वेदांत, अपोलो ग्लोबल और आई स्क्वैयर्ड ने भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) में सरकार की नियंत्रक हिस्सेदारी खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। अभी वेदांत के पास निजी क्षेत्र में देश की सबसे बड़ी कच्चा तेल उत्पादक केयर्न ऑयल ऐंड गैस की नियंत्रक हिस्सेदारी है और वह रिफाइनिंग कारोबार में विशाखन की इच्छुक हो सकती है। यह अधिग्रहण कच्चे तेल के उतारचढ़ाव से पैदा होने वाली जोखिम घटाएगा और भविष्य में उसके पास पेट्रोकेमिकल कारोबार में काफी कुछ होगा।
लेकिन वेदांत के प्रवर्तक अनिल अग्रवाल के लिए यह शायद आसान नहींं होगा क्योंकि अपोलो ग्लोबल व आई स्क्वैयर्ड कैपिटल पहले ही भारतीय ऊर्जा क्षेत्र में अपना हाथ आजमा चुके हैं। इन दोनों में अपोलो ग्लोबल स्पष्ट तौर पर बड़ी कंपनी है और उसके पास 433 अरब डॉलर की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां है। उधर, स्क्वैयर्ड कैपिटल के पास 13 अरब डॉलर की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां हैं।
एमके ग्लोबल के साबरी हजारिका और तनय गाभावाला ने एक संयुक्त नोट में कहा है, अपोलो अहम कंपनी है और उसके पास 77 अरब डॉलर का प्राइवेट इक्विटी पोर्टफोलियो है और ऊर्जा क्षेत्र में निवेशक है। उसके अहम निवेश की बात करें तो अपोलो ने साल 2009 में दिवालिया कंपनी लॉन्डेलबेसल का अधिग्रहण किया था, जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज की भी दिलचस्पी थी। इस अधिग्रहण ने छह गुना रिटर्न दिया जब वह साल 2014 में 12 अरब डॉलर में इसकी बिक्री की। आई स्क्वैयर्ड हालांकि इस लिहाज से छोटी कंपनी है, लेकिन उसका ध्यान भी ऊर्जा व यूटिलिटीज पर केंद्रित है और इस क्षेत्र के कुछ निवेश में उसने 30-40 फीसदी सालाना चक्रवृद्धि की रफ्तार से रिटर्न हासिल किया है।
अपोलो ग्लोबल का भारत में वेलस्पन कॉरपोरेशन लिमिटेड पर खासा नियंत्रण है जहां वह तेल व गैस परिवहन के लिए पाइप का विनिर्माण करती है। इस समूह का तेल व गैस क्षेत्र की परिसंपत्तियों के अधिग्रहण में आक्रामक इतिहास रहा है लेकिन ये मुख्य रूप से उत्तर अमेरिका व अपस्ट्रीम वैल्यू चेन तक केंद्रित हैं। ऐसे में वेदांत की तरह रिफाइनिंग व विपणन दिग्गज मसलन बीपीसीएल के अधिग्रहण का काफी मतलब बनता है।
आई स्क्वैयर्ड ने हाल में काफी सुर्खियां बटोरी जब उसने एम्पलस एनर्जी सॉल्युशंस की हिस्सेदारी मलेशिया की सरकारी तेल व गैस कंपनी पेट्रोनास को बेची। लेकिन सोलर बिजनेस से निकासी वस्तुत: थिंक गैस के जरिए भारत के सिटी गैस वितरण परियोजना में बढ़ती दिलचस्पी टकरा गई। कंपनी के पास अभी पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश के 11 जिलों में सिटी गैस वितरण के छह लाइसेंस हैं। आई स्क्वैयर्ड कैपिटल का बीपीसीएल के लिए अभिरुचि पत्र भी थिंक गैस के जरिए ही है।
बीपीसीएल का मौजूदा मूल्यांकन भी आकर्षक है, जिसे छोड़ा नहींं जा सकता। विश्लेषकों के मुताबिक, बीपीसीएल की निहित लाभांश आय से फंडिंग की लागत सहज ही पूरी हो सकती है। मौजूदा बाजार पूंजीकरण पर सरकार की हिस्सेदारी के अधिग्रहण की लागत 46,400 करोड़ रुपये हो सकती है। प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो रही वेदांत पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार से 10 अरब डॉलर जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। सरकार ने अभी नहीं बताया है कि किन कंपनियों ने बीपीसीएल के लिए अभिरुचि पत्र जमा कराया है। कंपनियों को छांटने के बाद बोली मंगाई जाएगी।