और अवसरों के विकेंद्रीकरण में ही निहित है

Published by
आर जगन्नाथन   
Last Updated- August 04, 2026 | 9:50 PM IST

जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा आयोजित मीम्स से भरे युवाओं के विरोध प्रदर्शन में एक नारे ने मेरा ध्यान खास तौर से आक​र्षित किया-‘हालात इतने खराब हैं कि अब साधन-संपन्न लोग भी यहां आ गए हैं।’ दरअसल यही वह संकेत है जिसे हम बड़े पैमाने पर समझने से चूक गए हैं।

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट के पेपर लीक होने के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के प्रमुख प्रेरक वंचित तबके के लोग नहीं बल्कि अपेक्षाकृत कुलीन या साधन-संपन्न वर्ग के युवा थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि वंचित वर्ग इन प्रदर्शनों के समर्थन में नहीं था। बल्कि असल बात यह है कि इन आंदोलनों का नेतृत्व मुख्यतः उसी वर्ग से नहीं आया।

कथित जेनज़ी के बीच उभरती नई राजनीतिक चेतना की व्याख्या करने की जल्दबाजी में हमने इस पीढ़ी को उसकी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक शक्ति का श्रेय दे दिया जबकि कुलीन (साधन-संपन्न) वर्ग के भीतर बढ़ रहे मोहभंग और असंतोष को लगभग नजरअंदाज कर दिया गया। हालांकि यह खुद इस पीढ़ी के भीतर मौजूद विशाल विविधता की अनदेखी करने वाला एक सामान्यीकरण है।

इतिहास पर नजर डालें तो क्रांतियों का नेतृत्व अक्सर वे नहीं करते जो पीड़ा से गुजर रहे हों, बल्कि वे करते हैं जो सत्ताधारी कुलीन के बीच ही शक्ति को नए सिरे से तय करना चाहते हों। नाराज कुलीन वर्ग अपनी रुचियों को व्यक्त करने के लिए आम लोगों को पैदल सैनिकों के रूप में इस्तेमाल करता है। लेकिन असली प्रेरक शक्ति उनकी अपनी शिकायत होती है। यानी सत्ता पर काबिज लोगों द्वारा उन्हें हिस्सेदारी से वंचित किया जाना।

हमने इसे हाल के सभी आंदोलनों में देखा है। अन्ना हजारे के नेतृत्व वाला इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन कुलीन वर्ग द्वारा संचालित था, और अंतिम राजनीतिक लाभार्थी बने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और आम आदमी पार्टी (आप)।  दोनों का नेतृत्व ऐसे प्रभावशाली वर्गों ने किया जिनकी ताकत कम हो गई थी; उन्होंने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के सत्ता ढांचे के खिलाफ यह नेतृत्व किया, जो कई लोगों को हिंदू-विरोधी लगता था।

कृषि सुधार विरोधी आंदोलन गरीब किसानों द्वारा नहीं बल्कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शक्तिशाली समूहों द्वारा संचालित था जिन्होंने गरीब किसानों के नाम पर सुधारों को वापस लेने की मांग की। तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन संख्यात्मक रूप से मजबूत मध्यवर्ती जातियों के कुलीन वर्ग द्वारा संचालित था जो मानते थे कि राज्य सत्ता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का विरोध पसमांदा मुसलमानों द्वारा नहीं, बल्कि मुख्यतः अशराफ कुलीन वर्ग द्वारा संचालित था।

जेनज़ी की बढ़ती शक्ति आंशिक रूप से एक मिथक है क्योंकि जेनज़ी कोई एकीकृत समूह नहीं है। जंतर मंतर पर हुआ विरोध युवाओं में करियर और नौकरियों को लेकर व्यापक निराशा से प्रेरित था और इसकी कई परतें थीं। इनमें यह भावना भी शामिल थी कि आरक्षण सामान्य वर्ग के छात्रों के अवसरों को और कम कर रहा है। अवसर तो नीट के भीतर भी सीमित हैं।

20-22 लाख अभ्यर्थियों में से लगभग 5-6 फीसदी को ही सीटें मिलती हैं और इनमें से केवल आधे ही सरकारी संस्थानों में प्रवेश पा सकते हैं। इसका मतलब है कि बाकी को निजी मेडिकल संस्थानों में सीट पाने के लिए भारी शुल्क देना पड़ता है।

यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में जहां कई आइवी लीग शैक्षणिक संस्थान हैं वहां आवेदकों की संख्या की तुलना में प्रवेश पाने वालों का अनुपात 3 से 6 फीसदी तक ही होता है जबकि तीन-चौथाई से अधिक आवेदकों के पास जीपीए औसत के आधार पर न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता होती है।

असफल आवेदकों की भारी संख्या को इसलिए बाहर नहीं किया जाता कि उनमें क्षमता की कमी है बल्कि इसलिए कि सीटों की कमी है। इसका स्पष्ट समाधान है उपलब्ध सीटों की संख्या बढ़ाना ताकि सफलता का अनुपात सुधरे। इस पर भी सावधानी से नजर डालनी चाहिए। यदि अचानक भारत में पांच वर्षों में एमबीबीएस डॉक्टरों की संख्या दोगुनी या तिगुनी हो जाए तो मौजूदा डॉक्टरों और शिक्षा पर भारी खर्च करने डॉक्टरों, दोनों की ही कमाई में मिलने वाला अतिरिक्त फ़ायदा (इनकम प्रीमियम) कम हो जाएगा।

योग्य प्रतिभा की बढ़ती आपूर्ति आमतौर पर शिक्षा पूरी करने के बाद मिलने वाली आय को घटा देती है। इसमें प्रौद्योगिकी और स्वचालन (चाहे आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा या अन्य तरीकों से) जोड़ दें तो प्रतिभा का मूल्य अचानक गिरने लगता है। उदाहरण के लिए देखें कि सॉफ्टवेयर सेवा कंपनियां अब कैंपस से कितनी कम भर्ती कर रही हैं क्योंकि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस अधिकांश बुनियादी कोडिंग नौकरियां संभाल रहा है।

इसके अलावा इस क्षेत्र में शुरुआती वेतन 3 लाख रुपये से 3.50 लाख रुपये वार्षिक के स्तर पर पिछले 15 वर्षों से स्थिर है। जिसका कारण बुनियादी कोडिंग प्रतिभा की अधिक आपूर्ति है।

भारत की विशिष्ट समस्या यह है कि उच्च शिक्षा विकल्पों में संकुचन ठीक उसी समय हो रहा है जब काम करने लायक आयु वर्ग की युवा आबादी चरम पर है। अनुमान कि भारत की युवा आबादी (15-29 आयु वर्ग) अभी 36 करोड़ से अधिक है। अगले वर्ष जनगणना के आंकड़े आने पर यह और अधिक स्पष्ट हो जाएगा।

समस्या यह नहीं है कि नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं, बल्कि यह है कि वेतन स्तर और दी जाने वाली नौकरियों की गुणवत्ता स्वीकार्य नहीं है। शहरी सेवा क्षेत्र जिसमें प्लेटफॉर्म वर्क भी शामिल है, वहां 10 से 15 हजार रुपये प्रति माह देने वाली नौकरियां बहुत हैं लेकिन आकांक्षाओं के लिहाज से यह वह भविष्य नहीं है जिसकी अपेक्षा अपेक्षाकृत कुलीन परिवारों के बेटे-बेटियां कर रहे हैं। 

हम नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ असंतोष को तब तक पूरी तरह नहीं समझ सकते जब तक यह न समझें कि क्यों उनके राजनीतिक कार्यक्रमों से जुड़े कुलीन वर्ग भी आंशिक रूप से वंचित महसूस करते हैं। मोदी का स्वभाव केन्द्रीकरण का है और इससे शीर्ष पदों की संख्या उनके अपने समर्थकों के लिए भी अपर्याप्त हो जाती है।

व्यापक हिंदू कुलीन वर्ग से आने वाले विचार शायद ही शीर्ष स्तर तक पहुंचते हैं और यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जो अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से इस सरकार का समर्थन आधार है वह भी यह महसूस नहीं करता कि नीति-निर्माण में उसे पूरी तरह सुना जाता है।

मोहन भागवत, पी. मुरलीधर राव, मुरली मनोहर जोशी और रतन शारदा की ओर से जेनज़ी विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन को लेकर असंतोष की आवाजें उठी हैं। जहां तक उन मध्यवर्गों का सवाल है जिन्होंने मोदी का समर्थन किया था तो वंचित होने की भावना और भी बड़ी प्रतीत होती है। यदि मोदी इस असंतोष की जांच करें, तो पाएंगे कि यह असंतोष सबसे अधिक उन लोगों में है जो पारंपरिक रूप से विपक्ष को वोट नहीं देते, बल्कि उनके मुख्य समर्थकों में है।

कई लोगों का मानना है कि संप्रग से भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में सत्ता परिवर्तन ने ताकतवर हिंदू कुलीन वर्ग में अधिक समावेशन की भावना नहीं पैदा की है। यह केवल जेनज़ी का जागरण नहीं है। यह संकेत है कि मोदी समर्थक अभिजात वर्ग भी वर्तमान सत्ता संरचना में अपनी भूमिका से असंतुष्ट है और यद्यपि वे पार्टी लाइन से खुलकर असहमति नहीं जताते लेकिन वे सत्ता में पार्टी का उतना परिश्रमपूर्वक समर्थन करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें इसमें अपने लिए कुछ नहीं दिखता।

एकमात्र वास्तविक समाधान है समावेशन का आधार व्यापक करना, और इसका अर्थ है राज्यों और स्थानीय निकायों को अधिक सत्ता का विकेंद्रीकरण देना। जैसा कि इस लेखक सहित कई लोग लंबे समय से आग्रह करते रहे हैं। सीजेपी आंदोलन की सबसे बड़ी सच्चाई यही है। यदि कोई नेता या सरकार स्वयं को हर समस्या का समाधान मानती है तो किसी भी गलती के लिए दोष उसी पर आएगा।

आर्थिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से, विकेंद्रीकरण का मामला पहले कभी इतना मजबूत नहीं रहा। मोदी सरकार का लंबे समय तक टिकना इस बात पर निर्भर करता है कि वह इस सच्चाई को समझे और सत्ता के विकेंद्रीकरण के साथ-साथ अपने समर्थक प्रभावशाली वर्गों के लिए अवसरों का दायरा बढ़ाने की दिशा में सार्थक कदम उठाए।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : August 4, 2026 | 9:32 PM IST