डॉलर के मुकाबले रुपये के टूटने से उत्तर प्रदेश के कालीन, सिल्क और हस्तशिल्प निर्यातकों का कारोबार भी डूब गया है। प्रदेश के सिल्क, कालीन और अन्य निर्यातकों पर इस बार का संकट 2008 की मंदी से कहीं ज्यादा भारी पड़ रहा है। सिल्क के निर्यातक जहां देसी बाजार और लिनेन के काम में जीविका तलाश रहे हैं तो कालीन निर्यातक होम फर्निशिंग के काम में नई संभावनाएं देखने लगे हैं।
बनारस के सिल्क कारोबारियों की मानें तो बीते छह महीनों में निर्यात के ऑर्डर 50 फीसदी कम हो गए हैं और जो ऑर्डर आ भी रहा है उसकी मात्रा बहुत कम है। लखनऊ की चिकनकारी भी मंदी के बोझ से निपटने के कगार पर आ गई। पाकिस्तान व खाड़ी देशों से आने वाली चिकन के कपड़ों की मांग भी इस बार खासी घटी है। बनारस के सिल्क कारोबारी और सिनर्जी फैब्रीक्राफ्ट के रजत मोहन पाठक के मुताबिक रुपये के मुकाबले डॉलर के मजबूत होने पर कायदे से तो निर्यातकों को फायदा होना चाहिए, पर ऐसा हो नहीं रहा है। उनका कहना है कि यूरो जोन संकट के चलते विदेश से मिलने वाले ऑर्डर आधे से भी कम रह गए हैं। उनका कहना है कि निर्यातकों के सामने दूसरा सबसे बड़ा संकट टुकड़ों में भुगतान मिलने का है। पाठक बताते हैं कि ऑर्डर देने वाली पार्टियां अब भुगतान तीन या चार टुकड़ों में कर रही हैं। हर भुगतान पर बैंक अपने शुल्क काट लेता है जिसकी भरपाई ऑर्डर देने वाला तो करता नहीं है।
उनका कहना है कि चीन से आने वाला कच्चे रेशम का धागा भी डॉलर की मजबूती के चलते महंगा हो गया है, जिससे घरेलू बाजार में खपने वाले माल की कीमत भी बढ़ी है। मैसूर के एक बड़े सिल्क निर्माता का उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि उक्त फर्म ने न केवल अपना कारखाना बंद कर दिया बल्कि जॉबवर्क पर उतर आया। इसी तरह बनारस के कई सिल्क कारोबारी अब क्रेप व दूसरे कपड़ों पर छपाई का काम करने लगे हैं। संकट अकेले सिल्क निर्यातकों के सामने नहीं है। कालीन निर्माता भी इसकी चपेट में हैं। 2010-11 में तो भदोही के कालीन निर्यातकों के पास 1100 करोड़ रुपये तक के ऑर्डर थे और उनके सामने श्रमिकों के मिलने की परेशानी खड़ी हो गई थी। बहरहाल अब वह तेजी हवा हो गई है और आज ऑर्डर के अभाव में कई कालीन निर्माता तो होम फर्निशिंग के काम में हाथ आजमा रहे हैं। बनारस के मशहूर कालीन कारोबारी अनीसा ट्रेडर्स इसका उदाहरण हैं जो अब दिल्ली में करघा के नाम से होम डेकोर का काम करने लगे हैं।
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