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चिदंबरम ने समझाया, सबको समझ आया
कविता चौधरी /  September 14, 2012

यह वित्त मंत्री पलानिअप्पन चिदंबरम के अकाट्य तर्क ही थे कि गुरुवार को हुई कैबिनेट की अहम बैठक में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार डीजल की दरों में बढ़ोतरी का 'साहसिक' फैसला करने पर मजबूर हुई। चिदंबरम ने अपने सहयोगियों को यही बताया कि अगर कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की गई तो हालात और खराब हो सकते हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा देश की रेटिंग घटाने के खतरे की ओर इशारा किया, साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि पेट्रोल और डीजल की दरों में बढ़ते अंतर को कम किया जाए। वित्त मंत्री ने ही पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी के डीजल की दरों में बढ़ोतरी के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया।
हिमाचल प्रदेश और गुजरात में आसन्न विधानसभा चुनावों को देखते हुए संप्रग डीजल के भाव में 5 रुपये की बढ़ोतरी के प्रभाव से अच्छी तरह वाकिफ था, फिर भी वित्त मंत्री ने बैठक में कहा कि कुछ 'कड़े फैसले' लेने की जरूरत है। चिदंबरम पिछले कुछ अरसे से स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि सरकार के लिए संभव नहीं कि वह पेट्रोलियम उत्पादों पर दी जा रही सब्सिडी के लगातार बढ़ते बोझ को सहन करती रहे। फिर एसऐंडपी और फिच जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा रेटिंग घटाए जाने की धमकी की भी दुहाई दी गई। वित्त मंत्री ने बताया कि देश की रेटिंग घटने का भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी खमियाजा उठाना पड़ेगा, जिससे ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी होगी। 
पेट्रोलियम उत्पादों पर दी जा रही भारी सरकारी सब्सिडी के चलते सरकार का राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है, डीजल की दरों में बढ़ोतरी की एक वजह यह भी रही। इस बात को भी रखा गया कि सरकारी तेल विपणन कंपनियों को डीजल की प्रति लीटर बिक्री पर 17 रुपये का नुकसान हो रहा है। इस मामले में एक और तर्क पेश किया गया कि चूंकि पेट्रोल विनियंत्रित हो गया इसलिए उसकी कीमतों की लगातार समीक्षा हो रही है जबकि डीजल के मामले में ऐसा नहीं है। इस वजह से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार ने डीजल के इस्तेमाल और पर्यावरण पर उसके प्रभाव के बारे में भी बात की। वित्त मंत्री ने कहा कि डीजल कारों की बढ़ती संख्या, डीजल जेनरेटरों का बढ़ता इस्तेमाल और कृषि क्षेत्र में डीजल के अंधाधुंध उपयोग को भी कम करने की जरूरत बताई।
वित्त मंत्री की बातों का समर्थन करते हुए नवीन एवं अक्षय ऊर्जा मंत्री फारुक अब्दुल्ला ने संप्रग सरकार के सामने एक बेहद प्रचलित जुमले 'बाइट द बुलेट' यानी कड़े फैसले लेने की बात दोहराई। उचित कदम न उठाने की वजह से और बदतर होती तस्वीर की आशंका जताते हुए चिदंबरम ने कहा कि अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपये में आ रही कमजोरी की वजह से तेल विपणन कंपनियों के घाटे में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पिछले साल जून में डॉलर के मुकाबले रुपया 44 रुपये के स्तर पर था जो जुलाई, 2012 में 57 रुपये के स्तर पर पहुंच गया। वैसे यह पहला अवसर नहीं था जब वित्त मंत्री गठबंधन और अपने सहयोगियों के सामने मौजूदा आर्थिक हालात के बारे में बता रहे थे। यहां तक कि समन्वय समिति की पिछली बैठक में भी वित्त मंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष कड़ी चुनौतियों की चर्चा की थी। तृणमूल कांगे्रस की अध्यक्ष ममता बनर्जी पिछली बैठक में मौजूद थीं। हालांकि गुरुवार को राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीपीए) की जिस बैठक में दरों में बढ़ोतरी का फैसला लिया गया उसमें तृणमूल के कोटे से मंत्री मुकुल रॉय मौजूद नहीं थे। जहां तक रसोई गैस सिलिंडरों की बात है तो सीसीपीए के सदस्यों को बताया गया कि तकरीबन 49 फीसदी परिवार साल में छह सिलिंडरों का इस्तेमाल करते हैं। सभी कड़े फैसलों पर उठने वाले विरोधी स्वरों को यही कहते हुए शांत करने की कोशिश की गई कि जब अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी तो जनभावनाओं सहित सभी चीजों में सुधार आ जाएगा।

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