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भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन पटरी पर दौड़ने के और करीब पहुंच गई है। दरअसल रेलवे बोर्ड ने उत्तरी रेलवे के जींद -सोनीपत खंड पर हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चलने वाली 10 डिब्बों की रेलगाड़ी को मंजूरी दे दी है। रेल मंत्रालय ने 22 मई को जारी परिपत्र में यह जानकारी दी। मंत्रालय ने बताया कि यह ट्रेन जल्द ही पटरी पर दौड़ने लगेगी और 1200 किलोवॉट हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रणोदन प्रणाली द्वारा संचालित इस ट्रेन की अधिकतम रफ्तार 75 किलोमीटर प्रति घंटा रहेगी।
रेलवे ने कहा, ‘इस पहल के साथ भारत जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे उन कुछ चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है जो स्वच्छ रेल परिवहन के लिए हाइड्रोजन के उपयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। चूंकि, यह तकनीक अभी भी शुरुआती चरण में है, इसलिए वर्तमान में केवल कुछ ही देश ऐसी प्रणालियों का संचालन या परीक्षण कर रहे हैं।’
भारत में पहली हाइड्रोजन ट्रेन के शुरू होने का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है। सरकार इस दिशा में किए जा रहे प्रयास को तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ऊर्जा के एक नए स्रोत के रूप में पेश कर रही है। मगर कुछ विशेषज्ञ इस तकनीक को लेकर अभी भी सतर्क हैं, क्योंकि बड़े पैमाने पर इसका अभी तक परीक्षण नहीं हुआ है। शुरुआती चरण में सरकार ने ऐसी 35 रेलगाड़ियों के विकास के लिए लगभग 2,800 करोड़ रुपये आवंटित किए थे।
अधिकारियों का मानना है कि ये रेलगाड़ियां उन ऐतिहासिक और पहाड़ी मार्गों पर चलाई जाएंगी, जहां अभी तक विद्युतीकरण नहीं हो पाया है। जींद-सोनीपत मार्ग (जहां जींद में ईंधन भरने और हाइड्रोजन भंडारण की सुविधा भी है) को परिचालन के लिए प्रायोगिक (पायलट) मार्ग के रूप में चुना गया है। मौजूदा डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (डीईएमयू) रेक पर हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगाकर इस रेल डिब्बों का निर्माण किया गया है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक हाइड्रोजन का उपयोग कर रासायनिक प्रतिक्रिया के माध्यम से बिजली उत्पन्न करती है जिसमें केवल जल वाष्प ही उत्सर्जित होता है।
इससे यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित कर्षण प्रणालियों का बेहतरीन स्वच्छ विकल्प हो सकता है। पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) ने साइट पर संपीड़ित हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए जरूरी लाइसेंस दे दिया है। परिपत्र में कहा गया है, ‘अनधिकृत प्रवेश रोकने के लिए हाइड्रोजन संयंत्र और ईंधन भरने की सुविधा के पूरे परिसर की उचित सुरक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।’
22 मई के परिपत्र के अनुसार, हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और वितरण इकाई में स्थापित हाइड्रोजन रिसाव डिटेक्टर और ज्वाला डिटेक्टर सहित विभिन्न सुरक्षा सेंसरों का नियमित रूप से निरीक्षण और सफाई की जाएगी ताकि धूल जमा न हो और सुरक्षित संचालन सुनिश्चित हो सके। ट्रेन का रखरखाव दिल्ली के शकूरबस्ती में किया जाएगा और रखरखाव कार्यों के लिए डिब्बों को निष्क्रिय अवस्था में (लोकोमोटिव द्वारा) ले जाया जाएगा।
इस मंजूरी में व्यापक सुरक्षा और परिचालन नियम-कायदे भी अनिवार्य कर दिए गए हैं। इसमें हाइड्रोजन ईंधन भरने की प्रणाली की चौबीसों घंटे निगरानी, महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रशिक्षित और प्रमाणित कर्मियों की तैनाती और नियमित निरीक्षण और रखरखाव कार्यक्रम शामिल हैं। परिपत्र में कहा गया है, ‘शुरू में तीन महीनों के लिए ट्रेन के साथ प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी तैनात रहेंगे जिनके पास हाइड्रोजन ट्रेन सेट की दक्षता होगी ताकि रास्ते में आने वाली तकनीकी समस्याओं से निपटा जा सके।’
सरकार हाइड्रोजन के वैकल्पिक स्रोतों पर भी सक्रिय रूप से विचार कर रही है। रेलवे के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि यह तकनीक अभी तक साबित नहीं हुई है और इस पर लागत भी अधिक आती है। पूर्व-मध्य रेलवे के पूर्व महाप्रबंधक एलसी त्रिवेदी ने कहा, ‘भारत को मौजूदा संदर्भ में बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाने की योजना पर दोबारा सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। भारतीय रेलवे द्वारा लगभग 100 प्रतिशत ब्रॉड गेज विद्युतीकरण का लक्ष्य हासिल करने के बाद नवीकरणीय ऊर्जा को सीधे ट्रैक्शन नेटवर्क (विशेष विद्युत प्रणाली) में जोड़ा जा सकता है जो अधिक कुशल और किफायती मार्ग प्रदान करता है।’
उन्होंने यह भी कहा कि हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, परिवहन ढांचा और सुरक्षा प्रबंधन से संबंधित महत्त्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिससे लागत बढ़ सकती है। उन्होंने कहा, ‘इसके बजाय, भारत मौजूदा विद्युतीकृत रेलवे प्रणाली में ग्रिड मजबूत करने, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में निवेश करने और नवीकरणीय ऊर्जा के सजग इस्तेमाल को बढ़ावा देने से दीर्घकालिक लाभ प्राप्त कर सकता है।’