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RBI के सख्त लोन नियमों से ब्रोकरों में खलबली, राहत के लिए वित्त मंत्री से मिला प्रतिनिधिमंडल

चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने 24 जून को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर से मुलाकात कर नियमों में राहत की मांग की है

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खुशबू तिवारी   
Last Updated- June 29, 2026 | 11:06 PM IST

पूंजी बाजार के मध्यस्थों को बैंक ऋण देने संबंधी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नए नियम लागू होने में अब सिर्फ एक दिन बचा है। लेकिन ब्रोकिंग कंपनियों को उम्मीद है कि सरकार और नियामक कुछ राहत दे सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार ब्रोकिंग कंपनियों से जुड़े चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने 24 जून को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर से मुलाकात कर नियमों में राहत की मांग की। सूत्रों ने बताया कि ब्रोकरों ने इस मुद्दे पर बाजार नियामक संस्था भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के अधिकारियों से भी चर्चा की है। आरबीआई का नया नियम पहले 1 अप्रैल से लागू होना था लेकिन इसे टालकर अब 1 जुलाई से लागू किया जा रहा है।

ब्रोकिंग उद्योग की मांग है कि बाजार में लगातार खरीद-बिक्री के भाव उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं को नए नियमों में अलग श्रेणी दी जाए। उनका कहना है कि यदि इन संस्थाओं के लिए बैंक फंडिंग सीमित हुई तो बाजार में खरीद और बिक्री के दामों के बीच का अंतर (स्प्रेड) बढ़ सकता है और निवेशकों की लेन-देन लागत भी बढ़ जाएगी। ब्रोकरों ने आरबीआई से समयबद्ध राहत देने की मांग की है।

उनका सुझाव है कि चुनिंदा डेरिवेटिव अनुबंध में नकदी प्रदाताओं को औपचारिक मान्यता दी जाए और बैंक प्रावधान स्पैन (मानक पोर्टफोलियो के जो​खिम का विश्लेषण) आधारित मार्जिन उपयोग से जुड़ा हो जो 50 प्रतिशत से कम हो और आरबीआई के नियमों के तहत बैंक ऋण मिले।

उद्योग ने यह भी कहा है कि चूंकि नकदी प्रदाताओं को औपचारिक मान्यता मिलने में समय लग सकता है, ऐसे में तब तक अंतरिम व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।

ब्रोकरों का कहना है कि नकदी प्रदाता बाजार में लगातार खरीद और बिक्री के भाव उपलब्ध कराकर बाजार की गहराई बनाए रखते हैं। इससे संस्थागत और खुदरा निवेशकों को कम लागत पर लेन-देन करने में सुविधा मिलती है और मूल्य निर्धारण भी बेहतर होता है।

मामले से जुड़े एक सूत्र ने कहा कि सरकार और नियामकों के साथ बातचीत सकारात्मक रही है और नकदी प्रदाताओं को लेकर कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। उनके अनुसार, ये संस्थाएं स्प्रेड कम रखने, लेन-देन की लागत घटाने, बेहतर मूल्य और बाजार में स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उद्योग के अनुमान के अनुसार, क्लियरिंग कॉरपोरेशनों के पास जमा लगभग 11-12 लाख करोड़ रुपये की कुल जमानत में से करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये बैंक गारंटी के रूप में हैं। वहीं, इंट्राडे फंडिंग करीब 80,000 करोड़ रुपये है। केयरएज रेटिंग्स की एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि आरबीआई के नए नियमों का असर कारोबार की मात्रा और बाजार की गतिविधियों पर पड़ सकता है।

First Published : June 29, 2026 | 10:58 PM IST