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ITR Filing Mistakes: फ्रीलांसरों की ये छोटी गलतियां बन सकती हैं बड़ी मुसीबत, 31 अगस्त से पहले जरूर कर लें चेक

31 अगस्त 2026 की ITR डेडलाइन से पहले फ्रीलांसर और प्रोफेशनल्स सही फॉर्म चुनने के साथ AIS, TDS, GST और सभी आय का मिलान जरूर करें।

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संजीव सिन्हा   
Last Updated- August 26, 2026 | 1:42 PM IST

ITR Filing 2026: फ्रीलांसर और प्रोफेशनल्स के लिए इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करना सिर्फ सालभर की कमाई बताने और टैक्स चुकाने तक सीमित नहीं है। सही ITR फॉर्म चुनना, आय और दस्तावेजों का मिलान करना, GST की सही जानकारी देना और आय के सभी स्रोतों का खुलासा करना भी जरूरी है। वित्त वर्ष 2025-26 यानी आकलन वर्ष 2026-27 के लिए जिन टैक्सपेयर्स के खातों का ऑडिट जरूरी नहीं है, उनके लिए ITR दाखिल करने की अंतिम तारीख 31 अगस्त 2026 है।

टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, रिटर्न भरते समय छोटी-सी गलती भी टैक्स नोटिस, रिफंड में देरी या उपलब्ध टैक्स लाभ गंवाने का कारण बन सकती है। इसलिए सेल्फ-एम्प्लॉयड टैक्सपेयर्स को रिटर्न दाखिल करते समय इन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए।

ITR भरते समय इन गलतियों से बचें

नांगिया एंड कंपनी के वरिष्ठ पार्टनर नीरज अग्रवाल के मुताबिक, बिजनेस या प्रोफेशन से आय वाले लोगों की आम गलतियों में गलत ITR फॉर्म चुनना, अपनी प्राप्तियों का बुक्स और बैंक स्टेटमेंट से मिलान न करना और GST रिकॉर्ड, TDS, Form 26AS तथा AIS की जानकारी को चेक किए बिना रिटर्न दाखिल करना शामिल है।

वह बताते हैं कि अगर किसी टैक्सपेयर को बिजनेस या प्रोफेशनल लॉस को आगे के वर्षों में ले जाना है, तो ITR की समय पर फाइलिंग बेहद जरूरी है। इसके अलावा प्रिजम्प्टिव और रेगुलर टैक्सेशन में सही विकल्प चुनना और टैक्स रिजीम का फैसला भी सावधानी से करना चाहिए।

ITR-3 या ITR-4, कौन सा फॉर्म सही?

बिजनेस या प्रोफेशन से आय वाले व्यक्तियों के लिए ITR-3 और ITR-4 का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दोनों की पात्रता अलग है।

ITR-3 उन व्यक्तियों और HUF के लिए है, जिनकी आय बिजनेस या प्रोफेशन से होती है। वहीं ITR-4 कुछ पात्र निवासी व्यक्तियों, HUF और LLP को छोड़कर कुछ फर्मों के लिए सरल विकल्प है। इसमें कुल आय ₹50 लाख तक होने और निर्धारित शर्तों के तहत प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन का लाभ लेने जैसी शर्तें लागू होती हैं।

नीरज अग्रवाल के अनुसार, प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन अपनाने वाला हर व्यक्ति ITR-4 का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यदि टैक्सपेयर ITR-4 की शर्तें पूरी नहीं करता, तो उसे ITR-3 दाखिल करना पड़ सकता है।

उदाहरण के लिए, ₹1.25 लाख से अधिक का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन होने या विदेशी आय अथवा विदेशी संपत्ति होने की स्थिति में ITR-3 की जरूरत पड़ सकती है, क्योंकि इसमें विदेशी आय और विदेशी संपत्ति की जानकारी देने के लिए जरूरी शेड्यूल उपलब्ध होते हैं।

Section 44AD और 44ADA में अंतर समझें

प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन को लेकर सबसे आम गलतियों में Section 44AD और Section 44ADA को एक जैसा समझना शामिल है। दोनों अलग-अलग तरह के टैक्सपेयर्स पर लागू होते हैं।

Section 44ADA कुछ निर्धारित प्रोफेशनल्स के लिए है। इसके तहत सामान्य तौर पर कुल प्रोफेशनल रिसीट्स का 50% टैक्स योग्य आय माना जाता है। अगर कैश में प्राप्तियां कुल रिसीट्स के 5% से अधिक नहीं हैं, तो इसकी सीमा ₹50 लाख से बढ़कर ₹75 लाख हो सकती है।

वहीं Section 44AD सामान्य तौर पर पात्र बिजनेस के लिए लागू होता है। इसमें निर्धारित परिस्थितियों में टर्नओवर का 8% या कुछ डिजिटल प्राप्तियों के मामले में 6% आय मानी जाती है। कैश रिसीट्स 5% से अधिक न होने पर सीमा ₹3 करोड़ तक और अन्य मामलों में ₹2 करोड़ तक हो सकती है।

नेरज अग्रवाल कहते हैं कि टैक्सपेयर प्रिजम्प्टिव स्कीम के तहत निर्धारित दर से कम आय अपनी मर्जी से घोषित नहीं कर सकते। ऐसा करने पर नियमित टैक्स प्रावधान लागू हो सकते हैं और किताबें बनाए रखने तथा जहां जरूरी हो, वहां अकाउंट्स का ऑडिट कराने की जरूरत पड़ सकती है।

44ADA में अलग से खर्च का दावा नहीं

Section 44ADA के तहत प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन अपनाने वाले पात्र प्रोफेशनल्स अपनी वास्तविक प्रोफेशनल या बिजनेस लागत को अलग से खर्च के रूप में घटा नहीं सकते। 50% की निर्धारित आय में ऐसे खर्चों को शामिल माना जाता है।

Richa Sawhney बताती हैं कि नियमित टैक्स व्यवस्था के तहत टैक्सपेयर अपने प्रोफेशन के लिए पूरी तरह और विशेष रूप से किए गए वास्तविक खर्चों का दावा कर सकता है। ऐसे में इनवॉइस, बिल, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान रिकॉर्ड, क्लाइंट कॉन्ट्रैक्ट और खरीदी गई बिजनेस एसेट से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखना जरूरी है।

फ्रीलांसिंग से होने वाली पूरी कमाई दिखाएं

फ्रीलांसर को सालभर में हुई सभी प्रोफेशनल प्राप्तियां ITR में दिखानी चाहिए। भुगतान बैंक ट्रांसफर, UPI, पेमेंट गेटवे, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या मार्केटप्लेस के जरिए मिला हो, सभी को आय में शामिल करना जरूरी है।

विदेशी क्लाइंट से मिली फीस या अन्य प्रोफेशनल आय को भी रिपोर्ट करना चाहिए। भुगतान किस माध्यम से मिला है, इसके आधार पर आय को ITR से बाहर नहीं किया जा सकता।

AIS और Form 26AS का मिलान करें

ITR दाखिल करने से पहले अपनी आय, TDS और अन्य वित्तीय जानकारी का AIS और Form 26AS से मिलान जरूर करें।

रिचा साव्हनी के मुताबिक, अगर किसी डिडक्टर ने TDS काटा है लेकिन Form 26AS में वह सही तरीके से दिखाई नहीं दे रहा है, तो टैक्सपेयर को संबंधित डिडक्टर से संपर्क करना चाहिए और TDS स्टेटमेंट में सुधार या संशोधित रिटर्न दाखिल करने के लिए कहना चाहिए।

समय रहते इस तरह के अंतर को ठीक करने से टैक्स नोटिस, विवाद और रिफंड की प्रोसेसिंग में होने वाली देरी से बचने में मदद मिल सकती है।

अगर AIS में कोई गलत जानकारी दिखाई दे रही है, तो टैक्सपेयर को पहले उसके स्रोत की जांच करनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर इनकम टैक्स पोर्टल पर उपलब्ध AIS फीडबैक सुविधा के जरिए इस पर प्रतिक्रिया भी दी जा सकती है।

GST को अपनी आय में न जोड़ें

फ्रीलांसर और प्रोफेशनल्स को GST को लेकर भी सावधानी बरतनी चाहिए। अगर इनवॉइस में GST की रकम अलग से ग्राहक से वसूली गई है, तो सामान्य तौर पर इसे अपनी प्रोफेशनल आय का हिस्सा नहीं माना जाता, क्योंकि यह सरकार की ओर से वसूला गया टैक्स है।

Deepashree Shetty के अनुसार, GST को गलती से सकल प्राप्तियों में शामिल करने पर टर्नओवर अनावश्यक रूप से बढ़ सकता है। इससे प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन की सीमा को लेकर समस्या पैदा हो सकती है और GST रिटर्न तथा ITR में आंकड़ों का अंतर भी सामने आ सकता है।

इससे TDS के साथ आय का मिलान करने में भी परेशानी हो सकती है। इसलिए GST की रकम को अपनी वास्तविक प्रोफेशनल रिसीट्स से अलग रखना जरूरी है।

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ब्याज और दूसरी आय भी बताना जरूरी

कई फ्रीलांसर अपनी प्रोफेशनल आय तो ITR में दिखाते हैं, लेकिन दूसरी आय का खुलासा करना भूल जाते हैं। सेविंग अकाउंट और FD का ब्याज, डिविडेंड, कैपिटल गेन, दूसरी प्रॉपर्टी से किराये की आय और लागू होने पर ₹50,000 से अधिक के गिफ्ट जैसी आय की जानकारी भी देनी चाहिए।

दीपाश्री शेट्टी के मुताबिक, भारतीय आय की जानकारी छूटने पर AIS जैसी रिपोर्टिंग के जरिए मामला सामने आ सकता है। ऐसी स्थिति में आय की प्रकृति और मामले के आधार पर अतिरिक्त टैक्स, ब्याज और जुर्माना लग सकता है।

विदेशी आय और विदेशी संपत्ति के मामले में लागू डिस्क्लोजर नियमों का पालन करना भी जरूरी है। विदेशी संपत्ति की जानकारी छिपाने पर गंभीर जुर्माना और कुछ मामलों में कानूनी कार्रवाई का जोखिम हो सकता है।

लॉस को आगे ले जाना है तो समय पर भरें ITR

अगर टैक्सपेयर बिजनेस, कैपिटल गेन या सट्टा कारोबार से हुए नुकसान को भविष्य के वर्षों में आगे ले जाना चाहता है, तो सामान्य तौर पर ITR मूल नियत तारीख तक दाखिल करना जरूरी होता है।

हालांकि, हाउस प्रॉपर्टी से होने वाले नुकसान और अनएब्जॉर्ब्ड डेप्रिसिएशन के लिए अलग नियम हैं। इसलिए सभी तरह के नुकसान पर एक जैसा नियम लागू नहीं होता।

दीपाश्री शेट्टी के अनुसार, टैक्सपेयर को लॉस के सेट-ऑफ और कैरी-फॉरवर्ड के बीच अंतर भी समझना चाहिए। फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस यानी F&O से हुए नुकसान को भी सही तरीके से रिपोर्ट करना जरूरी है। ऐसे मामलों में सामान्य तौर पर ITR-3 की जरूरत होती है, न कि ITR-4 की।

टैक्स रिजीम का चुनाव भी सोच-समझकर करें

फ्रीलांसर और प्रोफेशनल्स को प्रिजम्प्टिव या रेगुलर टैक्सेशन का विकल्प चुनने से पहले अपनी आय और खर्च का आकलन करना चाहिए। इसी तरह नई और पुरानी टैक्स व्यवस्था में से चुनाव करते समय उपलब्ध डिडक्शन, मौजूदा टैक्स देनदारी और भविष्य की आय को भी ध्यान में रखना बेहतर है।

First Published : August 26, 2026 | 1:42 PM IST