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समाचार मीडिया को तलाशने होंगे फर्जी खबरों से निपटने के तरीके

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  September 29, 2017

फेसबुक ने अंग्रेजी, गुजराती और कुछ अन्य भाषाओं में जारी विज्ञापनों में फर्जी खबर की पहचान करने के बारे में सुझाव दिए हैं। इस विज्ञापन को देखकर ऐसा लगता है कि फेसबुक अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी खबरों का प्रसार रोकने की अपनी जिम्मेदारी को लेकर आखिरकार सचेत हुआ है। यह एक ऐसे 'इको-चैम्बर' की तरह हो चुका है जिसके भीतर करीब 2 अरब लोग अपनी राय जाहिर करते हैं, दूसरे लोगों के विचारों, खबरों, तस्वीरों या वीडियो पर टिप्पणी करते हैं और सूचनाओं को साझा करते हैं। सोशल मीडिया का लोगों के मतदान व्यवहार, उनके खानपान और खरीदारी के तरीके तय करने में भी बड़ी भूमिका होती है। लोग इस पर भरोसा करते हैं और उनके इस भरोसे की ही वजह से फेसबुक को मोटी कमाई होती है। गूगल के साथ मिलकर फेसबुक पूरी दुनिया में डिजिटल विज्ञापन हासिल करने वाली सबसे बड़ी कंपनी है। इसके नाते उसकी जिम्मेदारी भी बनती है।

 
वैसे भारत ही नहीं, अधिकांश विकसित देशों में फर्जी खबरें बड़ी चिंता का विषय बनकर उभरी हैं। हाल ही में एम्सटर्डम में संपन्न अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टिंग सम्मेलन (आईबीसी) में भी यह मुद्दा जोर-शोर से उभरा। दुनिया भर से आए 57,000 प्रतिभागियों ने मीडिया, मनोरंजन और तकनीक क्षेत्र के इस सबसे बड़े आयोजन में छह दिनों तक कई ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की। तकनीकी पैरोकार और विक्रेता जहां नई मीडिया तकनीकों पर चर्चा कर रहे थे वहीं संगोष्ठियों में फर्जी खबरों का मुद्दा छाया रहा। सम्मेलन के पहले दिन इस मुद्दे पर तीन सत्र हुए जिनमें चर्चा फर्जी खबरों के खिलाफ लड़ाई में भारतीय मीडिया की मदद के तरीकों पर ही केंद्रित रही।
 
पहली बात तो यह है कि समाचार उद्योग को फर्जी खबरों के मामले में अधिक आवेग में आने की जरूरत नहीं है। उसे विचारों की अभिव्यक्ति या नियमन की कोशिशों के खिलाफ हो-हल्ला करने की जरूरत नहीं है। सैली बज़बी के सत्र में शामिल होने पर मुझे यही महसूस हुआ। एसोसिएटेड प्रेस की कार्यकारी संपादक सैली का नजरिया संतुलित था, वह न तो वाम और न ही दक्षिण पंथ के प्रति आलोचनात्मक दिखीं। इसके बजाय उन्होंने फर्जी खबरों से जुड़ी चुनौतियों और तथ्यों को तवज्जो दी। सैली का मानना है कि फर्जी खबरों के लिए मुख्यधारा मीडिया और उसके अभिजनवादी रुख को तो जिम्मेदार ठहराया जा सकता है लेकिन अगर मीडिया गलतियों का भी जिक्र नहीं करता है तो 'असली खतरा' पैदा होगा। हालांकि फर्जी खबर को रोकने का मतलब विचारों की अभिव्यक्ति पर लगाम लगाना नहीं है।
 
दूसरी बात, कोई भी खबर किस हद तक फर्जी है? एक सत्र में ब्रिटेन के चैनल 4 के समाचार संपादक बेन डी पियर ने नियामक संस्था ऑफकॉम की तरफ से फटकार लगाए जाने का जिक्र किया। चैनल ने इस साल लंदन के वेस्टङ्क्षमस्टर में हुए हमले के लिए गलत व्यक्ति को षड्यंत्रकर्ता बता दिया था। बाद में चैनल ने उसके लिए माफी मांगी और अपनी गलती दुरुस्त करने की हरसंभव कोशिश की। हालांकि समाचार प्रस्तोता केट बल्कली कहती हैं कि एक त्रुटि और फर्जी खबर में फर्क है। अगर कोई नेता डींग हांक रहा है और एक समाचारपत्र संबंधित तथ्यों की पुष्टि के बगैर ही उन्हें पेश कर देता है तो यह खराब रिपोर्टिंग मानी जाएगी, न कि फर्जी खबर। अगर कोई स्तंंभकार विरोधाभासी तथ्यों के बावजूद एक खास रुझान वाला लेख लिखता है तो उसे पूर्वग्रह-आधारित खराब लेखन ही कहा जाएगा। 
 
फर्जी खबर पूरी तरह गलत तथ्यों पर आधारित लेखन है जिसका शीर्षक भी लोगों को भ्रम में डालने वाला होता है। हाल ही में लीवर की बीमारी से ग्रस्त 10-12 साल की एक लड़की की तस्वीर को रोहिंग्या शिविर में रहने वाली एक गर्भवती लड़की के तौर पर पेश किया गया था। यह फर्जी खबर का उदाहरण है। हालांकि बाद में तथ्यों की पुष्टि करने वाली वेबसाइट ने इसकी असलियत उजागर कर दी। 
 
मेरे लिए फर्जी खबर से जुड़ी तीसरी अंतर्दृष्टि इससे जुड़ी धनराशि को लेकर थी। चैनल 4 न्यूज और सीएनएन समेत कई प्रसारकों ने मैसेडोनिया के वेलेस से चलाए जा रहे फर्जी खबर उद्योग के बारे में कई रिपोर्ट प्रसारित की हैं। फर्जी खबरें देने वाली सौ से भी अधिक वेबसाइट वेलेस शहर में पंजीकृत हैं और उनका संचालन कम उम्र के लड़के ही कर रहे हैं। ये लड़के फर्जी खबरें बनाते हैं या फिर दूसरी वेबसाइट से उठाते हैं। अक्सर उनकी फर्जी खबरों का स्रोत अमेरिका में संचालित दक्षिणपंथी वेबसाइट होती हैं। इन फर्जी खबरों को भ्रमित करने वाले शीर्षकों के साथ पोस्ट किया जाता है। शीर्षक जितना अधिक करारा होगा, उसे उतने ही अधिक लोग पसंद करेंगे। इसका साफ मतलब है कि विज्ञापन राजस्व भी बढ़ेगा। इसी तरह की एक वेबसाइट चलाने वाले 22 वर्षीय मिखाइल ने सीएनएन से कहा था, 'मुझे नहीं मालूम कि सच क्या है और मुझे इसकी परवाह भी नहीं है।' 
 
मिखाइल की वेबसाइट पर लगाम लगने के पहले फेसबुक पर उसके 15 लाख फॉलोअर हो गए थे। अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उसने रोजाना 2000-2500 डॉलर तक की कमाई की जबकि वेलेस शहर की औसत मासिक आय 426 डॉलर ही है। यानी फर्जी खबरों को पेश करना कुछ उसी तरह से रोजगार का जरिया बन गया है जिस तरह गुंडागर्दी। वेलेस के किशोर अभी से 2020 में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी में लग गए हैं। उन्हें उस बार भी तगड़ी कमाई होने की आस है। फेसबुक ने भारत में फर्जी खबरों के बारे में जो विज्ञापन जारी किया है वह एक तरह से मीडिया साक्षरता अभियान ही हैै। लेकिन भारतीय मीडिया उद्योग फर्जी खबरों के प्रति जागरूकता फैलाने और फर्जी खबरें देने वाले संस्थानों को दंडित करने की स्व-नियामकीय निकाय बनाने में एकजुटता दिखाकर इस खतरे का सामना कर सकता है।
Keyword: media, TV, news, facebook,,
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