पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में इजाफा ऐसा तूफान खड़ा करने में सक्षम है जिसकी तुलना केवल प्याज से की जा सकती है। वर्ष 1973 में पहले तेल संकट के बाद इंदिरा गांधी ने तेल कीमतों में तेज इजाफा किया था जिसके खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन बाद में जेपी आंदोलन के रूप में पल्लवित हुआ और सरकार को चुनौती देने में कामयाब रहा। वर्ष 1985 में पद संभालने के बाद राजीव गांधी का पहला वर्ष तो अच्छा बीता लेकिन उसके बाद जनवरी 1986 में जैसे ही उन्होंने कीमतें बढ़ाईं विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लग गई और उन्होंने तत्काल कीमतों में की गई बढ़ोतरी वापस ले ली। उसके बाद से यह घटना कई बार दोहराई जा चुकी है। पहले खाड़ी युद्घ के वक्त जब तेल कीमतों में तेजी आई थी उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री तेल कीमतों में इजाफे से तब तक बचते रहे जब तक कि देश विदेशी मुद्रा संकट के कगार पर नहीं पहुंच गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार का रुख भी कुछ ऐसा रहा लेकिन अब उसने पेट्रोल की कीमत में करीब 12 फीसदी का इजाफा किया है जो अब तक की गई सबसे तेज बढ़ोतरी में शामिल है। ऐसा करने के क्रम में सरकार ने तेल कीमतों में इजाफे के इतिहास को भुला दिया और शायद अतीत से कोई सबक नहीं लिया। तेल कीमतो में बढ़ोतरी का एक सही और एक गलत तरीका मौजूद है। गलत तरीका है कई महीनों तक दुविधा में रहने के बाद अचानक उपभोक्ता की जेब पर तगड़ी चपत लगाना। सही तरीका है हर महीने या दो महीने पर थोड़ा-थोड़ा इजाफा करते रहना। निरंतर इजाफा होते रहने पर इतना तगड़ा अहसास नहीं होगा और लोग इसे बर्दाश्त कर लेंगे। मौजूदा मामले में यह कहा जा सकता है कि सरकार काफी समय गंवा चुकी थी और तेल कंपनियों की खस्ता हालत और बढ़ती सब्सिडी के मद्देनजर उनके पास दूसरा कोई चारा नहीं बचा था। यह दलील सही नहीं है। अगर पेट्रोल और डीजल तथा घरेलू गैस और यहां तक कि केरोसिन की कीमत में भी 2 से 3 फीसदी का इजाफा किया गया होता तो भी तेल कंपनियों को ज्यादा नहीं तो भी लगभग इतना राजस्व तो हासिल हो ही जाता। ऐसी स्थिति में लोगों को झटका भी नहीं लगता और काम भी हो जाता। एक या दो महीने के बाद एक बार फिर इतना इजाफा किया जा सकता था। तेल कंपनियों को सबसे कम घाटा पेट्रोल पर ही होता है। परंतु विभिन्न राजनैतिक हलकों जिसमें गठबंधन के साझेदार भी शामिल हैं से होने वाली आलोचना के चलते सरकार अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में इजाफे की जरूरी घोषणा करने में कठिनाई महसूस कर रही है। ये सभी उत्पाद पेट्रोल की तुलना में ज्यादा मात्रा में बिकते हैं। पेट्रोल की कीमतों को नाममात्र के लिए नियंत्रणमुक्त तो कर दिया गया है लेकिन वे राजनैतिक जकडऩ से बाहर नहीं निकल पाई हैं। जबकि ऐसा होना आवश्यक है। विभिन्न राज्यों में स्वतंत्र नियामकों की नियुक्ति करके बिजली की कीमतों को राजनीतिक पहुंच से दूर किया जा चुका है। पेट्रोल के मामले में एक अलग तकनीक अपनाए जाने की आवश्यकता है। सरकार को तेल विपणन कंपनियों को कीमत निर्धारित करने की शक्ति दे देनी चाहिए। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस पर कोई सब्सिडी नहीं दी जाएगी (हालांकि कुछ क्रॉस सब्सिडी अपरिहार्य है), कीमतों में इजाफा किसी भी सूरत में दो फीसदी से अधिक नहीं होगा और एक महीने से कम समय में दोबार कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। इसके अलावा सभी पेट्रोलियम शुल्क तय होने चाहिए, उनमें मूल्य के अनुसार परिवर्तन नहीं आना चाहिए। तभी केंद्र और राज्य सरकारें कीमतें बढऩे पर अघोषित लाभ हासिल नहीं कर पाएंगी।
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