इलेस्ट्रेशन: बिनय सिन्हा
बैंकों के गवर्नेंस या संचालन से जुड़ी समस्याओं का समाधान करने में बैंक बोर्ड की महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। लेकिन पिछले कुछ समय से भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने यह महसूस किया है कि बैंक बोर्ड स्वयं भी इस समस्या का एक हिस्सा बन गए हैं। आरबीआई के पिछले गवर्नर शक्तिकांत दास ने सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों के बोर्ड के साथ अलग-अलग बैठक करने की परंपरा शुरू की थी। इसका उद्देश्य निष्क्रिय बोर्ड को उनकी जिम्मेदारियों के प्रति अधिक गंभीर बनाना था। ऐसी ही एक बैठक में मैं भी मौजूद था। उस बैठक में दास ने एक सरल लेकिन महत्त्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि बोर्ड और बैंक प्रबंधन को अपेक्षाकृत युवा अधिकारियों को बैठकों में खुलकर अपनी राय रखने का अवसर देना चाहिए। संभव है कि शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को उनसे कुछ सीखने को मिले।
आरबीआई समय-समय पर बैंक बोर्डों को यह निर्देश देता रहा है कि बोर्ड की बैठकों में किन विषयों पर चर्चा होनी चाहिए। पिछले नवंबर में उसने वाणिज्यिक बैंकों के लिए संचालन से संबंधित मास्टर निर्देश जारी किए। हर बोर्ड बैठक में कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर बोर्ड की मंजूरी जरूरी होती है यानी उन पर सक्रिय चर्चा होनी चाहिए। इसके अलावा कुछ विषय केवल जानकारी के लिए बोर्ड के सामने रखे जाते हैं और इन्हें ‘नोटिंग’ आइटम कहा जाता है।
समय के साथ इन ‘नोटिंग’ आइटम की संख्या बढ़ती गई। किसी एक बोर्ड बैठक में ऐसे करीब 50 या उससे भी अधिक विषय होते हैं। आमतौर पर अध्यक्ष प्रत्येक विषय पर कम से कम दो-तीन मिनट देना उचित समझता है। इसका मतलब था कि केवल ‘नोटिंग’ आइटमों को देखने में ही डेढ़ से दो घंटे लग जाते हैं। इस दौरान बोर्ड के सदस्य अक्सर अपने मोबाइल फोन पर ईमेल और संदेश देखने में समय बिताते हैं।
तिमाही वित्तीय नतीजों वाली बैठक में परिणामों के प्रेजेंटेशन में ही दो घंटे या उससे अधिक समय लग जाता है। यानी नतीजों और ‘नोटिंग’ आइटमों को मिलाकर करीब चार घंटे खर्च हो जाते हैं। इससे बोर्ड के सामने मौजूद अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए पर्याप्त समय नहीं बचता। आरबीआई के सामने चुनौती यह थी कि अनिवार्य ‘नोटिंग’ आइटमों की संख्या कम की जाए ताकि बोर्ड अपना समय अधिक महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक मुद्दों पर लगा सकें।
जुलाई में आरबीआई ने नवंबर 2025 में जारी संचालन संबंधी निर्देशों में संशोधन किया। इन संशोधनों के तहत विषयों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
बोर्ड की मंजूरी वाले विषय: इनमें वे नीतियां शामिल हैं जिनकी मंजूरी बोर्ड से जरूरी है। इनमें कुछ नीतियों की जिम्मेदारी बोर्ड की समितियों को सौंपने का प्रावधान भी है। ऐसे कुल 19 विषय हैं, जिनमें कुछ के अंतर्गत कई उप-विषय भी शामिल हैं।
अन्य विषय: नीतियों के अलावा 18 विषय ऐसे हैं जिन्हें बोर्ड की मंजूरी के लिए, 6 विषय समीक्षा के लिए और 10 विषय बस जानकारी के लिए बोर्ड के सामने रखना होगा।
समितियों को सौंपे जा सकने वाले विषय: 38 ऐसे विषय हैं जिन्हें बोर्ड अपनी इच्छा के अनुसार विभिन्न समितियों को सौंप सकता है।
इस तरह कुल 37 नीतियां और विषय ऐसे हैं जिन पर बोर्ड की मंजूरी आवश्यक होगी। इसके अलावा 16 विषय बोर्ड के सामने समीक्षा या जानकारी के लिए आएंगे। यदि इसका अर्थ यह है कि अब ‘नोटिंग’ आइटम केवल 16 रह गए हैं। यह निश्चित रूप से एक बड़ा सुधार है।
वर्ष 2025 में जारी अपने निर्देशों में आरबीआई ने बैंक बोर्डों को सात प्रमुख विषयों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी थी। इनमें व्यावसायिक रणनीति, जोखिम प्रबंधन, अनुपालन, वित्तीय रिपोर्टिंग और उसकी विश्वसनीयता, ग्राहक संरक्षण, वित्तीय समावेशन और मानव संसाधन शामिल हैं। बैंक बोर्डों के लिए यह एक बहुत अच्छी और उपयोगी रूपरेखा थी।
नवीनतम संशोधनों में सात प्रमुख विषयों में से केवल दो, जोखिम प्रबंधन और ग्राहक संरक्षण का उल्लेख उन मामलों में किया गया है जिन पर बोर्ड की मंजूरी जरूरी है। पुराने मास्टर निर्देशों में अब एक नया पैराग्राफ जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि ऊपर बताई गई पहली दो श्रेणियों के अलावा, बोर्ड के सामने रखे जाने वाले विषयों में कुछ प्रमुख सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इनमें यह सिद्धांत भी शामिल है कि बैंक की व्यावसायिक रणनीति और वित्तीय मजबूती, महत्त्वपूर्ण कर्मचारियों से जुड़े फैसले, आंतरिक संगठन और प्रशासनिक ढांचा व प्रक्रियाएं तथा जोखिम प्रबंधन और अनुपालन की जिम्मेदारी अंततः बोर्ड की ही होती है।
लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि पुराने मास्टर निर्देशों की तुलना में इस बदलाव से वास्तव में क्या हासिल होता है। ऐसा कोई रास्ता नहीं है जिससे कोई बैंक बोर्ड अपनी रणनीति, वित्तीय रिपोर्टिंग या मानव संसाधन जैसे विषयों की जिम्मेदारी से बच सके। फिर इन सातों प्रमुख विषयों को उन मामलों में शामिल क्यों नहीं किया गया जिन पर बोर्ड की मंजूरी जरूरी है?
आरबीआई, नियामक के रूप में केवल यह निर्देश दे सकता है कि किन विषयों पर बोर्ड की मंजूरी ली जाए और किन विषयों को केवल जानकारी के लिए रखा जाए। लेकिन बोर्ड अपनी जिम्मेदारी कितनी अच्छी तरह निभाता है, यह एक अलग सवाल है।
पहली समस्या, साल में केवल चार तिमाही बैठकें, बैंक बोर्ड के सामने मौजूद इतने सारे मुद्दों पर चर्चा के लिए बिल्कुल पर्याप्त नहीं हैं। नीतियों और दूसरे महत्त्वपूर्ण विषयों को मंजूरी देने के लिए ही कम से कम दो-तीन बैठकें चाहिए। इसके अलावा, बैंक की सालाना कारोबारी योजना या दीर्घकालीन रणनीति को मंजूरी देने के लिए भी बोर्ड की एक अलग बैठक होनी चाहिए।
आरबीआई हर साल बैंकों को दो महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट देता है, वार्षिक वित्तीय निरीक्षण (एएफआई) रिपोर्ट और जोखिम आकलन रिपोर्ट (आरएआर)। एएफआई पर ऑडिट समिति विचार कर सकती है लेकिन आरएआर पर पूरे बोर्ड का ध्यान जरूरी है। इसे केवल जोखिम प्रबंधन समिति तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
इसके अलावा, किसी नियामकीय या अन्य अचानक सामने आए मुद्दे पर बैंक बोर्ड को कम समय के नोटिस पर भी बैठक करनी पड़ सकती है। अपनी जिम्मेदारियों को सही ढंग से निभाने के लिए बैंक बोर्ड को साल में लगभग आठ से दस बैठकें करनी पड़ सकती हैं।
दूसरी समस्या, महत्त्वपूर्ण विषयों, जैसे कारोबारी योजना या रणनीति से जुड़े प्रेजेंटेशन अक्सर बैठक से पहले बोर्ड के सदस्यों को उपलब्ध नहीं कराई जातीं। कई बार तो उन्हें बैठक से पहले बिल्कुल नहीं भेजा जाता। इसके बजाय बैठक में अचानक 100 से अधिक स्लाइड वाले प्रेजेंटेशन दिए जाते हैं जिनमें आंकड़ों और चार्ट की भरमार होती है।
इस स्तंभकार ने सुझाव दिया था कि ऐसे प्रेजेंटेशन बैठक से काफी पहले बोर्ड के सदस्यों को भेज दी जानी चाहिए और बैठक में उन्हें पढ़ा हुआ मान लिया जाना चाहिए। इससे बोर्ड की बैठक का समय प्रेजेंटेशन देखने के बजाय सवाल पूछने और महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाने में लगाया जा सकता है। लेकिन इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया गया।
तीसरी समस्या, कुछ विषयों को बैठक के अंत में अचानक मंजूरी के लिए रखा जाता है। ये ऐसे मामले होते हैं जिन्हें बैठक के आखिर में सामने रखा जाता है जब बोर्ड के सदस्य काफी देर से चल रही बैठक के बाद उठने की तैयारी में होते हैं और उनके मन में देर से मिलने वाले भोजन का ख्याल होता है।
इसके लिए कई तरह के कारण बताए जाते हैं मसलन नियामकीय समय-सीमा, कानूनी समय-सीमा या कारोबारी जरूरत आदि। लेकिन बोर्ड को स्पष्ट होना चाहिए कि कुछ विषयों को कभी भी ‘टेबल आइटम’ के रूप में नहीं रखा जा सकता।
अंतिम समस्या, बोर्ड के मूल्यांकन से जुड़ी है। इसमें स्वतंत्र निदेशक एक-दूसरे का मसलन प्रबंध निदेशक (एमडी) और चेयपर्सन यानी अध्यक्ष का मूल्यांकन करते हैं। चाहे यह मूल्यांकन बोर्ड खुद करे या किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम से कराया जाए, अक्सर बोर्ड इसे केवल एक औपचारिकता की तरह पूरा कर देते हैं।
आरबीआई यह देख सकता है कि क्या कभी किसी स्वतंत्र निदेशक को उसके साथियों ने खराब रेटिंग दी और उसके बाद उसका कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया गया। अगर किसी स्वतंत्र निदेशक को दोबारा नियुक्त नहीं किया जाता, तो इसकी वजह अक्सर यह होती है कि उसने एमडी या अध्यक्ष की नाराजगी मोल ले ली। इस तरह, बैंकों के संचालन की व्यवस्था को अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है।