अर्थव्यवस्था

अमेरिका के एकतरफा 12.5% टैरिफ प्रस्ताव पर भारत सख्त, कहा: बातचीत से सुलझाएं व्यापारिक मुद्दे

अमेरिका के 12.5% अतिरिक्त टैरिफ प्रस्ताव पर भारत ने कड़ा विरोध जताया है और व्यापारिक मुद्दों को एकतरफा कार्रवाई के बजाय द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाने को कहा है

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बीएस वेब टीम   
Last Updated- July 11, 2026 | 3:23 PM IST

भारत ने अमेरिका के प्रस्तावित 12.5 प्रतिशत के अतिरिक्त आयात शुल्क (टैरिफ) पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। भारत का साफ कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार से जुड़े किसी भी विवाद को एकतरफा कार्रवाई के बजाय आपसी बातचीत के जरिए ही सुलझाया जाना चाहिए। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की एक जनसुनवाई में हिस्सा लेते हुए वाणिज्य विभाग के संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने इस प्रस्ताव पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अमेरिका को ‘धारा 301’ के तहत की गई अपनी जांच और अतिरिक्त टैक्स लगाने के फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए, क्योंकि इसकी रिपोर्ट में कई खामियां और विरोधाभास हैं।

दरअसल, अमेरिका ने कुछ देशों पर ‘बंधुआ या जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर)’ से जुड़े उत्पादों के आयात पर रोक न लगाने का आरोप लगाया है। भारत ने अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए कहा कि जबरन श्रम को खत्म करना भारत का एक संवैधानिक कर्तव्य है और देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पूरी तरह पालन करता है।

अमेरिकी रिपोर्ट के तौर-तरीकों पर भारत ने उठाए सवाल

USTR की इस सुनवाई की लिखित रिपोर्ट 8 जुलाई को जारी की गई, जिसमें भारत ने अमेरिकी जांच के तरीके को पूरी तरह गलत बताया। संयुक्त सचिव बृज मोहन मिश्रा ने कहा कि USTR की यह रिपोर्ट ‘व्यापार अधिनियम’ की धारा 301(D) के तहत जरूरी कानूनी मानकों को पूरा नहीं करती। केवल किसी ठोस सबूत के बिना यह मान लेना कि भारत में जबरन श्रम से जुड़ी चीजों के आयात पर प्रतिबंध नहीं है, पूरी तरह गलत है।

भारत का तर्क है कि अमेरिका ने केवल कुछ चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं के केस स्टडीज और सामान्य व्यापारिक आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार कर ली है। इसमें कुल 46 अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं (जिसमें भारत भी शामिल है) को बिना किसी पुख्ता सबूत के एक ही श्रेणी में डाल दिया गया है। रिपोर्ट में यह मान लिया गया है कि जिन देशों के आयात में ऐसी गड़बड़ियां हैं, वे उन चीजों को अमेरिका एक्सपोर्ट कर रहे हैं, जबकि इसके पीछे कोई जमीनी जुड़ाव या पक्के सबूत नहीं दिखाए गए हैं।

भारत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि भारत की नीतियों की वजह से अमेरिकी उद्योगों को किसी तरह का नुकसान हो रहा है।

भारतीय चावल को टैक्स से बाहर रखने की मांग

वाशिंगटन में भारतीय दूतावास के प्रथम सचिव श्रेयंस गुप्ता ने कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ((APEDA) की तरफ से अपना पक्ष रखा। उन्होंने अमेरिका के उन दावों पर कड़ा विरोध जताया जिसमें भारतीय चावल के आयात पर सवाल उठाए गए थे। अमेरिकी रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि भारत में कथित तौर पर जबरन आने वाले चावल के आयात के कारण अमेरिकी बाजार में चावल की बिक्री प्रभावित हो रही है।

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श्रेयंस गुप्ता ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि भारत बहुत ही कम मात्रा में चावल का आयात करता है, जो केवल कुछ खास किस्मों की मांग को पूरा करने के लिए होता है।

उन्होंने बताया कि भारत जितना चावल अमेरिका को एक्सपोर्ट करता है, उसकी तुलना में वहां से भारत आने वाले चावल की वैल्यू तीन प्रतिशत भी नहीं है। भारत में ऐसे कड़े नियम हैं जो किसी भी खराब चावल को देश से बाहर जाने से रोकते हैं। अमेरिका जाने वाले चावल का निर्यात केवल उन्हीं मिलों और प्रोसेसिंग यूनिट्स से होता है जो भारत के कृषि मंत्रालय के पास रजिस्टर्ड हैं। इस आधार पर भारत ने मांग की है कि इस जांच को तुरंत रद्द किया जाए, और यदि यह कार्रवाई आगे बढ़ती भी है, तो भारतीय चावल को इस अतिरिक्त टैक्स से पूरी तरह बाहर रखा जाए।

‘अमेरिकी कंपनियों और ग्राहकों की भी बढ़ेगी जेब ढीली’

भारत के प्रमुख उद्योग मंडलों FICCI और CII ने भी इस टैरिफ प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया है। FICCI का कहना है कि यदि यह अतिरिक्त टैक्स लगाया जाता है, तो इसका नुकसान केवल भारतीय निर्यातकों को ही नहीं होगा। इससे अमेरिकी निर्माताओं, आयातकों, रिटेलरों और अंततः वहां के आम उपभोक्ताओं पर भी महंगाई का बोझ बढ़ेगा।

भारतीय उद्योग पहले से ही सभी जरूरी नियमों और सुरक्षा मानकों का पालन कर रहे हैं, इसलिए इस एकतरफा टैक्स से अमेरिका-भारत की मजबूत सप्लाई चेन प्रभावित होगी।

CII ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि 12.5 प्रतिशत का प्रस्तावित टैक्स किसी भी साक्ष्य पर आधारित नहीं है। USTR यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है कि भारत की नीतियों से अमेरिकी व्यापार को कोई नुकसान पहुंच रहा है।

गौरतलब है कि USTR ने मार्च 2026 में ‘जबरन श्रम और अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता’ से जुड़ी चिंताओं को लेकर 60 देशों के खिलाफ जांच शुरू की थी। इसके बाद 3 जून को आई रिपोर्ट में कनाडा, यूरोपीय संघ, मैक्सिको और पाकिस्तान जैसे देशों पर 10 प्रतिशत, जबकि भारत और चीन सहित 54 देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया गया था। हालांकि, यह फैसला अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है और अंतिम निर्णय लेने से पहले USTR इन सभी आपत्तियों और बयानों पर विचार करेगा।

(PTI के इनपुट के साथ)

First Published : July 11, 2026 | 3:16 PM IST