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क्या पुराने लोन नियम अब बेकार हो चुके हैं? सरकार की सलाहकार परिषद ने क्यों उठाए मौजूदा लोन सिस्टम पर सवाल

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प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण व्यवस्था में बदलाव की सिफारिश की है। रिपोर्ट में सामाजिक समानता पर ज्यादा जोर देने की बात कही गई है

Last Updated- May 08, 2026 | 9:10 AM IST
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प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) ने भारत के प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (पीएसएल) ढांचे की समीक्षा का आह्वान किया है। उसने सिफारिश की है कि अनिवार्य ऋण लक्ष्यों में आर्थिक पहलू के बजाए सामाजिक समानता पर जोर दिया जाए।

पत्र में तर्क दिया गया कि पीएसएल को समय के साथ विस्तारित व्यापक क्षेत्रीय वर्गीकरणों को बनाए रखने के बजाये मुख्य रूप से लघु व सीमांत किसानों, सूक्ष्म उद्यमों और कमजोर वर्गों के लिए ऋण पहुंच में सुधार पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

पत्र में कहा गया, ‘इस आर्थिक अक्षमता को देखते हुए पीएसए का फोकस आर्थिक समानता से सामाजिक समानता की ओर बदला जाना चाहिए। छोटे और सीमांत किसानों/लघु उद्यमों, लघु उद्योगों और कमजोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराने के अपने मूल लक्ष्यों पर जोर दिया जाना चाहिए। प्राथमिकता क्षेत्र की परिभाषा में शामिल वे पुराने प्रावधान जो अब प्रासंगिक नहीं हैं, उन्हें हटाया जा सकता है। लक्ष्यों को तदनुसार समायोजित किया जा सकता है।’

परिषद ने सुझाव दिया कि लघु एवं सीमांत किसानों और कमजोर वर्गों के लिए उप-लक्ष्य जारी रखे जाने चाहिए जबकि समग्र कृषि ऋण जैसे व्यापक लक्ष्यों पर पुनर्विचार किया जा सकता है। परिषद ने कहा कि वर्तमान कृषि वर्गीकरण में बड़े और कॉरपोरेट कृषि इकाइयों को दिए जाने वाले ऋण भी शामिल हैं।

इसी प्रकार परिषद ने उद्यम खंड में अन्य श्रेणियों को शामिल करने की समीक्षा करते हुए सूक्ष्म उद्यमों के लिए समर्थन बनाए रखने की सिफारिश की। रिपोर्ट के अनुसार अनिवार्य श्रेणियों की संख्या कम करने से बैंकों को वित्तीय समावेशन के सामाजिक उद्देश्य को बनाए रखते हुए ऋण देने में अधिक लचीलापन मिल सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के मानदंडों के तहत बैंकों को वर्तमान में अपने समायोजित शुद्ध बैंक ऋण का 40 प्रतिशत प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को आवंटित करना अनिवार्य है। इस ढांचे में कृषि, सूक्ष्म एवं लघु उद्यम, शिक्षा, आवास, निर्यात और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि पूंजी को अपेक्षाकृत कम कुशल उपयोगों की ओर मोड़ा जाता है तो निर्देशित ऋण जनादेश उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है। इसने अनिवार्य ऋण से जुड़ी उच्च सेवा लागत और जोखिमों के कारण बैंकों की लाभप्रदता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी चिंता व्यक्त की। वर्ष 2020 से 2025 के बीच जिला-स्तरीय त्रैमासिक आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में पाया गया कि नियामक लक्ष्यों के बावजूद प्राथमिकता क्षेत्र ऋण का वितरण विभिन्न क्षेत्रों में असमान बना हुआ है।

परिषद ने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण प्रमाणपत्रों (पीएसएलसी) के उपयोग का समर्थन करते हुए कहा कि इस व्यवस्था ने बैंकों को ऋण के क्षेत्रीय प्रवाह में महत्वपूर्ण बदलाव किए बिना अनुपालन जरूरतों को अधिक कुशलता से प्रबंधित करने में मदद की है। पीएसएलसी उन बैंकों को प्रमाणपत्र बेचने की अनुमति देते हैं जिनके पास पीएसएल श्रेणियों के तहत अतिरिक्त ऋण है, ताकि वे उन ऋणदाताओं को प्रमाणपत्र बेच सकें जो लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

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First Published - May 8, 2026 | 9:10 AM IST

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