भारतीय रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है और 23 मार्च 2026 को यह पहली बार 93.94 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया। इस साल अब तक इसमें करीब 3.6 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। लगातार गिरते रुपये को देखकर निवेशकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह 100 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक भी पहुंच सकता है।
रुपये की कमजोरी के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण एक साथ काम कर रहे हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के अनुसार, रुपये की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि डॉलर वैश्विक स्तर पर कितना मजबूत होता है और भारतीय रिजर्व बैंक कितना हस्तक्षेप करता है।
सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। कोटक सिक्योरिटीज के कमोडिटी और करेंसी रिसर्च हेड अनिंद्य बनर्जी का कहना है कि ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज में तनाव के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है, इसलिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं और रुपया दबाव में आता है।
इसके अलावा विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी बड़ी वजह है। एनएसडीएल के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने लगभग 1.07 लाख करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर हुआ।
शिनहान बैंक के ट्रेजरी हेड कुनाल सोधानी के अनुसार, अमेरिका में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहने की संभावना है, जिससे निवेशक अमेरिकी संपत्तियों की ओर जा रहे हैं और उभरते बाजारों की मुद्राएं, जैसे रुपया, दबाव में हैं।
घरेलू स्तर पर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है। बढ़ते आयात और घटते निर्यात के कारण भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स घाटे में है। फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स के अनिल कुमार भंसाली का कहना है कि बाजार में डॉलर की मांग ज्यादा है और उपलब्धता कम है, इसी वजह से रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
इस सवाल पर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है, लेकिन अधिकांश का मानना है कि फिलहाल 100 रुपये प्रति डॉलर का स्तर दूर है। मदन सबनवीस के अनुसार, रुपये को 100 तक गिरने के लिए डॉलर बहुत ज्यादा तेजी से मजबूत होना पड़ेगा। लेकिन ऐसी स्थिति में सरकार और आरबीआई कदम उठा सकते हैं, क्योंकि इससे महंगाई बढ़ सकती है।
हालांकि, कुनाल सोधानी यह भी कहते हैं कि बाजार में कभी भी किसी संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, इसलिए सतर्क रहना जरूरी है।
अनिंद्य बनर्जी के मुताबिक, अगर ईरान युद्ध से जुड़ा तनाव जारी रहता है तो रुपया 96 से 97 प्रति डॉलर तक जा सकता है। लेकिन यदि हालात सुधरते हैं और तेल की सप्लाई सामान्य होती है, तो कीमतों में गिरावट आएगी और रुपये में तेजी लौट सकती है।
बढ़ती अस्थिरता को देखते हुए विशेषज्ञ अलग-अलग रणनीति की सलाह दे रहे हैं। कुनाल सोधानी का सुझाव है कि आयात करने वाली कंपनियां डॉलर में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए हेजिंग बढ़ाएं और वैश्विक ब्याज दरों पर नजर रखें। वहीं अनिंद्य बनर्जी का कहना है कि आयातकों को ऑप्शन आधारित हेजिंग रणनीति अपनानी चाहिए, जबकि निर्यातकों को 95-96 या उससे ऊपर के स्तर पर धीरे-धीरे हेजिंग करनी चाहिए ताकि बेहतर कीमत का फायदा मिल सके। अनिल कुमार भंसाली की सलाह है कि आयातकों को डॉलर खरीदना चाहिए, जबकि निर्यातकों को जल्दबाजी में हेजिंग करने के बजाय स्पॉट रेट पर ही अपनी प्राप्तियां लेनी चाहिए।