| प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रतिस्पद्र्घा के प्रतिकूल है? | | कुमकुम सेन / April 22, 2012 | | | | |
जून 2011 में भारतीय प्रतिस्पद्र्घा आयोग (सीसीआई) की स्थापना और इसका परिचालन शुरू होने के साथ ही एक लंबे इंतजार का अंत हो गया था। उसके बाद से अब तक इसके कामकाज और फैसलों पर विवाद नहीं हुआ है। इस तरह की व्यवस्था के अभाव में अंतरराष्ट्रीय कारोबार जगत और कानूनी समुदायों की तरफ से प्रतिकूल आलोचना की गुंजाइश बनी थी, विशेष रूप से भारत में बड़े वैश्विक विलय से संबंधित मामलों में जिनमें स्वामित्व परिवर्तन शामिल है। विलय नियंत्रण अधिसूचना प्रणाली को लेकर एक अलग और एक हद तक सनक से भरी राय यह है कि विदेशी कंपनियों के साथ विलय एवं अधिग्रहण के मामले में यह वास्तव में बाधा खड़ी करती है क्योंकि कारोबार के अनियंत्रित माहौल में विदेशी निवेशक इस तरह के सौदों का ज्यादा फायदा उठा सकते हैं।
अब तक एक और धारणा रही है कि कुछ खास क्षेत्रों में, विशेष तौर पर जहां 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति है, में रुक-रुक कर कई चरणों में विदेशी निवेश के प्रवेश से घरेलू निवेशक विलुप्त होने लगे हैं। ऑटोमोबाइल क्षेत्र इसका बढिय़ा उदाहरण माना जा सकता है, जहां एक समय ऐंबेसडर कार बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान मोटर्स (एचएम) अग्रणी भूमिका में थी। एचएम ने अपने उत्पाद को बदलते हुए दौर के साथ-साथ उन्नत नहीं बनाया, लिहाजा उसकी बाजार हिस्सेदारी पर मारुति का कब्जा होता गया। एक दौर ऐसा था, जब ऐंबेसडर का एकाधिकार था, न केवल सरकारी खरीद में बल्कि टैक्सी बाजार और निजी इस्तेमाल के लिए खरीदी जाने वाली कारों के बाजार में भी। उस जमाने में आपूर्ति की तुलना में मांग बहुत अधिक होती थी और कई मर्तबा पुरानी कार की कीमत उसकी मूल कीमत से ज्यादा ठहरती थी और नई कार के लिए इंतजार की अवधि एक साल से भी अधिक होती थी। लेकिन, अब हालात बदल गए हैं। टाटा मोटर्स को छोड़कर कोई ऐसी घरेलू कार कंपनी नहीं है, जिसकी इस बाजार में उल्लेखनीय हिस्सेदारी हो लेकिन कई विदेशी कंपनियां हैं, जिनका बाजार में दबदबा है और उनमें से ज्यादातर अकेले दम पर शानदार कारोबार कर रही हैं। इस केस स्टडी के नतीजों से कोई संदेह नहीं रह जाता कि सतत एकाधिकार वाले उस दौर ने एक ऐसी नस्ल को जन्म दिया जो आत्मसंतोषी था जिससे नई-नई चीजों की खोज में बाधा पहुंची और जिसकी बदलाव लाने की इच्छा बिलकुल नहीं थी।
लेकिन टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार में सफलता की कहानी कुछ अलग है। 100 वर्षों की लंबी अवधि में वीडियोकॉन और बीपीएल जैसी मौजूदा एवं नई स्थानीय कंपनियों ने सीटीवी के बाजार में अपना-अपना प्रभुत्व बनाए रखा। इसके बाद अकाई ने बाजार में कदम रखा और रंगीन टेलीविजन की कीमत 15,000 रुपये से घटाकर 9,000 रुपये कर दी जिससे विपणन रणनीति के क्षेत्र में एक नया मोड़ आ गया। लेकिन अकाई की यह रणनीति ज्यादा दिन तक काम नहीं आई और तगड़ी प्रतिस्पद्र्घा के मामले में इस कंपनी ने कोरियाई कंपनियों के आगे घुटने टेक दिए। कोरियाई कंपनियों ने इस रणनीति का गहराई से अध्ययन किया और पूंजी निवेश को ध्यान में रखते हुए विपणन की रणनीति पर बहुत काम किया। इसके नतीजे में तगड़ी प्रतिस्पद्र्घा का माहौल बना और सुनिश्चित हो गया कि बाजार में वही कंपनी टिक पाएगी जो सबसे ज्यादा अनुकूल होगी। लेकिन यदि कठिन दौर में भी एक से अधिक कंपनियां बाजार में टिक जाती हैं तो ऐसी स्थिति में व्यवसाय का एकीकरण दूर नहीं रह जाता और यही वह मौका होता है, जब विनियामक की भूमिका बहुत अहम हो जाती है।
ऐसा नहीं है कि भारतीय उद्योग असुरक्षित हैं। पिछले साल प्रेस नोट 18/1998 और उसके बाद प्रेस नोट 1 और 3/2005 अंतत: खत्म कर दिए गए और एफडीआई की वजह से दूरसंचार एवं बीमा क्षेत्र को हुए फायदे के बावजूद इन क्षेत्रों में विदेशी निवेश की निर्धारित सीमा जारी रखी गई। फिर भी, यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि इन प्रतिबंधों के बदौलत बाजार की गतिविधियों को नियंत्रण में रखा जा सकेगा। बाजार में प्रभुत्व और उसके नाजायज इस्तेमाल का हल एंटी-ट्रस्ट कानूनों के जरिये निकालना होगा। असल में, हर क्षेत्र और हर उद्योग का विकास अलग-अलग तरीके की प्रतिस्पद्र्घा के बदौलत होता है जो बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जरा गौर करें, देश के नागर विमानन क्षेत्र में विदेशी विमानन कंपनियों के एफडीआई को अनुमति देने पर सरकार की ओर से विचार किए जाने की एक वजह से किंगफिशर को मुश्किलों से उबारने की कोशिश हो सकती है।
देश के भीतर और बाहर दवा क्षेत्र में उचित एफडीआई, विलय और अधिग्रहण हुए हैं। इस क्षेत्र में देश के अंदर अधिग्रहणों की बाढ़ से इस बाजार में बड़ी कंपनियों की गुटबंदी वाली स्थिति पैदा होने की आशंका बढ़ी है क्योंकि इनमें से कोई विलय और अधिग्रहण सीसीआई की जांच के दायरे में नहीं आया है। माना जा रहा है कि मायरा समिति की रिपोर्ट में दवा क्षेत्र में सुधार के लिए एफआईपीबी के हस्तक्षेप से इनकार किया गया है, जिसकी मांग की जा रही है।
बहु-ब्रांड खुदरा करोबार के मामले में संरक्षणवाद का मसला जोरदार तरीके से उठाया गया है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत संरक्षणवाद की रणनीति पलटने की क्षमता रखता है? या यूं कहें कि क्या भारत को एफडीआई की जरूरत नहीं है? तेज मुद्रास्फीति की चुनौती, भारी-भरकम राजकोषीय घाटे का बोझ और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे को देखते हुए तो यही लगता है कि देश में एफडीआई की जरूरत है और केवल एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेश) पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वजह स्पष्ट है, एफडीआई ज्यादा स्थायी और स्थिर होता है। बहु-ब्रांड खुदरा बाजार को एफडीआई के लिए खोलने या न खोलने के मसले पर काफी अध्ययन और आकलन हो चुके हैं और ऐसा लगता है कि इस मामले में कोई भी फैसला राजनीतिक नफा-नुकसान के आधार पर किया जाएगा, न कि वाणिज्यिक जरूरतों के आधार पर। देश के शहरी इलाकों में बहु-ब्रांड खुदरा स्टोर पहले से मौजूद हैं और इस वजह से पड़ोस की दुकानें बंद नहीं हुईं हैं।
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