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रुपये पर दबाव जरूर मगर अभी 100 पार नहीं! जानकारों का दावा: अभी इसकी संभावना न के बराबर

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कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों की निकासी के कारण रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, लेकिन जानकारों के मुताबिक जल्द 100 का स्तर पार करने की आशंका कम है

Last Updated- May 17, 2026 | 10:14 PM IST
Rupee
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार नए निचले स्तर को छू रहा है और दबाव में है। बाजार के अधिकतर प्रतिभागियों का मानना ​​है कि यदि तेल की कीमतों में और तेजी नहीं आती तथा विदेशी निवेशकों की निकासी बढ़ती नहीं तो निकट भविष्य में रुपये के 100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने की आशंका कम ही है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने बाजार के 7 प्रतिभागियों से बात की जिनमें से केवल 2 ने संकेत दिया कि अगले 6 महीने में रुपया 100 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर सकता है। शुक्रवार को कारोबार के दौरान रुपया 96 के स्तर को पार कर 96.14 प्रति डॉलर के निचले स्तर को छू गया। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, डॉलर में मजबूती और भारत के बढ़ते व्यापार घाटे की चिंता से रुपये में नरमी आई थी। शुक्रवार को कारोबार के अंत में रुपया 95.97 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।  

हालांकि अधिकतर प्रतिभागियों को लगता है कि रुपया 100 प्रति डॉलर के स्तर तक नहीं पहुंचेगा।

बार्कलेज के फॉरेक्स और इमर्जिंग मार्केट मैक्रो स्ट्रैटजी एशिया प्रमुख मितुल कोटेचा ने कहा, ‘ईमानदारी से कहूं तो 100 का आंकड़ा हमारे अनुमान में नहीं है।’ जब मार्च में बार्कलेज ने अपना अनुमान जारी किया था तो उसे सबसे मंदी वाला माना गया था मगर रुपये में गिरावट की रफ्तार उनके अनुमान से कहीं अधिक तेज रही।

कोटेचा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘100 का स्तर हमारे प्रकाशित पूर्वानुमान का हिस्सा नहीं है लेकिन रुपये की गिरावट की गति निश्चित रूप से बहुत तेज और नाटकीय रही है। हम पहले से ही उन स्तरों से आगे बढ़ चुके हैं जिन्हें पहले अपेक्षाकृत मंदी वाला अनुमान माना जाता था।’ बार्कलेज ने जून के लिए रुपये का अनुमान 95 प्रति डॉलर और साल के अंत के लिए 96.8 प्रति डॉलर का अनुमान लगाया था।

कोटेचा ने कहा, ‘प​श्चिम ए​शिया में युद्ध के पहले ही भारत के शेयर बाजार से निकासी शुरू हो गई थी। आयातकों द्वारा डॉलर की खरीद भी काफी मजबूत थी। ये कारक पहले से मौजूद थे लेकिन फरवरी के अंत में जब युद्ध शुरू हुआ तो रुपये की गिरावट की गति तेज हो गई।’

डीलरों ने बताया कि डॉलर की लगातार मांग और विदेशी कोषों की निकासी के बीच मुद्रा बाजार में धारणा मंदी वाली हो गई है। 

हालांकि अत्यधिक अस्थिरता की ​स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से सरकारी बैंकों के जरिये मुद्रा बाजार में बीच-बीच में दखल देने की उम्मीद है। 

आईएफए ग्लोबल के संस्थापक और सीईओ अभिषेक गोयल ने कहा, ‘रुपये के 100 के स्तर पर पहुंचने की समय-सीमा निर्धारित करना कठिन है क्योंकि सब कुछ तेल की कीमतों पर निर्भर करता है।’

उन्होंने कहा, ‘यदि कच्चा तेल 90 डॉलर से 125 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहता है तो करीब 6 महीने से एक साल में रुपया इस स्तर पर आ सकता है। यदि कच्चा तेल 125 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाता है और उस स्तर पर बना रहता है तो रुपया सितंबर के अंत तक ही 100 के स्तर पर पहुंच सकता है।’

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान संघर्ष को लेकर अनिश्चितता के बीच शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़कर 109 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। इसी समय डॉलर इंडेक्स भी बढ़कर 99.30 पर पहुंच गया जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया है।

अप्रैल में भारत का वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 28.38 अरब डॉलर हो गया जिससे देश की बाह्य स्थिति को लेकर चिंता और बढ़ गई। वर्ष 2026 में अब तक रुपये में 6.35 फीसदी की गिरावट आई है और अप्रैल से अब तक यह 1.21 फीसदी कमजोर हुआ है।

गोयल ने आगे कहा, ‘निर्यातकों को हेजिंग करने में झिझक हो रही है। बाजार में अब मोटे तौर पर दो गुट हैं- एक जो डॉलर-रुपया में लॉन्ग पोजीशन बनाए हुए हैं और दूसरे वे जो कुछ हस्तक्षेप या उलटफेर की उम्मीद में इंतजार कर रहे हैं। बहुत कम लोग इस समय डॉलर-रुपया को शॉर्ट करने के बारे में सोच रहे हैं।’

बाजार प्रतिभागियों ने कहा कि अगर रुपया 100 प्रति डॉलर के स्तर की ओर तेजी से बढ़ता है तो सरकार और आरबीआई नीतिगत उपाय कर सकते हैं। ऐसे कदम 2013 के मुद्रा संकट के दौरान किए गए उपायों की तरह होंगे। 

फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी में ट्रेजरी प्रमुख और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा सरकार को विदेशी मुद्रा प्रवाह को आकर्षित करने के उपायों पर विचार करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो जून के अंत तक रुपया 97 प्रति डॉलर से 97.50 प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है। यदि मौजूदा स्थितियां बनी रहती हैं तो सितंबर या अक्टूबर तक रुपये के 100 प्रति डॉलर के स्तर को छूने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।

बाजार प्रतिभागियों ने कहा कि टिकाऊ विदेशी प्रवाह की अनुपस्थिति में डॉलर की बिक्री के माध्यम से रुपये को सहारा देने के लिए आरबीआई की क्षमता सीमित हो सकती है। उन्होंने कहा कि विदेशी जमाओं और पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने के लिए 2013 में शुरू किए गए उपायों के समान इस बार भी उपायों पर विचार करना पड़ सकता है।

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First Published - May 17, 2026 | 10:13 PM IST

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