अमेरिकी विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो अपनी पत्नी के साथ ताजमहल प्रांगण में | फोटो: PTI
अमेरिकी विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो की 23 से 26 मई तक की भारत यात्रा में ताजमहल की यात्रा के अलावा दो खास बातें थीं। पहली बात द्विपक्षीय थी यानी भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बातचीत जबकि दूसरा अवसर था क्वाड समूह के विदेश मंत्रियों की बैठक में शिरकत करना। यह राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में तीसरी ऐसी बैठक थी। ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री पेनी वोन्ग और जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने भी क्वाड बैठक से इतर रूबियो के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। ये द्विपक्षीय बैठकें भी बहुपक्षीय बैठकों की तरह ही महत्त्वपूर्ण रहीं। इन बैठकों का क्वाड की बैठक से अलग भी विश्लेषण किया जाना चाहिए।
रूबियो की यात्रा का उद्देश्य साफ तौर पर भारत के साथ रिश्तों में सुधार करना था। बीते एक साल में दोनों देशों के रिश्तों में काफी गिरावट आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए दंडात्मक शुल्क लगाए जबकि उन्होंने चीन, तुर्किये और हंगरी जैसे ऐसा ही करने वाले अन्य देशों को रियायत दी। इसके अलावा वह अक्सर भारत के बारे में अशोभनीय भाषा बोलते हैं। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत अर्थव्यवस्था तक कहा।
उनकी प्रशासनिक टीम के कई अधिकारियों ने भारत के लिए और भी अधिक अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है और यह ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) समर्थक समूह के भीतर भी गूंजता रहा है। भारत को ट्रंप के आव्रजन विरोधी अभियान का भी खामियाजा भुगतना पड़ा है, जिसमें एच1-बी वीजा पर प्रतिबंध शामिल हैं जो वर्षों से पेशेवर भारतीयों के लिए करियर में आगे बढ़ने का माध्यम रहे हैं।
पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ अमेरिका की बढ़ती नजदीकी और ईरान के साथ चल रहे युद्ध में मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान को दी गई प्रमुखता ने भारत-पाकिस्तान को एक तराजू पर रखने की आशंका को फिर से जीवित कर दिया है और इस चिंता को जन्म दिया है कि पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका और चीन दोनों से समर्थन प्राप्त कर सकता है भले ही इन दोनों संरक्षकों के बीच तीव्र टकराव के दिन क्यों न हों।
और भी महत्त्वपूर्ण यह संभावना रही है कि अमेरिका और चीन के बीच कुछ हद तक रणनीतिक समायोजन हो सकता है, जिसे ट्रंप की हालिया चीन यात्रा ने और मजबूत किया है। दोनों पक्षों ने रचनात्मक रूप से रणनीतिक टिकाऊपन को आगे बढ़ाने और आर्थिक सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस सहित कई विवादास्पद मुद्दों पर संवाद में शामिल होने पर सहमति व्यक्त की।
व्यापार-संबंधी मुद्दों को संभालने के लिए एक व्यापार बोर्ड और निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक निवेश बोर्ड की स्थापना, स्पष्ट रूप से परिभाषित मानकों के भीतर, यह दर्शाती है कि चीन से दूरी बनाने के बजाय उससे जुड़े जोखिम कम करना अब अमेरिका की पसंदीदा रणनीति है।
आर्थिक सुरक्षा अब स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। इससे भारत जैसे देशों के लिए दांव-पेच की गुंजाइश कम हो जाती है। दुनिया की दो सबसे मजबूत शक्तियों के संबंधों में छोटे बदलाव भी अन्य साझेदारों के लिए बड़े बदलाव का कारण बनते हैं। यही समझ ट्रंप के प्रस्थान के कुछ ही दिनों बाद रूस के राष्ट्रपति की चीन यात्रा को स्पष्ट करती है। यह रूबियो की भारत यात्रा को भी समझाती है जो इसके बाद हुई। अमेरिका और चीन दोनों शक्तियों को अपने सहयोगियों और साझेदारों को यह आश्वस्त करना जरूरी है कि वे अब भी महत्त्वपूर्ण हैं भले ही अमेरिका-चीन संबंधों में बदलाव आया हो।
यात्रा के दौरान बने माहौल और रूबियो द्वारा अपने अनेक सार्वजनिक वक्तव्यों में व्यक्त किए गए गर्मजोशी भरे भावों को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सुधार का प्रयास काफी हद तक सफल रहा है और भारत-अमेरिका सहयोग का व्यापक एजेंडा जिसमें रक्षा, प्रौद्योगिकी और आतंकवाद-रोधी क्षेत्र शामिल हैं, निकट भविष्य में अप्रभावित रहेगा। यह भारत के लिए एक सकारात्मक पहलू है।
क्वाड की बैठक को भी इसी दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि चीन के साथ रणनीतिक स्थिरता की खोज अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति को नहीं बदलती। यदि चीन यह संकेत दे रहा है कि रूस के साथ उसकी असीम साझेदारी अपरिवर्तित है और यूक्रेन युद्ध में रूस को उसका मौन समर्थन जारी है तो अमेरिका के हित में है कि वह यह स्पष्ट करे कि चीन को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाई गई उसकी हिंद-प्रशांत रणनीति अब भी लागू है।
यदि वास्तव में कुछ नहीं बदला है, तो अब अपनाई जा रही रणनीतिक स्थिरता की वास्तविक विषय-वस्तु क्या है? इसलिए आश्वासन को स्वीकार करने में तो लाभ है लेकिन भू-राजनीतिक रणनीतिक वातावरण में बड़े बदलाव के प्रति सतर्क रहना भी आवश्यक है। यदि यह बदलाव आगे बढ़ता है तो यह दिए जा रहे आश्वासनों के साथ संगत नहीं होगा।
यह देखना जरूरी होगा कि इस वर्ष ट्रंप और शी चिनफिंग द्वारा आयोजित किए जाने वाले तीन शिखर सम्मेलनों में क्या होता है। इनमें से एक द्विपक्षीय बैठक संभवतः सितंबर में होगी, और अन्य दो आगामी जी-20 तथा एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग बैठकों के दौरान होंगी। ये बैठकें इस बात का स्पष्ट संकेत देंगी कि दोनों पक्ष जिस रणनीतिक स्थिरता को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं उसकी वास्तविक विषय-वस्तु क्या है।
दिल्ली में क्वाड की बैठक महत्त्वपूर्ण है। इसका आयोजन यह दर्शाता है कि अमेरिका चीन को संभालने के संदर्भ में क्वाड का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। क्वाड अमेरिका के लिए एक और सौदेबाजी का साधन बना हुआ है। वैसे ही जैसे चीन के लिए चीन-रूस साझेदारी है। रूबियो ने क्वाड को अपनी हिंद-प्रशांत रणनीति का मुख्य आधार बताया लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रणनीति अब भी मान्य है खासकर ट्रंप-शी चिनफिंग शिखर सम्मेलन में बनी व्यापक सहमति को देखते हुए।
यदि अमेरिका अब क्वाड को केवल एक सौदेबाजी के साधन के रूप में देखता है न कि हिंद-प्रशांत में स्थायी रणनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में, तो इसका बलिदान किया जा सकता है या अधिक संभावना है कि इसे धीरे-धीरे निष्क्रिय होने दिया जाए। ऐसा क्वाड के पहले संस्करण में 2007 में हुआ था जब अमेरिका ने इसे अलग रखने का निर्णय लिया ताकि चीन और रूस की चिंताओं को दूर किया जा सके जिनका समर्थन उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु मुद्दों से निपटने के लिए चाहिए था।
अब भी इसी संभावना के प्रति सतर्क रहना चाहिए भले ही भारत के हित में बैठक में घोषित कई व्यावहारिक सहयोग पहलों को आगे बढ़ाया जाए। इन पहलों का मूल्य क्वाड से परे है और इन्हें भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया द्वारा जारी रखा जा सकता है भले ही अमेरिका इसकी महत्ता को कम कर दे।
अंततः क्वाड का भविष्य अमेरिका की ताइवान की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता से जुड़ा है। यदि अमेरिका ताइवान पर अपनी भाषा बदलता है, जैसे कि वह एक चीन नीति को स्वीकार करता है और ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करता है या एक निश्चित समयसीमा में ताइवान को हथियारों की आपूर्ति कम या बंद कर देता है तो अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति का कोई आधार नहीं बचेगा। यह अमेरिका के सहयोगियों विशेषकर जापान, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण होगा और भारत के लिए कम। लेकिन इससे क्वाड एक सुरक्षा साझेदारी के रूप में अप्रासंगिक हो जाएगा।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)