प्रतीकात्मक तस्वीर
नए इक्विटी म्युचुअल फंड के जरिये जुटाई गई रकम कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली छमाही में घटकर छह साल के निचले स्तर पर आ गई। इसका मुख्य कारण बाजार में काफी उतार-चढ़ाव के कारण निवेशकों की घटती रुचि और नए फंड जारी करने पर नियमों की सख्ती का दबाव है। हालांकि यह नरमी केवल ऐक्टिव इक्विटी फंडों तक ही सीमित नहीं है। छमाही के दौरान इक्विटी, डेट, हाइब्रिड, पैसिव और फंड ऑफ फंड्स श्रेणियों में एनएफओ के जरिये जुटाई गई कुल रकम 13,040 करोड़ रुपये पर 10 साल के निचले स्तर पर लुढ़क गई।
अप्रैल से जून 2026 की अवधि में फंड हाउसों ने 23 ऐक्टिव इक्विटी योजनाएं लॉन्च कीं लेकिन इनसे कुल 7,092 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके। यह कोविड-19 प्रकोप के दौरान 2020 की पहली छमाही के बाद किसी एक छमाही के दौरान एनएफओ द्वारा जुटाई गई सबसे कम रकम है। एक साल पहले की समान अवधि में फंड हाउसों ने 25 एनएफओ के जरिये कुल 10,690 करोड़ रुपये जुटाए थे।
एनएफओ गतिविधियां शेयर बाजार की धारणा के साथ बेहद करीबी से जुड़ी होती हैं। फंड हाउस आम तौर पर बाजार में तेजी के दौरान अधिक योजनाएं जारी करती हैं। एनएफओ और उनके जरिये जुटाई गई रकम 2024 में सबसे अधिक थी। मगर पिछले 18 महीनों के दौरान उसकी रफ्तार काफी सुस्त हो गई है। शेयर बाजार में काफी उतार-चढ़ाव के कारण निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ने इस साल निवेशकों की धारणा को काफी कमजोर कर दिया।
म्युचुअल फंड के अधिकारियों ने बताया कि नरमी की असली वजह कमजोर धारणा के अलावा ढांचागत कारक भी हैं। उदाहरण के लिए, अधिकतर परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों (एएमसी) ने ऐक्टिव इक्विटी योजनाओं का अपना पोर्टफोलियो पूरा कर लिया है। साथ ही किसी क्षेत्र विशेष पर केंद्रित यानी सेक्टोरल और किसी खास विषय पर आधारित यानी थीमैटिक फंडों के लिए नियमों में सख्ती से भी एनएफओ की रफ्तार सुस्त हुई है।
क्वांटम एएमसी के प्रबंध निदेशक जिमी पटेल ने कहा, ‘अधिकतर फंड हाउस ने अपने ऐक्टिव इक्विटी उत्पाद पोर्टफोलियो को काफी हद तक पूरा कर लिया है। ऐसे में नए फंड अब पैसिव श्रेणी में जारी किए जा रहे हैं। ऐक्टिव इक्विटी श्रेणी में नए फंड मुख्य रूप से नई एएमसी से आ रहे हैं। सेक्टोरल और थीमैटिक फंड लॉन्च के लिए नियमों में सख्ती से भी कुछ असर पड़ा है।’
सेंस ऐंड सिंप्लिसिटी के संस्थापक और सीईओ सुनील सुब्रमण्यन ने कहा, ‘अधिकतर फंड हाउस के पास योजनाएं लॉन्च करने के लिए अवसर नहीं हैं। सेक्टोरल और थीमैटिक फंड ही ऐसी श्रेणियां हैं जो कई लॉन्च की अनुमति देती हैं। हाल के वर्षों में एएमसी ने इस ओर जबरदस्त तरीके से रुख किया था। मगर अब वितरकों और खुदरा निवेशकों दोनों का थीमैटिक के प्रति रुझान कम हो गया है। भू-राजनीतिक घटनाओं और वृहद आर्थिक दबाव के मद्देनजर नए थीमैटिक फंडों में दिलचस्पी घट गई है।’
इस बीच, चालू कैलेंडर वर्ष की पहली छमाही में 89 नए फंडों के जरिये 13,040 करोड़ रुपये जुटाए गए जो 2016 की दूसरी छमाही के बाद सबसे कम छमाही आंकड़ा है। कोविड से पहले एनएफओ को मुख्य रूप से तय परिपक्वता वाली योजनाओं (एफएमपी) से रफ्तार मिल रही थी। उस दौरान नई योजनाओं में संस्थागत निवेश हो रहा था क्योंकि मौजूदा योजनाएं परिपक्व हो रही थीं।
कोविड बाद के दौर में एनएफओ फंड हाउसों के लिए शेयर बाजार में निवेश का एक प्रमुख स्रोत रहा है। साल 2021 से 2024 तक हर कैलेंडर वर्ष में एनएफओ के जरिये जुटाई गई रकम ने शुद्ध इक्विटी निवेशक में 20 फीसदी से अधिक योगदान किया। मई से सितंबर 2024 के बीच शेयर बाजार में तेजी के दौरान सेक्टोरल और थीमैटिक श्रेणियों रिकॉर्ड संख्या में फंड जारी किए गए थे। उस दौरान अधिकतर महीनों में एनएफओ की हिस्सेदारी एक चौथाई से अधिक थी। साल 2024 में उद्योग ने 52 थीमैटिक और सेक्टोरल फंड लॉन्च किए जिनके जरिये कुल करीब 80,000 करोड़ रुपये जुटाए गए।
हालिया नियामकीय बदलावों ने सेक्टोरल और थीमैटिक श्रेणियों में नए फंड जारी करने को मुश्किल बना दिया है। बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा फरवरी में घोषित संशोधित योजना वर्गीकरण मानदंडों के तहत एक ही फंड हाउस के भीतर सेक्टोरल और थीमैटिक फंडों में 50 फीसदी से अधिक पोर्टफोलियो ओवरलैप नहीं हो सकता है।
ओवरलैप मानदंड 2025 में सेबी द्वारा एनएफओ ढांचे को कड़ा करने के लिए पेश किए गए उपायों की एक श्रृंखला के बाद आया। इनमें वितरकों के लिए मौजूदा योजनाओं से निवेशकों को एनएफओ में स्विच करने के लिए उच्च कमीशन प्रोत्साहन को हटाना और फंड हाउसों को निर्धारित अवधि के भीतर एनएफओ आय का निवेश करने की आवश्यकता शामिल थी। ऐसे में अवसर का फायदा उठाने के लिए योजनाएं जारी करने का दायरा कम हो गया।
मनी हनी वेल्थ सर्विसेज के संस्थापक अनूप भैया ने कहा, ‘साल 2021 के बाद थीमैटिक लॉन्च को वितरकों की तरफ से जबरदस्त बढ़ावा मिला और खुदरा में एफओएमओ (मौका चूकने का डर) की स्थिति देखी गई। मगर पिछले कुछ समय में उत्साह ठंडा पड़ गया है। इसकी मुख्य वजह कई थीमैटिक फंडों का खराब प्रदर्शन और सख्त नियामकीय मानदंड हैं।’