प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
पश्चिम बंगाल की नई सरकार अपनी किस्मत बदलने के लिए एक बड़ी परियोजना हाथ आने की उम्मीद कर रही है। निवेश के लिए माकूल स्थान नहीं होने की राज्य की छवि सुधारने के लिए नई सरकार की यह उम्मीद बिल्कुल समझ में आ सकती है। मगर इस बड़े दृष्टिकोण में कई ऐसी बातें हैं जो केंद्र सरकार के साथ राजनीतिक रूप से सामंजस्य रखने वाले राज्य के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। ममता बनर्जी द्वारा सिंगूर से टाटा नैनो परियोजना बेदखल करने और नंदीग्राम में पेट्रो-रसायन परिसर निर्माण ठप होने से पूर्व भी ऐसी परियोजनाओं के साथ राज्य का इतिहास और पिछले 50 वर्षों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने का अनुभव सुखद नहीं रहा है।
कई समस्याएं वाम मोर्चा के पारंपरिक राजनीतिक वोट बैंक और विचारधारा के साथ-साथ कॉरपोरेट मसले संभालने में उनके अनुभव की कमी से उत्पन्न हुईं। मौजूदा सरकार (जो जाहिर तौर पर कारोबार संग दोस्ताना व्यवहार करने वाली राजनीतिक पार्टी से संबंध रखती जुड़ी है) संभावित निवेशकों का स्वागत करने और नियामकीय बाधाएं दूर करने में बेहतर काम कर सकती है। हालांकि, इसके लिए राज्य के नेताओं को गहन प्रशिक्षण की जरूरत हो सकती है क्योंकि सरकार में कई दिग्गज तृणमूल कांग्रेस के वे नेता भी हैं जो निवेश-विरोधी एजेंडे पर सत्ता में आए थे। नंदीग्राम से चुने गए मौजूदा मुख्यमंत्री इसका एक बड़ा उदाहरण हैं।
बड़ी परियोजनाओं की राह में पेश आने वाली चुनौतियों को हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स से बेहतर कोई और उदाहरण नहीं समझा सकता। वर्ष 1985 में 3,600 करोड़ रुपये के संयुक्त उद्यम के तौर पर घोषित इस परियोजना को वाम मोर्चा के निवेश समर्थक एक नायाब नमूने के तौर पर पेश किया गया था। कोलकाता के उद्योगपति आर पी गोयनका (जो वाम मोर्चा के नेताओं के करीबी माने जाते थे) को साझेदार के तौर पर चुना गया था।
उस उत्साह भरे पल के बाद कुछ खास नहीं हुआ। फिर ऐसी अफवाह उड़ीं कि शायद गोयनका समूह (जो उस समय कई कंपनियों को खरीदने की कोशिश कर रहा था) के पास इतनी बड़ी परियोजना के लिए जरूरी रकम नहीं थी। वर्ष1993 तक टाटा समूह पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम (डब्ल्यूबीआईडीसी) का साझेदार बन गया था। एक वर्ष बाद न्यूयॉर्क के एक कम चर्चित उद्योगपति और जॉर्ज सोरोस के सहयोगी पूर्णेंदु चटर्जी इसमें शामिल हुए। कहा जाता है कि ऐसा तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के कहने पर हुआ था। इस परियोजना पर काम शुरू होने में तीन वर्ष और व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में चार वर्ष और लगे यानी यह परियोजना की घोषणा के 16 वर्ष बाद हुआ।
इसके कुछ ही समय बाद टाटा समूह ने तय किया कि पेट्रो-रसायन उनके लिए रणनीतिक रूप से जरूरी नहीं है और वह इससे बाहर निकल गया। समूह ने अपने शेयर डब्ल्यूबीआईडीसी को बेच दिए। इसके बाद पूर्णेंदु चटर्जी के टीसीजी समूह और डब्ल्यूबीआईडीसी के बीच नियंत्रण के लिए 10 वर्ष तक बहुत मुश्किल लड़ाई चली। इस लड़ाई में शेयर स्थानांतरण की कीमत को लेकर विवाद, एक दूसरे पर गड़बड़ी के आरोप और राज्य सरकार की तरफ से इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को अपनी हिस्सेदारी बेचने के प्रयास शामिल थे। यह मामला पहले कंपनी विधि बोर्ड में चला। वर्ष 2013 में नुकसान बढ़ने पर ‘औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड’ के पास मामला जाने की नौबत आ गई थी मगर आखिरकार ऐसा नहीं हुआ।
फिर अचानक वर्ष 2015 तक टीसीजी समूह को पूरी हिस्सेदारी और प्रबंधन नियंत्रण मिल गया। कहा जाता है कि यह न्यूयॉर्क में चटर्जी और ममता बनर्जी के बीच हुई बैठक का नतीजा था जिससे खराब नियोजन और भरोसे की कमी का 30 वर्ष लंबा सिलसिला खत्म हुआ। मगर इस बड़ी परियोजना से पश्चिम बंगाल में कोई खास बदलाव नहीं आया है। हालांकि, इसमें कोई शक नहीं कि इससे प्लास्टिक और पॉलिमर संयंत्रों का एक तंत्र जरूर बना है मगर इस कारोबार में गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु और तेलंगाना आगे हैं।
वाम मोर्चा की विदेशी निवेश के साथ शुरुआती प्रयास नाकाम रहे। मामला एक फुटबॉल क्लब के मालिक द्वारा घाटे में चल रही जूट मिलें खरीदने का था। ये मिलें आंशिक रूप से एक स्थानीय समूह की थीं मगर स्कॉटलैंड में पंजीकृत थीं (जो ब्रिटिश राज विरासत की एक निशानी थी)। इसे लेकर कुछ हैरानी भी हुई। उस समय जूट उद्योग को खत्म होता हुआ उद्योग माना जाता था तो फिर इस उद्यमी आर जी ब्रियली को इसकी क्या जरूरत थी?
शक के बावजूद ब्रियली (जो उस समय ब्रिटिश क्लब शेफील्ड यूनाइटेड के मालिक थे) को मसीहा माना गया। मगर उनका यह कदम भारी नुकसान, बकाया भुगतान न होने, मजदूरों की आत्महत्या और उनके खिलाफ आपराधिक मामलों में बदल गया। पता चला कि ब्रियली के पास इन मिलों को उबारने की कोई योजना नहीं थी। वह इन मिलों का इस्तेमाल स्कॉटलैंड के एक दूर-दराज इलाके में बने ‘बैक टू बेसिक्स’ एडवेंचर ट्रेनिंग स्कूल के हिस्से के तौर पर करना चाहते थे जो ब्रिटेन के शहरों के पिछड़े इलाकों के युवाओं के लिए था। उन्हें प्रशिक्षण देकर फिर उन जूट मिलों में काम करने के लिए भेजा जाता था। हैरानी की बात है कि राज्य सरकार ने उस निवेशक का ठीक से पता लगाए बिना ही उसका स्वागत किया जिसने आखिरकार उन्हीं लोगों यानी मजदूरों को नुकसान पहुंचाया जिनकी वाम मोर्चा हिमायती होने का दावा करती है।
विडंबना यह है कि मजदूर संघों (जिनमें वाम मोर्चा के नियंत्रण वाली यूनियन शामिल थीं) ने निजीकरण के शुरुआती प्रयासों को रोक दिया। मामला मशहूर ग्रेट ईस्टर्न होटल को एकोर पैसिफिक समूह को बेचने का था। यह सौदा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि मजदूर संघों को छंटनी और कम वेतन का डर था। वर्ष 2001 में यह कोशिश फिर नाकाम रही। इस बार ललित सूरी के भारत होटल्स के साथ और वजह वही थी। चार वर्ष बाद उसी समूह ने ग्रेट ईस्टर्न को बहुत कम कीमत यानी करीब 52 करोड़ रुपये में खरीद लिया मगर ऐसा तब हुआ जब राज्य सरकार ने अच्छी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) की गारंटी दी।
सिंगूर और नंदीग्राम की बात करें तो वे वाम मोर्चा की जमीन के बंटवारे वाली नीति के शिकार बने। इसी नीति ने वाम मोर्चा को तीन दशकों से ज़्यादा समय तक सत्ता में बनाए रखा था। इस नीति के तहत जमीन के बड़े हिस्से छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए जिससे बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन हासिल करना मुश्किल हो गया। इससे सरकार के सामने ‘मुर्गी-अंडे’ वाली उलझन जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो गई क्योंकि घनी आबादी वाले मगर आर्थिक रूप से पिछड़े इस राज्य में जमीन गंवाने वाले लोगों के पास आजीविका का कोई दूसरा जरिया नहीं था। अभी यह साफ नहीं है कि नई दक्षिणपंथी सरकार इस मुद्दे से कैसे निपटेगी ताकि वैसे जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन न हों। असल में पश्चिम बंगाल, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की कारोबार समर्थक नीतियों के लिए एक असल परीक्षा साबित हो सकता है।