म्युचुअल फंड चुनते समय ज्यादातर लोगों की नजर सबसे पहले उसके रिटर्न पर जाती है। खासकर पिछले एक साल के रिटर्न पर। जिस फंड ने हाल में ज्यादा कमाई कराई, वह अच्छा लगने लगता है। वहीं, जिसका रिटर्न कम या निगेटिव रहा, उससे दूरी बनाने का मन करता है।
लेकिन सिर्फ एक साल का प्रदर्शन देखकर फंड चुनना कई बार गलत फैसला हो सकता है। वजह यह है कि एक साल का रिटर्न बाजार के मौजूदा माहौल, किसी खास सेक्टर की तेजी या गिरावट और फंड की रणनीति से बहुत ज्यादा प्रभावित हो सकता है।
मिराए एसेट शेयरखान की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के आंकड़े भी यही दिखाते हैं। कई ऐसे फंड हैं जिनका पिछले एक साल का प्रदर्शन कमजोर रहा, लेकिन तीन और पांच साल के आंकड़े काफी बेहतर हैं। वहीं, कुछ फंड ऐसे भी हैं जिनका हाल का रिटर्न बहुत अच्छा है, लेकिन उनके पास लंबी अवधि का रिकॉर्ड नहीं है। रिपोर्ट में भी फंड चुनते समय सिर्फ रिटर्न नहीं, बल्कि जोखिम, लगातार प्रदर्शन और फंड की रणनीति को देखने की बात कही गई है।
इसे बड़े शेयरों में निवेश करने वाले फंडों से समझ सकते हैं। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लार्ज कैप फंड ने पिछले एक साल में करीब 1.35 फीसदी का निगेटिव रिटर्न दिया। पहली नजर में यह खराब लग सकता है। लेकिन तीन साल में इसका सालाना औसत रिटर्न करीब 12.30 फीसदी और पांच साल में करीब 12.33 फीसदी रहा है। इसी तरह डीएसपी लार्ज कैप फंड का एक साल का रिटर्न करीब 2 फीसदी निगेटिव रहा। लेकिन तीन साल का सालाना औसत रिटर्न करीब 11.50 फीसदी रहा। यानी पिछले 12 महीने खराब रहे, इसका मतलब यह नहीं कि फंड का लंबी अवधि का रिकॉर्ड भी खराब है।
अब छोटे शेयरों में निवेश करने वाले फंडों को देखें। यूनियन स्मॉल कैप फंड ने एक साल में करीब 21.87 फीसदी रिटर्न दिया। महिंद्रा मैनुलाइफ स्मॉल कैप फंड का रिटर्न करीब 17.08 फीसदी रहा। ये आंकड़े काफी आकर्षक लगते हैं। लेकिन इसी श्रेणी में बंधन स्मॉल कैप फंड ने एक साल में करीब 12.06 फीसदी रिटर्न दिया, जो यूनियन स्मॉल कैप से काफी कम है। मगर तीन साल में बंधन स्मॉल कैप का सालाना औसत रिटर्न करीब 24.69 फीसदी रहा, जबकि यूनियन स्मॉल कैप का करीब 17.68 फीसदी रहा। इसका मतलब साफ है। जो फंड इस साल सबसे आगे है, जरूरी नहीं कि वह लंबे समय में भी सबसे अच्छा रहा हो।
कर बचाने वाले ईएलएसएस फंडों में भी ऐसा ही फर्क दिखता है। एसबीआई ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड का एक साल का रिटर्न करीब 0.25 फीसदी निगेटिव रहा। एचडीएफसी ईएलएसएस टैक्ससेवर फंड में भी एक साल का रिटर्न करीब 2.14 फीसदी निगेटिव रहा। लेकिन तीन साल में एसबीआई ईएलएसएस का सालाना औसत रिटर्न करीब 15.04 फीसदी और एचडीएफसी ईएलएसएस का करीब 14.16 फीसदी रहा। पांच साल में भी इन दोनों का रिटर्न करीब 15 फीसदी के आसपास रहा है। यानी सिर्फ एक साल देखकर किसी पुराने फंड को कमजोर मान लेना सही नहीं होगा।
किसी खास सेक्टर में निवेश करने वाले फंडों में एक साल का रिटर्न और भी ज्यादा भटका सकता है। मान लीजिए किसी साल दवा कंपनियों के शेयर तेज चल रहे हैं, तो दवा क्षेत्र से जुड़े फंड का रिटर्न अच्छा दिखेगा। किसी दूसरे साल बैंकिंग या मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां आगे निकल सकती हैं। रिपोर्ट में मिराए एसेट हेल्थकेयर फंड का एक साल का रिटर्न करीब 16.22 फीसदी और तीन साल का सालाना औसत रिटर्न करीब 20.93 फीसदी है।
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल मैन्युफैक्चरिंग फंड ने एक साल में करीब 13.28 फीसदी और तीन साल में करीब 21.50 फीसदी का सालाना औसत रिटर्न दिया है। वहीं, एसबीआई बैंकिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज फंड का एक साल का रिटर्न करीब 3.25 फीसदी है, लेकिन तीन साल का सालाना औसत रिटर्न करीब 15.98 फीसदी रहा। यानी बाजार का पसंदीदा सेक्टर बदलते ही एक साल के रिटर्न की सूची भी तेजी से बदल सकती है।
ओल्ड ब्रिज फोकस्ड इक्विटी फंड का एक साल का रिटर्न करीब 20.29 फीसदी है। लेकिन उसके पास तीन और पांच साल का लंबा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। वहीं, इनवेस्को इंडिया फोकस्ड फंड का एक साल का रिटर्न करीब 4.70 फीसदी है, लेकिन तीन साल का सालाना औसत रिटर्न करीब 21.65 फीसदी और पांच साल का करीब 15.60 फीसदी है। ऐसे में सिर्फ 20 फीसदी और 5 फीसदी देखकर दोनों फंडों की सीधी तुलना करना सही नहीं होगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, फंड चुनते समय कई चीजें एक साथ देखनी चाहिए। मसलन फंड हाउस की निवेश रणनीति कैसी है, फंड मैनेजर का अनुभव कितना है, फंड ने अलग-अलग समय में कैसा प्रदर्शन किया है और उसने कितना जोखिम लिया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फंड की लगातार प्रदर्शन करने की क्षमता और उतार-चढ़ाव को भी देखना चाहिए। आसान भाषा में कहें तो यह देखना जरूरी है कि फंड ने सिर्फ अच्छे बाजार में पैसा बनाया या मुश्किल समय में भी खुद को संभाला। तीन साल और पांच साल के रिटर्न से तस्वीर ज्यादा साफ होती है।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)