360 वन ऐसेट के सह-संस्थापक और मुख्य निवेश अधिकारी अनूप माहेश्वरी का कहना है कि जब वैश्विक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) ट्रेड की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी और दूसरे बाजारों में मूल्यांकन बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे तो भारत का कमज़ोर प्रदर्शन बदल सकता है। अभिषेक कुमार को दिए ईमेल साक्षात्कार के अंश…
बाजार ने मार्च के निचले स्तरों से वापसी की है। लेकिन व्यापक आर्थिक चुनौतियों में नरमी के बावजूद यह अब भी अपने सर्वकालिक उच्चतम स्तर से काफी नीचे है। विशेष रूप से लार्जकैप में सुधार कैसे रुका है?
वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारतीय बाजार में सापेक्ष कमजोरी निवेश में कमी का मामला है, न कि भारतीय कंपनी जगत पर कोई फैसला। घरेलू आय और आर्थिक फंडामेंटल विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली से कहीं बेहतर बने हुए हैं। ऐतिहासिक रूप से भारत का प्रीमियम, इक्विटी पर बेहतर रिटर्न और कमाई की ज्यादा टिकाऊ वृद्धि पर निर्भर है। जैसे-जैसे निवेशक उन बाजारों की ओर गए, जिन्हें एआई चक्र से तुरंत फायदा होने की उम्मीद थी, वह प्रीमियम कम हो गया। भारत अपने आकार और तरलता की वजह से हुए दुबारा उस तरह के आवंटन के लिए फंडिंग का स्वाभाविक जरिया बन गया।
हालांकि भारत का मूल्यांकन प्रीमियम अब थोड़ा कम हुआ है। फिर भी यह एशिया के कई दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा है। रुपये की कमजोर चाल और इस प्रीमियम की वजह से मजबूत आर्थिक हालात और कॉरपोरेट फंडामेंटल के बावजूद कई वैश्विक निवेशकों ने भारत में कम निवेश किया है। यह स्थिति तब बदलेगी, जब एआई थीम की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी या वैश्विक मूल्यांकन बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे। ऐसे हालात में दूसरे देशों के मुकाबले भारत बेहतर दिखने लगेगा।
क्या मौजूदा मूल्यांकन और कमाई में बढ़ोतरी की उम्मीदों को देखते हुए यहां से और बढ़त की गुंजाइश है?
यह बढ़त मूल्यांकन बढ़ने से नहीं, बल्कि निकट भविष्य में कमाई में बढ़ोतरी के बल पर ही आ सकती है। निफ्टी अपनी पिछली कमाई के लगभग 20 गुना पर ट्रेड कर रहा है, जो उसके लंबे समय के औसत के करीब है। यह अभी न तो इतना सस्ता है कि इसे लेकर उत्साह हों और न ही इतना महंगा कि चिंता की जाए। अगर 2026-27 में कमाई उम्मीद के मुताबिक 12-15 फीसदी बढ़ती है तो अकेले इसी से हाई-सिंगल से लेकर लो-डबल-डिजिट तक का रिटर्न मिल सकता है। बाजार को यहां से उल्लेखनीय री-रेटिंग पाने में समय लगेगा।
आने वाले महीनों में शेयर बाजार की चाल किन चीज़ों से तय होगी?
सबसे अहम तो कंपनियों की कमाई होगी। इसके अलावा, भारत जैसे बाजारों में कितना पैसा आएगा, इस पर असर डालने वाले दूसरे कारकों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों की दिशा, आरबीआई के नीतिगत फैसले, वैश्विक नकदी और भूराजनीतिक मामले शामिल हैं।
खपत, निजी क्षेत्र में पूंजीगत खर्च, सरकारी खर्च और मॉनसून से यह पता चलेगा कि वृद्धि कैसी हो रही है। नीति से जुड़े फैसलों और वैश्विक घटनाओं के कारण कुछ उतार-चढ़ाव होना तय है। अगर कमाई में सुधार जारी रहता है और नकदी का सहारा मिलता रहता है तो मध्यम अवधि में भारतीय इक्विटी की स्थिति अच्छी बनी रहनी चाहिए।
इस समय शेयर बाजार के सामने कौन से बड़े जोखिम हैं?
भूराजनीतिक तनाव बढ़ने या वैश्विक वृद्धि में भारी गिरावट का असर पड़ेगा। इस पर वैश्विक महंगाई के अनुमान से ज्यादा बने रहने का जोखिम भी है, जिससे केंद्रीय बैंकों को लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं।