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बढ़ा निर्यात तो हुई कपास की किल्लत

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Last Updated- December 07, 2022 | 6:02 AM IST

कपास के उत्पादन में बढ़ोतरी होने के बावजूद कपास की कीमतों में तेजी का दौर जारी है। इसकी वजह सरकार द्वारा कपास के निर्यात में छूट देने को समझा जा रहा है।


जिस वजह से कपास का निर्यात बढ़ा है, साथ ही कच्चे तेल की कीमतों के बढ़ने से पॉलिस्टर की कीमतों में भी तेजी आई है इस वजह से भी कपास की मांग बढ़ी है। जिसके चलते कपड़ा उत्पादकों को ऊंची कीमतों पर कपास खरीदना पड़ रहा है।

देश में कपास का उत्पादन बढ़ने के बावजूद एक साल के अंदर कपास की कीमतों में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। कारोबारियों के अनुसार इस समय जो स्थिति बनी हुई है उसको देखते हुए कपास की कीमतों में अभी 500 से 1000 रुपये प्रति बेल्स (एक बेल्स में 170 किलोग्राम होते हैं) तक की और तेजी आ सकती है।

इस समय शिवडी कपास बाजार में आईसीएक्स 101(22एमएम से नीचे)23500 रुपये प्रति कैंडी, आईसीएक्स 106 (33एमएम) 20300 रुपये, आईसीएक्स 107 (35एमएम) 32000रुपये प्रति कैंडी पर चल रहा है। वर्ष 2007-08 में पूरी दुनिया में 26.21 मिलियन टन कपास का उत्पादन हुआ। विश्व बाजार में भारत ने इस दौरान 65 लाख टन कपास का निर्यात किया। भारत द्वारा भारी मात्रा में किये गये कपास निर्यात का खामियाजा कपड़ा उत्पादकों को उठाना पड़ा है।

कपड़ा व्यवसाय की प्रमुख संस्था हिन्दुस्तान चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष शंकर केजरीवाल के मुताबिक राजनीतिक कारणों और सट्टेबाजी की वजह से इस वर्ष कपास की बंपर पैदावार के बावजूद निर्यात की अनुमति देने से इसकी कीमतों में तेजी आई है, साथ ही यार्न की भी यही स्थिति रही है। कारोबारियों का कहना है कि चीन भारी मात्रा में गुजरात से कपास की खरीद कर रहा है।

इसके अलावा देसी कपड़ा उत्पादकों ने भी कपास की खरीद तेज कर दी है जिसकी वजह से इसकी मांग बढ़ गई है। और जब मांग बढ़ेगी तो कीमतें तो अपने आप ही बढ़ेंगी। एक जमाना था कि मुंबई को कपड़ा उत्पादन का मक्का कहा जाता था, लेकिन सरकारी करों के बोझ में आज यह उद्योग दम तोड रहा है। इस समय कपडा व्यवसाय में तीन फीसदी शुल्क देना होता है।

कपड़ा उद्योग को सालाना यहां 1500 करोड़ रुपये शुल्क के रूप में अदा करने पडते हैं। 2000 से ज्यादा कपड़ा कारोबारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले चैंबर के अध्यक्ष केअनुसार देश में पैदा हुआ कपास विदेशी बाजार में बेचा जाता है जिसका फर्क यह हो रहा है कि घरेलू मांग को पूरा करने में दिक्कत आ रही है और यहां के व्यापारियों को मजबूरी में ऊंचे दाम पर कपास खरीदना पडा रहा है।

पिछले दिनों महाराष्ट्र में कुछ राजनीतिक हलचलों की वजह से उत्तर भारतीय मजदूरों के पलायन का भी उद्योग पर बुरा असर पड़ा है। इन मजदूरों को रोजगार के लिए मजबूरी में देश के दूसरे शहरों का रुख करना पड़ा है और उनके वापस आने की उम्मीद भी न के बराबर है।

इस साल कपास का उत्पादन 310 लाख बेल्स रहा। जो पिछले साल के 280 बेल्स उत्पादन  से 11 प्रतिशत अधिक है। अच्छे मानसून और कपास उत्पादन की नई तकनीक एवं शंकर प्रजाति के बीज से इस वर्ष उत्पादन में लगभग 10 फीसदी की बढ़ोतरी होने की उम्मीद जताई जा रही है। गौरतलब है कि वर्ष 2002 में मोनेसेटों के बोलगार्ड सहित सभी जीन संवर्द्धित कपास की किस्मों के उपयोग से प्रति हेक्टेयर उत्पादन दोगुना होकर 560 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया ।

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First Published - June 17, 2008 | 11:42 PM IST

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