Sugar prices: भारत में चीनी के दाम पिछले कुछ महीनों से तेजी से बढ़ रहे हैं। चीनी के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं, त्योहारी सीजन में दाम और बढ़ने के अनुमान है। सरकार ने कीमतों को कम करने के लिए आयात, स्टॉक सीमा, जल्दी पेराई शुरु करने जैसे कदम उठाएं हैं। उद्योग जगत के लोगों का कहना है कि जल्द सरकार के उपाय असर दिखाने लगेंगे और नए सीजन की सप्लाई आना शुरु होगी तो कीमतें कम होना शुरु हो जाएगी।
चीनी मिलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के उपाध्यक्ष केतन पटेल का कहना है कि 2025-26 के चीनी वर्ष (अक्टूबर-सितंबर) में देश में चीनी उत्पादन 3.2 करोड़ टन रहने का अनुमान था, लेकिन वास्तव में यह क़रीब 3 करोड़ टन ही रहा। पिछले साल बारिश ज़्यादा हुई थी, जिसका गन्ने की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा। इसके अलावा गन्ने में उत्तर प्रदेश में गेरुआ रोग फैल गया । जिसके कारण शुगर रिकवरी रेट गिरा और चीनी का उत्पादन अनुमान से कम हुआ।
भारत में चीनी की खपत 2.6 करोड़ टन से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है और आम तौर पर साल के अंत में 60 से 70 लाख टन चीनी एंडिंग स्टॉक यानी बचा हुआ भंडार के रूप में रह जाती है। लेकिन 2024-25 के साल के अंत में एंडिंग स्टॉक केवल 50 से 50.5 लाख टन था। इस तरह 2025-26 की शुरुआत कम ओपनिंग स्टॉक और उत्पादन भी अनुमान से थोड़ा कम हुआ। स्टॉक कम होने की आशंका और त्योहारी सीजन नजदीक होने के कारण लोगों ने खरीदारी बढ़ा दी जिसके कारण कीमतें बढ़ गई ।
चीनी कारोबारियों का कहना है कि फिलहाल बाजार में चीनी की कमी भी नहीं है और बहुत ज्यादा स्टॉक भी नहीं है । बाजार में जितनी चीनी आ रही है, वह तुरंत बिक जा रही है। वैश्विक बाजार में भी चीनी का स्टॉक कम है। लोगों में यह डर बैठ गया है कि अल नीनो के कारण बारिश नहीं होगी और चीनी और महंगी होगी। नतीजा यह है कि जो लोग पांच किलो चीनी ख़रीदते थे, वे अब 50 किलो ख़रीद रहे हैं और जो 50 किलो ख़रीदते थे, वे अब 100 किलो मांग रहे हैं।
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के मुताबिक़, भारत में हर साल औसतन 55 लाख से 60 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती है । औसतन 45 करोड़ टन गन्ने का उत्पादन होता है । केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग की तरफ से दावा किया गया कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है । कुछ व्यापारियों, डीलरों और बिचौलियों की जमाखोरी, सट्टेबाजी और मिलों से चीनी की वास्तविक आवाजाही किए बिना कागजों पर किए जाने वाले कारोबार ने बाजार में कमी की एक कृत्रिम तस्वीर बनाने में भूमिका निभाई है । सरकार ने दावा किया कि देश की घरेलू खपत के लिए ज़रूरी चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।
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त्योहारी सीजन में हर साल बाजार में चीनी की कीमतों में बढ़ोत्तरी होती है। केतन पटेल का कहना है कि अभी भले ही कीमतें 50 रुपये से ऊपर हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सीजन के दौरान आम तौर पर कीमतें 38 से 42 रुपये के बीच रही हैं। उस कीमत पर मिलें किसानों को फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस यानी एफआरपी भी समय पर नहीं दे पातीं । अक्तूबर से नई चीनी बाजार में आएगी, इसलिए कीमतों में गिरावट देखने को मिलेगी।
श्रीरेणुका शुगर के कार्यकारी निदेशक विजेंद्र सिंह कहते हैं कि सरकार ने कीमतों को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। 31 अक्टूबर, 2026 तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के बिना ड्यूटी वाले आयात की इजाजत दी। खरीदारों और व्यापारियों के लिए स्टॉक रखने की सीमा, साथ ही 100% आयात शुल्क में कटौती या उसे हटाने पर विचार करना और यूपी व महाराष्ट्र की मिलों से 10-15 दिन पहले ही पेराई शुरू करने को कहा है।
मिलों के लिए, कीमतों में यह उछाल एक बार की घटना है, न कि कोई स्थायी बिज़नेस ट्रेंड। इससे उन्हें साल के बाकी समय में हुए कुछ नुकसान की भरपाई करने का मौका मिल रहा है, लेकिन इसे बुनियादी हालात में कोई स्थायी बदलाव नहीं माना जाना चाहिए। एक बार जब सरकार के उपाय (आयात, स्टॉक सीमा, जल्दी पेराई) असर दिखाने लगेंगे और नए सीजन की सप्लाई आने लगेगी, तो कीमतें कम होने और स्थिर होने की उम्मीद है।
कच्चे तेल के आयात को कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 2018 में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फ़ीसदी करने का फैसला किया था । यह लक्ष्य 2030 में हासिल किया जाना था, लेकिन सरकार ने इसे जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने के लिए किया गया। यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का करीब 10 फ़ीसदी है।
चीनी मिल का कहना है कि इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है और यह चीनी मिलों को नकदी उपलब्ध कराता है, लेकिन सरकार इस बात को लेकर स्पष्ट रही है कि चीनी का उत्पादन हमेशा पहली प्राथमिकता है। यह आरोप लगाना आसान है कि सरकार ने इथेनॉल के उत्पादन के लिए चीनी को डायवर्ट होने से नहीं रोका. लेकिन यहां यह याद रखना जरूरी है कि चीनी उत्पादन के शुरुआती अनुमान काफी ज्यादा थे। समस्या यह है कि गन्ने और चीनी के उत्पादन का सटीक अनुमान लगाने के लिए हमारे पास कोई सटीक तरीक़ा या तकनीक उपलब्ध नहीं है।