ईपीसी में व्यापक संभावना देख रही स्टर्लिंग ऐंड विल्सन

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 14, 2022 | 8:17 PM IST

शापूरजी पलोनजी समूह की कंपनी स्टर्लिंग ऐंड विल्सन सोलर अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में ईपीसी (उपकरण, खरीद और निर्माण) कार्यों में 50 गीगावॉट क्षमता की परियोजनाओं में संभावना तलाश रही है।
बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत करते हुए इसके वैश्विक मुख्य कार्याधिकारी बिकेश ओगरा ने कहा कि सौर ऊर्जा में कम शुल्क से डेवलपरों के बेहतर तकनीक के इस्तेमाल पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि इसकी लागत घट रही है। ओगरा ने कहा कि चीन से आयात पर प्रतिबंध लगने से परियोजनाओं पर बहुत असर नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा, ‘इन सभी प्रतिबंधों के बावजूद हाल की बोली में 2 रुपये प्रति यूनिट शुल्क आया है। कोई बड़ी समस्या या मंदी नहीं रही है। लागत या समयसीमा पर इसका (सेफगार्ड ड्यूटी लगने) कोई असर नहीं पड़ा है।’ भारत लंबे समय से चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर रहा है ऐसे में समय के साथ स्थानीयकरण जरूरी है।
स्टर्लिंग ऐंड विल्सन सोलर के पास इस समय 20 गीगावॉट के संयंत्र है और उसने 50 गीगावॉट का लक्ष्य रखा है। कारोबार में किसी विविधीकरण की संभावना को खारिज करते हुए ओगरा ने कहा, ‘इस क्षेत्र में 30 गीगावॉट के लिए संभावना है, ऐसे में हम किसी और कारोबार पर विचार नहीं कर रहे हैं।’ स्टर्लिंग ऐंड विल्सन सोलर को हाल ही में सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना मिली है, जो भारत में स्थापित की जाएगी। ओगरा के मुताबिक भारत, कोरिया, जापान, चीन और वियतनाम जैसे देशों में सौर वोल्टेइक की अपार संभावना है।
उन्होंने कहा, ‘भारत में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया बहुत श्रमसाध्य है, जिसकी वजह से  पीवी स्थापित करने की राह में व्यवधान पैदा करता है। हमारे पास 18,000 वर्ग किलोमीटर के जलाशय हैं, जिनकी क्षमता  280 गीगावॉट सौर संयंत्र स्थापित करने की है, लेकिन इसमें भी बहुत चुनौतियां हैं।’ उन्होंने कहा कि तकनीकी उन्नयन के माध्यम से समय के साथ यह व्यवधान कम किया जा सकेगा। उपकरणों पर फ्लोटिंग सोलर में युटिलिटी स्केल परियोजनाओं की तुलना में 25-30 प्रतिशत ज्यादा पूंजीगत लागत आती है। उपकरणों को ले जाने के हिसाब से इसमें लॉजिस्टिक्स चुनौतियां भी आती हैं। ओगरा ने कहा कि सरकार ने अगले 3  से 4 साल में 10 गीगावॉट फ्लोटिंग सोलर की बोली की घोषणा की है, जिससे लागत में कमी आएगी। वैश्विक रूप से भी 20 प्रतिशत सीएजीआर के साथ 2022 तक 5 गीगावॉट आने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा, ‘फ्लोटिंग सोलर का लाभ जमीन पर स्थापित संयंत्र की तुलना में लाभ नजर आता है। जमीन पर सौर संयत्र लगाने पर प्रति हेक्टेयर 1.3 मेगावॉट बिजली उत्पादन होता है, जबकि फ्लोटिंग सोलर मेंं यह 1य6 मेगावॉट है। उत्पादन के अलावा मॉड्यूल डिग्रेडेशन कम होता है और पानी का वाष्पन कम होने के साथ शैवाल का विकास कम होता है।’

First Published : December 13, 2020 | 11:36 PM IST