1992 में शाहरुख खान की पहली बड़ी फिल्म ‘दीवाना’ रिलीज हुई और यहीं से उनके करियर ने असल उड़ान भरी
बॉलीवुड की बात करें तो शाहरुख खान उदारीकरण के बेहतरीन पोस्टर बॉय हैं। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में दिल्ली का यह लड़का टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय कर रहा था। लेकिन 1992 में उनकी पहली बड़ी फिल्म ‘दीवाना’ रिलीज हुई और यहीं से उनके करियर ने असल उड़ान भरी। जैसे-जैसे भारत वैश्विक आर्थिक रैंकिंग में ऊपर बढ़ा, शाहरुख भी सुपरस्टार बनने की राह पर आगे बढ़े।
‘डर’, ‘अंजाम’, ‘यस बॉस’ और ‘डुप्लिकेट’ जैसी उनकी कई हिट फिल्में सामान्य हिंदी सिनेमा से अलग थीं। ‘डर’ और ‘अंजाम’ में उन्होंने खलनायक का किरदार दमदार तरीके से निभाया और अपनी जबरदस्त छाप छोड़ी। ‘बाजीगर’ में वह ऐसे कातिल बने जिसे दर्शकों का खूब प्यार मिला। उनकी रोमांटिक और पारिवारिक फिल्में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ और ‘कुछ कुछ होता है’ जैसी फिल्मों ने भारत के लिए विदेशी बाजार के दरवाजे खोल दिए।
2012 के आसपास तक करीब एक दशक से अधिक समय तक भारतीय सिनेमा की कुल विदेशी कमाई में शाहरुख अभिनीत फिल्मों की कमाई की हिस्सेदारी आधे से भी अधिक रही। शाहरुख के करियर का सफर पिछले 35 वर्षों में भारतीय फिल्म उद्योग में हुए लगभग हर बदलाव के समानांतर चला। फिर चाहे वह 1,000 सीटों वाले सिंगल-स्क्रीन थिएटर हों, सैटेलाइट टीवी, मल्टीप्लेक्स या मौजूदा स्ट्रीमिंग का दौर।
1990 में जब शाहरुख अपने करियर को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे, दिल्ली का ही एक अन्य युवा अजय बिजली स्थानीय सरकार से फिल्म टिकटों की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त करने और उन पर लगने वाले 60 फीसदी मनोरंजन कर को कम कराने की कोशिश कर रहा था। 23 साल के बिजली दक्षिण दिल्ली में अपने परिवार के स्वामित्व वाले सिंगल स्क्रीन थिएटर प्रिया सिनेमा को नए रंग-रूप में ढाल रहे थे। उनका मानना था कि कर कम होने से कारोबार को मदद मिलेगी क्योंकि वीडियो पाइरेसी के कारण यह उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहा था।
1991 में दिल्ली सरकार ने टिकट की कीमतों के 80 फीसदी हिस्से को नियंत्रण-मुक्त करने की इजाजत दे दी लेकिन 1,000 सीटों में से 20 फीसदी सीटों के लिए प्रति टिकट 5 रुपये की अधिकतम सीमा बरकरार रखी। जब प्रिया और दूसरे सिंगल स्क्रीन थिएटर अच्छा कारोबार करने लगे तो मल्टीप्लेक्स की चर्चा शुरू हुई।
मल्टीप्लेक्स की राह उतनी आसान नहीं थी क्योंकि भारत को मल्टीप्लेक्स चलाने का अनुभव नहीं था और इसके लिए किसी विदेशी साझेदार की जरूरत थी। लेकिन समस्या यह थी कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति के बिना विदेशी साझेदार कैसे मिलेगा?
बिजली बताते हैं, ‘हमने सरकार के समक्ष एफडीआई की अनुमति का मुद्दा उठाने के लिए अर्न्स्ट ऐंड यंग (अब ईवाई) और डीपीएनसी नाम की फर्म की सेवा ली। 1995 में हम पहली ऐसी कंपनी थे जिसमें विलेज रोडशो (ऑस्ट्रेलियाई थिएटर श्रृंखला) को 40 फीसदी हिस्सेदारी के लिए निवेश करने की विशेष अनुमति मिली। हालांकि बहुमत भारतीय साझेदार के पास ही रखने का प्रावधान किया गया था।’
उन्हें जो बात आज भी याद है वह यह कि विचारों में खुलापन था। आप प्रदर्शन कारोबार में हों या किसी और क्षेत्र में, देश भर की सरकारी संस्थाएं बदलाव के लिए सहर्ष तैयार थीं। आम सोच यह थी कि विदेश के सिनेमा उद्योग में जो हो रहा है वह भारत में भी होना चाहिए।
वर्ष 1997 में पीवीआर अनुपम खुला। दिल्ली में यह भारत का पहला मल्टीप्लेक्स था जिसमें चार स्क्रीन थीं। इसके अगले साल 1998 के मध्य में सिनेमा को उद्योग का दर्जा देने की घोषणा की गई जिसे 2000 में अधिसूचित किया गया। इसी दौरान मीडिया और मनोरंजन कारोबार पर केंद्रित एक वार्षिक सम्मेलन फिक्की फ्रेम्स शुरू हुआ और जल्द ही सिनेमा उद्योग में 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति दे दी गई और भारतीय बैंकिंग संघ ने फिल्म उद्योग को ऋण देने के नियम जारी किए। इस दौरान मुक्ता आर्ट्स, एडलैब्स फिल्म्स और बालाजी टेलीफिल्म्स जैसी कई फर्मों के
आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भी आए। बाद में मुक्ता और एडलैब्स का विलय हो गया। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने मल्टीप्लेक्स बनाने के लिए कर छूट की पेशकश की जिससे मल्टीप्लेक्स की होड़ लग गई। कुल मिलाकर 2000 के बाद से सिनेमा कारोबार में सकारात्मक माहौल बन गया था।
शशि कपूर असल जिंदगी और वास्तविक कहानियों पर आधारित फिल्मों को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते थे। श्याम बेनेगल की ‘कलयुग’ (1981) और गोविंद निहलानी की ‘विजेता’ (1982) उन बेहतरीन फिल्मों में से हैं जिनके वे निर्माता थे। रमेश शर्मा की राजनीतिक थ्रिलर ‘नई दिल्ली टाइम्स’ (1986) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।
ये कुछ ऐसी फिल्में हैं जिन्हें बिजली बचपन में बहुत पसंद करते थे। बिजली कहते हैं, ‘लेकिन इन फिल्मों को कभी ठीक से दिखाया नहीं जाता था। वे कला फिल्में नहीं थीं। बस कम बजट में बनी शानदार फिल्में थीं जो खास दर्शक वर्ग के लिए बनाई गई थीं। मैं बहुत खुश था कि अचानक आपके पास ऐसी क्षमता और थिएटर आ गए थे, जिनमें इन फिल्मों को भी दर्शक मिल सकते थे।’
मल्टीप्लेक्स को लेकर सबसे पहले उत्साहित होने वालों में हॉलीवुड स्टूडियो थे। बिजली बताते हैं, ‘उन्होंने कहा कि अगर आपके पास 200-300 सीटों वाले सिनेमाघर हैं तो हम उन फिल्मों को भारत ला सकते हैं जिन्हें पहले यहां प्रदर्शित नहीं किया जाता था। इससे पहले वे केवल ब्लॉकबस्टर फिल्में ही भारत में प्रदर्शित करते थे।’
1,000 सीटों वाले थिएटरों को ‘तेजाब’ (1988), ‘राम लखन’ (1989) या ‘जुरासिक पार्क’ (1994) जैसी बड़ी फिल्में चाहिए होती थीं। लेकिन वीडियो पाइरेसी के साथ-साथ 1990 के दशक के मध्य तक सैटेलाइट टीवी आने के बाद ये फिल्में भी पहले की तरह कारोबार नहीं कर पाईं।
हालांकि टीवी ने आय का एक वैकल्पिक स्रोत तैयार करने में मदद की। इसने उस समय कारोबार को टिकाए रखा, जब सिनेमाघरों में जाने वाले लोगों की संख्या लगातार घट रही थी। इसके साथ भारतीय सिनेमा के लिए विदेशी बाजार भी खुल गया था और 1990 के दशक के मध्य में सूरज बड़जात्या (हम आपके हैं कौन), आदित्य चोपड़ा (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे), करण जौहर (कभी खुशी कभी गम) और यश चोपड़ा (दिल तो पागल है) की फिल्मों के कारण तेजी से बढ़ा।
उन दिनों अमेरिका, यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में रहने वाला भारतीय प्रवासी समुदाय अपने देश से जुड़ाव चाह रहा था। वीडियो कॉलिंग और विदेश यात्रा के आसान होने से पहले के उस दौर में यह नया बाजार भारतीय सिनेमा के लिए नया क्षेत्र बन गया। 2004 के आसपास मल्टीप्लेक्सों ने फर्क पैदा करना शुरू कर दिया।
‘अस्तित्व’ (2000) और ‘इकबाल’ (2005) से लेकर ‘कल हो ना हो’ (2003) और ‘हम तुम’ (2004) तक अलग-अलग तरह की फिल्मों को दिखाने की क्षमता बढ़ी। शो और टिकटों की कीमतें बढ़ाने या घटाने की क्षमता का मतलब था कि हर तरह की फिल्म से अधिकतम कमाई करना। ‘ओम शांति ओम’ (2007) जैसी फिल्म को 300-400 सीटों वाले बड़े थिएटर में स्क्रीन मिलती थी जबकि ‘पीपली लाइव’ (2010) जैसी फिल्म 100-150 सीटों वाले थिएटर में चलती थीं।
मल्टीप्लेक्सों का सबसे बड़ा बदलाव पारदर्शिता था। हर बिकने वाले टिकट का कंप्यूटरीकरण होने लगा और उसका हिसाब दर्ज होने लगा। लंबे समय तक थिएटर अपनी कमाई कम दिखाते रहे थे। हिंदी पट्टी के इलाकों में आपको टिकट नहीं दिया जाता था। बस आपके हाथ पर मुहर लगा दी जाती थी और वही हॉल में प्रवेश का टिकट होता है। 2004-05 तक जैसे-जैसे मल्टीप्लेक्स का विस्तार हुआ फिल्म से होने वाली कमाई का हिस्सा ट्रेड और प्रोडक्शन कंपनियों के बीच साझा होने लगा। न्यूनतम गारंटी वाले सौदे खत्म होने लगे।
उद्योग में आते इस पैसे, लचीला स्क्रीन पारिस्थितिकी तंत्र, ज्यादा लोगों तक पहुंचने की चाह रखने वाले सैटेलाइट चैनलों और नए निवेशकों व विदेशी स्टूडियो (फॉक्स स्टार, सोनी, वार्नर, डिज्नी) से मिले पैसे ने फिल्म निर्माताओं की एक नई पीढ़ी को आगे बढ़ने और कामयाब होने का मौका दिया। इनमें वेत्रिमारन (पोल्लाधवन), विशाल भारद्वाज (ओंकारा, कमीने), जोया अख्तर (लक बाय चांस, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा), श्रीराम राघवन (जॉनी गद्दार, बदलापुर), फरहान अख्तर (दिल चाहता है, लक्ष्य) और कई अन्य शामिल थे।
1980 और 90 के दशक में इनकी फिल्मों का भी वही हाल होता जो शशि कपूर की फिल्मों का हुआ था यानी उन्हें बहुत कम स्क्रीनिंग वाली आर्टहाउस फिल्मों की श्रेणी में डाल दिया जाता। लेकिन मल्टीप्लेक्स ने उन्हें नई उड़ान दी और दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित किया।
यहीं से ‘मल्टीप्लेक्स फिल्म’ का जन्म हुआ। उन फिल्मों से पैसा कमाना आसान था जो सिर्फ शहरी भारत और विदेशी बाजारों को ध्यान में रखकर बनाई जाती थीं। छोटे शहर और ग्रामीण भारत, जहां सिंगल-स्क्रीन थिएटरों का दबदबा था, कई फिल्मों के रिलीज मानचित्र से बाहर होने लगे।
उद्योग के मंचों पर यह बहस होने लगी कि मल्टीप्लेक्स रचनात्मकता पर हावी हो रहे हैं। छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन थिएटरों में कुछ सबसे बड़ी हिट फिल्में जैसे सूरज बड़जात्या की ‘विवाह’ (2006) मल्टीप्लेक्सों में बामुश्किल प्रदर्शित हुई। ‘शिवाजी: द बॉस’ (2007) या ‘3 ईडियट्स’ (2009) पूरे देश में चलीं लेकिन हिंदी में ज्यादातर हिट फिल्में उन शहरों से आ रही थीं जहां मल्टीप्लेक्स थे।
सिनेमा के दूसरे बड़े बाजार तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना मुखर रूप से सिंगल-स्क्रीन बाजार बने रहे और उन्होंने आम दर्शकों के लिए बनने वाली फिल्मों को जिंदा रखा। वहां के सिनेमाघर कॉरपोरेटकरण और संगठित फाइनैंसिंग से काफी हद तक अछूते रहे। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जो तेलुगु सिनेमा का घर हैं, वहां थिएटरों का स्वामित्व बड़े निर्माताओं के पास है। इससे पूंजी के प्रवाह को बनाए रखने में मदद मिलती है। इसके परिणामस्वरूप वहां ‘पुष्पा 1’ और ‘पुष्पा 2’ या ‘आरआरआर’ जैसी बड़ी लोकप्रिय फिल्में बनती हैं जो 1,000 सीटों वाले थिएटर को भर सकती हैं।
दूसरी ओर केरल छोटी लेकिन लोकप्रिय और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्मों की राजधानी बना रहा। ‘मंजुम्मेल बॉयज’, ‘दृश्यम’, ‘वाज्हा’ या ‘काठल: द कोर’ जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि आज ऐसी फिल्मों को स्ट्रीमिंग और सिनेमाघरों, दोनों जगह दर्शक मिल रहे हैं। पिछले चार वर्षों में मलयालम सिनेमा ने राष्ट्रीय बॉक्स ऑफिस में अपनी हिस्सेदारी लगभग दोगुनी कर ली है।
सभी तरह की फिल्मों का मुख्यधारा में आना स्ट्रीमिंग से आए सबसे बड़े बदलावों में से एक है। इससे भारत को सिनेमा का एकीकृत बाजार में बदलने की प्रक्रिया पूरी होती है। कई वर्षों तक हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्म निर्माताओं ने ऐसी फिल्में बनाने की कोशिश की जिसे देश भर के दर्शक पसंद करें लेकिन कहानीकार और दर्शक इसके लिए तैयार नहीं थे। हालांकि ‘अंधा कानून’ (1983, रजनीकांत और अमिताभ बच्चन) या ‘सदमा’ (1983, कमल हासन और श्रीदेवी) अपवाद थीं।
नई सदी की शुरुआत तक हिंदी सामान्य मनोरंजन चैनलों ने तमिल और तेलुगु फिल्मों के डब संस्करण दिखाना शुरू कर दिया जिससे उन्हें हिंदी भाषी इलाकों में बड़ी तादाद में दर्शक मिले। जब 2016 में स्ट्रीमिंग का चलन बढ़ा तो हिंदी, तमिल, बांग्ला, तेलुगु, मराठी और दूसरी भाषाओं की फिल्मों को अपने पारंपरिक बाजारों के बाहर भी दर्शक मिलने लगे।
कुछ ही वर्षों में इसका असर बॉक्स ऑफिस की सफलता में भी दिखने लगा, खासकर तेलुगु फिल्मों के मामले में। भारतीय अब देश के अलग-अलग हिस्सों की फिल्में देख और पसंद कर रहे हैं।
इस बात पर काफी बहस हो रही है कि कैसे स्ट्रीमिंग ने फिल्मों के कारोबार को बरबाद कर दिया है या यह कैसे बेहतर कंटेंट देती है। हालांकि टेलीविजन की तरह ही स्ट्रीमिंग एक मौका है और अपने काम को और बेहतर बनाने की वजह भी। स्ट्रीमिंग पर लगभग हर हिट शो जैसे ‘स्कैम 1992’, ‘प्रीतम ऐंड पेड्रो’ या ‘मिर्जापुर’ उन्हीं फिल्म निर्माताओं या स्टूडियो की हैं जो लोकप्रिय फिल्में बनाते हैं। जिस देश में हर साल लगभग 1,700 फिल्में बनती हों वहां गुणवत्ता हमेशा बहस का मुद्दा रहेगी।
सच तो यह है कि इस कारोबार के दो-तिहाई से अधिक राजस्व आज भी सिनेमाघरों से आता है। स्ट्रीमिंग या कोई दूसरा माध्यम इसकी भरपाई नहीं कर सकता। और यही वजह है कि सिनेमाघर आज भी फिल्म के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सर्वोपरि हैं। असली समस्या कंटेंट नहीं, बुनियादी ढांचा है।
इस विकास की कहानी में भारतीय सिनेमा को सबसे ज्यादा नुकसान बुनियादी ढांचे की कमी ने पहुंचाया है, कंटेंट या उसकी गुणवत्ता ने नहीं। करीब 20 साल पहले 24 करोड़ से अधिक लोग नियमित रूप से सिनेमाघरों में फिल्म देखने जाते थे। 1990 के दशक की शुरुआत में देश भर में 12,000 स्क्रीन थे जो अब सिकुड़ कर 9,000 से भी कम रह गए हैं।
दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्म निर्माण करने वाले देश भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर करीब 6 स्क्रीन हैं। इसकी तुलना में अमेरिका में यह संख्या 109 और चीन में 64 है। भारत के ऐसे कई इलाके हैं जहां वर्षों से कोई सिनेमाघर नहीं है। भले ही सिनेमा जाने वाले सभी 15.7 करोड़ लोगों ने ‘धुरंधर’ को बड़े पर्दे पर देखा हो फिर भी इसे देश की केवल 11 फीसदी आबादी ने ही देखा। भारत के 19,000 पिन कोड में से 16,350 में एक भी स्क्रीन नहीं है। और ये ऐसे पिन कोड नहीं हैं जहां इंटरनेट की व्यापक पहुंच हो और हाई-बैंडविड्थ वाले ढेरों उपकरण मौजूद हों।
ये वे जगहें हैं जहां लोग पुरानी फिल्में देखने के लिए साधारण स्मार्टफोन पर यूट्यूब का सहारा लेते हैं या डीडी फ्रीडिश लगाते हैं क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है।
जब भी बुनियादी ढांचे को प्रोत्साहन मिला है जैसे मल्टीप्लेक्सों के मामले में हुआ था, फिल्मों का निर्माण और उन्हें देखने का अनुभव, दोनों बेहतर हुआ है।
भारत के पास सबसे बड़ा अवसर अपना घरेलू बाजार है। भारतीय सिनेमा की वैश्विक सॉफ्ट पावर को लेकर बहुत चर्चा होती है। लेकिन वैश्विक बाजार में हमारी मौजूदगी हॉलीवुड या कोरिया की तुलना में बहुत कम है।
भारतीय फिल्म कारोबार वर्षों से 1.5 से 2 अरब डॉलर के स्तर पर है। इस रकम का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा भारतीयों द्वारा भारतीय फिल्में देखने से आता है। लेकिन 83.2 करोड़ टिकट या कुल राजस्व उस सिनेमा के लिए बहुत कम है जिसने हॉलीवुड की ताकत का 100 साल से ज्यादा समय तक सामना किया है जबकि लगभग हर दूसरे देश का सिनेमा ढह गया।
20,000 से 30,000 स्क्रीन और 5 से 10 अरब डॉलर के बाजार आकार के साथ ही भारतीय फिल्म कारोबार इतना बड़ा हो पाएगा कि उसमें दुनिया का मुक़ाबला करने के लिए रचनात्मक और वितरण, दोनों तरह की काबिलियत आ सके।
इस दिशा में कुछ प्रयास शुरू हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल में स्थानीय स्टूडियो एसवीएफ द्वारा जर्जर हो चुके सिनेमाघरों को अपने नियंत्रण में लेने, पट्टे पर लेने, उनका प्रबंधन करने या उनका स्वामित्व हासिल करने के फैसले से उसके राजस्व को दोगुना करने और लोगों को सिनेमाघरों में वापस लाने में मदद मिली।
पीवीआर ने इस हफ्ते बिहार के मुजफ्फरपुर में अपनी पहली स्मार्ट स्क्रीन शुरू की है। कंपनी की योजना अगले 5 वर्षों में छोटे-मझोले शहरों में 1,000 स्मार्ट स्क्रीन शुरू करने की है। सिनेमाघरों के निर्माण को बुनियादी ढांचे का दर्जा देने की कई मांगें की गई हैं।
यह अपील भी की गई है कि सभी टिकटों को माल एवं सेवा कर 18 फीसदी के बजाय 5 फीसदी के दायरे में लाया जाए। अभी कुछ टिकट ही इस कर दायरे में आते हैं। यदि उदारीकरण के बाद वाले दशक में बदलाव के लिए जो नीतिगत इच्छाशक्ति दिखाई गई थी, वह वापस आती है तो इनमें से बहुत कुछ किया जा सकता है।