अब वित्तीय तकनीकी (फिनटेक) कंपनियां तथा स्टार्टअप भी देश में संपत्ति प्रबंधन कंपनियां (एएमसी) शुरू कर सकती हैं क्योंकि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने ऐसी कंपनियां स्थापित करने के लिए पात्रता शर्तें बदल दी हैं। सेबी ने आज अपने निदेशक मंडल की बैठक में यह फैसला किया। नियामक ने कंपनी दिवालिया ऋण शोधन अक्षमता प्रक्रिया (सीआईआरपी) से गुजरकर दोबारा सूचीबद्घ हुई कंपनियों के लिए शेयरधारिता नियम भी सख्त कर दिए ताकि उनके शेयर की उचित कीमत सुनिश्चित हो सके।
सेबी ने कहा है कि मुनाफे से जुड़ी शर्तें पूरी नहीं करने पर भी किसी कंपनी को म्युचुअल फंड कारोबार से जुडऩे की इजाजत दी जा सकती है। लेकिन उसके लिए कंपनी की शुद्घ हैसियत कम से कम 100 करोड़ रुपये होनी चाहिए। अभी तक मुनाफे वाले रिकॉर्ड और 50 करोड़ रुपये शुद्घ हैसियत रखने वाली कंपनी इस कारोबार से जुड़ सकती है।
उद्योग से जुड़े लोगों को लगता है कि इससे पेटीएम, फोनपे और मोबिक्विक जैसी फिनटेक कंपनियों को म्युचुअल फंड इकाइयां शुरू करने का हौसला मिलेगा। वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेंद्र कुमार ने कहा, ‘फिनटेक क्षेत्र की कई कंपनियां मुनाफे में आ रही हैं। फिर भी जोखिम कम करने के लिए सेबी ने दोगुनी शुद्घ हैसियत की शर्त रख दी है।’
सेबी ने कहा है कि एएमसी लगातार पांच साल तक मुनाफा कमाए तो हैसियत की शर्त नरम की जा सकती है। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स में निदेशक (फंड रिसर्च) कौस्तुभ बेलापुरकर ने कहा, ‘पात्रता शर्तों में ढील उन इकाइयों के लिए मददगार हो सकती हैं, जो म्युचुअल फंड शुरू करना चाहती हैं।’
कई फिनटेक कंपनियों ने देसी म्युचुअल फंड कारोबार में दिलचस्पी दिखाई है। म्युचुअल फंड उद्योग के पास 2014 में 10 लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां थीं, जो पिछले महीने के अंत में बढ़कर 30 लाख करोड़ रुपये हो गईं।
इस उद्योग में अभी 40 से अधिक कंपनियां हैं मगर ज्यादातर संपत्तियां शीर्ष 5 कंपनियों के पास ही हैं। कारोबार में तेज इजाफे के बाद भी कई विदेशी कंपनियां इस कारोबार से निकल गई हैं।
सेबी ने सीआईआरपी से गुजरने वाली कंपनियों के शेयरधारिता नियम भी सख्त कर दिए हैं। ऐसी कंपनियों को अब कम से कम 5 फीसदी शेयर सार्वजनिक रखने होंगे। 12 महीने में यह आंकड़ा बढ़ाकर 10 फीसदी और तीन साल के भीतर 25 फीसदी करना होगा। यह फैसला रुचि सोया इंडस्ट्रीज के शेयरों में अचानक तेजी आने के बाद लिया गया है। सेबी निदेशक मंडल ने प्रवर्तकों के न्यूनतम अंशदान और अतिरिक्त पूंजी जुटाने वाली कंपनियों के लिए समय सीमा से जुड़ी शर्तें समाप्त दीं। इसके साथ ही निवेश सलाहकारों के लिए शुल्क संरचना में बदलाव किए हैं और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड की निवेश समिति के संचालन से जुड़ी शर्तों में भी छूट दी है।