प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) के लिए अमेरिकी एरोस्पेस दिग्गज जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) के साथ एफ414-आईएनएस6 इंजनों पर बातचीत में कथित तौर पर बाधाएं आ रही हैं, वहीं ओडिशा के कोरापुट में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के इंजन डिवीजन ने स्वदेशी क्षमता में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
एचएएल ने भारतीय वायु सेना (आईएएफ) को 1,000वां मरम्मत और ओवरहॉल (आरओएच) किया हुआ एएल-31एफपी टर्बोफैन इंजन सौंप दिया है। इससे किसी विदेशी रखरखाव की मदद लिए बगैर देश के सबसे महत्त्वपूर्ण लड़ाकू विमान के बेड़े को बनाए रखने की बढ़ती क्षमता का पता चलता है।
जीई एफ414 का मुद्दा भारत के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए इंजनों से जु़ड़ा हुआ है। वहीं 1,000 एएल-31एफपी इंजनों के सफल ओवरहॉल से पता चलता है कि भारत ने जटिल सैन्य एरो-इंजनों के लिए अपनी रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल (एमआरओ) क्षमता को काफी मजबूत किया है।
हाल ही में एचएएल कोरापुट के कार्यकारी निदेशक एसए कोठे ने नियामक एजेंसियों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में 1,000वां ओवरहॉल किया गया इंजन सहायक वायु सेना प्रमुख (इंजीनियरिंग ए) एयर वाइस मार्शल बीवीएन शिवा को सौंपा।
एएल-31एफपी भारत के प्रमुख हवाई प्रभुत्व वाले लड़ाकू विमान वायुसेना के एसयू-30एमकेआई का पावरप्लांट है। मूल रूप से रूस के सैटर्न डिजाइन ब्यूरो द्वारा विकसित किया गया यह इंजन ट्विन-स्पूल आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन है, जो थ्रस्ट-वेक्टरिंग नोजल से लैस है। यह विमान को कोबरा और कलबिट जैसे अत्यधिक पोस्ट-स्टॉल युद्धाभ्यास करने की सुविधा प्रदान करता है।
आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 123 केएन थ्रस्ट का उत्पादन करते हुए यह इंजन एसयू-30 एमकेआई को असाधारण तेजी प्रदान करता है। इसकी वजह से यह विश्व के बेहतरीन युद्धाभ्यास करने वाले लड़ाकू विमानों की श्रेणी में आता है। एसयू-30 एमकेआई भारतीय वायु सेना की रीढ़ है। इसकी इंजन उपलब्धता सुनिश्चित करना परिचालन संबंधी तैयारी के हिसाब से महत्त्वपूर्ण है। हर ओवरहालिंग से इंजन के काम करने की उम्र बढ़ती है और इसके प्रदर्शन की क्षमता यथावत बनी रहती है। साथ ही इसके विकल्प के रूप में महंगे आयात की जरूरत कम हो जाती है।
एचएएल ने कहा, ‘रक्षा आपूर्ति को प्रभावित करने वाले वैश्विक भूराजनैतिक व्यवधानों के बावजूद कोरापुट डिवीजन ने एचएएल के ओवरहॉल इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार बढ़ाया है। अब इसमें सालाना 100 से अधिक एएल-31एफपी इंजनों की मरम्मत करने की क्षमता है।’
यह उपलब्धि तब और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है जब भारत विदेशी इंजन आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता की कमजोरियां दूर करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, एफ414 इंजन को लेकर जीई के साथ बातचीत ने भारत में उच्च-थ्रस्ट वाले लड़ाकू इंजन की कमी की लंबे समय से चली आ रही चिंता को एक बार फिर उजागर किया है।
रक्षा वैज्ञानिकों और एरोस्पेस विशेषज्ञों ने लगातार कहा है कि एयरो-इंजन तकनीक विश्व स्तर पर सबसे अधिक बारीकी से संरक्षित तकनीकों में से एक है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इससे लड़ाकू विमानों की युद्ध क्षमता, सहनशक्ति और निर्यात क्षमता तय होती है।
कार्यक्रम से जुड़े सूत्रों ने कहा कि भारत ने स्वदेशी एरो-इंजन प्रौद्योगिकियों में पहले ही महत्त्वपूर्ण प्रगति कर ली है, हालांकि अभी भी कुछ कमजोरियां बनी हुई हैं। सूत्रों ने कहा, ‘भारत लड़ाकू इंजन तकनीक के कई पहलुओं में आखिरी चरण में है। यदि किसी इंजन के लिए 10 प्रमुख तकनीकी बिल्डिंग ब्लॉक की आवश्यकता होती है, तो हमने पहले से ही पांच या छह में महारत हासिल कर ली है। शेष तकनीकों को विकसित करना अब एक राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए।’
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और प्रबंध निदेशक (एमडी) सुधीर कुमार मिश्र ने कहा कि भारत अब इंजन विकसित करने में सक्षम है, लेकिन अब लक्ष्य भविष्य के मानव रहित लड़ाकू विमान इंजनों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना होना चाहिए।
रक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि वर्तमान स्थिति को भारत को स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन के विकास में तेजी लाने के लिए तत्परता से काम करने की जरूरत है। डीआरडीओ के पूर्व अध्यक्ष जी सतीश रेड्डी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘देश के भीतर लड़ाकू विमान इंजन विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है, चाहे सहयोग से या पूरी तरह स्वदेशी। इसके लिए आवश्यक सभी प्रौद्योगिकियां, जिनमें सामग्री और विनिर्माण प्रौद्योगिकियां शामिल हैं, देश में विकसित की जानी चाहिए।