प्रतीकात्मक तस्वीर
नई पहल या नए सुधार कार्यक्रमों में बचत एक ऐसा पहलू है जिस पर खास ध्यान देने की आवश्यकता है। लंबे समय से नीति निर्माताओं और बाजार, दोनों ने गरीब तबके को कर्ज के बोझ से दबे एक ऐसे समूह के तौर पर देखा है जिन्हें साहूकारों के चंगुल से बाहर निकालने की जरूरत है। नीतिगत चर्चा संस्थागत ऋण यानी प्राथमिकता-क्षेत्र लक्ष्य, पुनर्वित्त और सहकारी समितियों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों जैसी विशेष संस्थाओं आदि पर केंद्रित रही हैं।
आपूर्ति पक्ष के मोर्चे पर प्रयासों के बावजूद गरीब महिलाओं के लिए 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध में ही सूक्ष्म ऋण के जरिये ऋण की उपलब्धता संभव हो पाई। हम इस बात का जिक्र कर चुके हैं कि लघु एवं मझोले उद्यमों में अभी काफी कुछ करने की गुंजाइश बची है मगर इस पर किसी और दिन चर्चा कर लेंगे।
पिछले दो दशकों के दौरान हमने धन प्रेषण (रेमिटेंस) में दिलचस्प प्रगति देखी है जिनसे समावेश वाले ग्राहकों को लाभ हुआ है। यह नीतिगत प्राथमिकता के बजाय प्रौद्योगिकी के कारण संभव हो पाया है। कोर बैंकिंग समाधानों (सीबीएस) का विस्तार, बैंकों के बीच काम करने वाले स्वचालित टेलर मशीन, इंटरनेट और मोबाइल सेवा का प्रसार, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) की स्थापना आदि की मदद से भुगतान और प्रेषण के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ। गरीब लोगों को इस संरचना का परोक्ष रूप से लाभ मिला। उपयोगकर्ता शुल्क न लेने की नीति से लेन-देने के माध्यम के रूप में यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) की लोकप्रियता बढ़ती गई। हालांकि, यह अभी भी सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों और महिलाओं के बीच पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है मगर धन प्रेषण आसान, सरल और निर्बाध बनाने में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
बचत के मामले में हमारे पास ऐसी कोई ऐसी उपलब्धि नहीं दिखाई दे रही है। यह सोच बेबुनियाद है कि गरीब बचत नहीं कर सकते। हमें यह समझना चाहिए कि गरीब उधार लेते हैं और ब्याज सहित किश्तें चुकाते हैं। अगर हम बचत और ऋण को नकदी प्रवाह की निरंतरता के रूप में देखें तो ऋण और बचत के बीच का अंतर न के बराबर है। स्टुअर्ट रदरफोर्ड ने अपनी प्रतिष्ठित पुस्तक ‘द पुअर ऐंड देयर मनी’ में इसे ‘सेविंग अप (किसी खरीदारी के लिए रकम जोड़ना) और सेविंग डाउन (बचाई रकम खर्च करना या इससे कर्ज चुकाना आदि) कहा है। इस मिथक के अलावा कुछ दूसरी पाबंदियां भी हैं। बचत योजनाओं में चूक या कदाचार का जोखिम कमज़ोर ग्राहक को उठाना पड़ता है, इसलिए नियामक बचत उत्पादों के साथ प्रयोगों में किसी भी प्रकार की ढील देने को लेकर सतर्क रहता है।
बार-बार होने वाले छोटे-छोटे लेनदेन की अधिक लागत का बोझ कम ब्याज दर के जरिये गरीब ग्राहकों पर नहीं डाला जा सकता। ऋण देने वाले व्यक्ति या कोई संस्था ऋण चुकाने का निर्धारित कार्यक्रम तय कर नकद प्रवाह नियंत्रित करते हैं। बचत की कोई ऐसी योजना बनाना, जिसमें बदलाव की गुंजाइश हो और जिसमें गरीबों के हाथों आने वाली रकम में उतार-चढ़ाव का भी ध्यान रखा जाए, एक मुश्किल काम है। बैंकरों को ऐसी योजनाएं पसंद नहीं आतीं क्योंकि वे उनके नकदी प्रबंधन प्रणाली में फिट नहीं बैठतीं। लिहाजा पुरानी संस्थाएं बचत के मामले में कोई नया प्रयोग नहीं करतीं।
बचत का लालच देकर गरीबों के साथ बार-बार होने वाली धोखाधड़ी से दो बातें पता चलती हैं। पहली बात, गरीबों में बचत करने की इच्छा है और दूसरी बात यह कि सोच और नए विचारों की कोई कमी नहीं है। मगर यह सब चुपचाप होता है। पोंजी योजना, चिट फंड और सहारा जैसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के उदाहरण से साफ है कि गरीब लोगों में बचत करने का माद्दा है। इस क्षेत्र में किए गए दूसरे नए प्रयोग अक्सर नियमों के दायरे से बचकर किए जाते हैं। एक समय ओडिशा और तमिलनाडु में ‘क्षेत्रीय ग्रामीण वित्तीय सेवाओं’ ने गरीबों के लिए मनी-मार्केट म्युचुअल फंड पेश किए थे। इसके पीछे सोच यह थी कि ये फंड लिक्विड (आसानी से नकद में बदले जा सकने वाले) और लचीले थे और इनसे अच्छा रिटर्न मिलता था। ये एक तरह से बचत खाते की तरह काम करते थे। हालांकि, ये काफी हद तक सुरक्षित थे मगर इनमें बाजार से जुड़ा जोखिम था और कोई बीमा सुरक्षा भी नहीं थी इसलिए आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के बीच इसकी पेशकश नहीं की जानी चाहिए थी।
लघु भुगतान के लिए तकनीक तो आ गई है मगर विनियमित क्षेत्र में बचत के लिए नए विचार का इंतजार है। मगर यह मुश्किल काम कौन करेगा?
आइए, यूपीआई को फिर टटोलते हैं। भुगतान के क्षेत्र में सभी नवाचार बैंकिंग तंत्र से बाहर हुए। पेटीएम, फोनपे, भारतपे और भीम जैसी पहल ने सूरत पूरी तरह बदल दी। बैंकिंग प्रणाली ने इंटरफेस दिया और इन भुगतान माध्यमों को अपने साथ जोड़ा। डिजिटल उधारी में भी सभी नवाचार बैंकिंग तंत्र के बाहर हो रहे हैं, जिनमें वित्त-तकनीक खंड की कंपनियां आगे हैं। बैंक सह-उधारी (को-लेंडिंग) या एनबीएफसी को ऋण देकर मदद कर रहे हैं जो सीधे तौर पर ऋण देती हैं।
बचत का मामला अलग है। नियामकीय पाबंदियों की वजह से यह सुविधा केवल बैंकों को ही मिलती है। बैंक अधिकारियों से उम्मीद की जाती है कि वे स्थिरता बनाए रखें। लिहाजा, नियामक का बैंकरों से नवाचार करने के प्रति उत्साहित होने की उम्मीद करना बहुत बड़ी बात होगी।
गरीब न केवल नकदी और अनौपचारिक जमा के रूप में बचत करते हैं बल्कि अलग-अलग परिसंपत्ति श्रेणियों में भी रकम लगाते हैं। बकरी पालन, घर के पिछवाड़े में मुर्गी पालन, सोना, चांदी और बर्तन (जिन्हें गिरवी रखा जा सके) इनके उदाहरण हैं। वित्तीय प्रणाली के लिए ऐसे वित्तीय योजनाएं पेश कर नकदी, रिटर्न, लचीलापन और सुरक्षा देना मुमकिन है जो गरीबों की ज़रूरतों को पूरा करती हों।
पहले यह तर्क दिया जा सकता था कि ऐसी योजनाएं बनाना और उन्हें शुरू करना महंगा होता है। अब ऐसा नहीं है। हर परिवार के पास प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) खाते होने और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से रकम आने के साथ बैंक ऐसी नई योजनाएं बना सकते हैं जो तकनीक और ऐसे खाते शुरू करने में किए गए निवेश उचित ठहराते हों। पीएमजेडीवाई खाते मुख्य खाते की तरह काम कर सकते हैं जिन्हें आधार बनाकर कई तरह की बचत योजनाएं बनाई जा सकती हैं।
क्या महिलाएं इनमें शिरकत करेंगी? यह एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि एक स्मार्टफोन आम तौर पर परिवार के कई सदस्य इस्तेमाल करते हैं और महिलाओं को अपने वित्त के प्रबंधन के लिए स्वतंत्रता और गोपनीयता की जरूरत होती है। महिलाओं के लिए उनकी पसंद का स्मार्टफोन खरीदने के लिए बचत करने वाला उत्पाद पहला लक्ष्य हो सकता है।
क्या बैंकों से नवाचार की उम्मीद करना उचित है? नहीं, जब तक नियामक कुछ डिजिटल-ओनली बैंकों को लाइसेंस देने के लिए लीक से हटकर न सोचे। पुराने बैंकों पर पहले ही बहुत काम का बोझ है और उनका तकनीक पर ध्यान शायद ग्राहक सेवा के लिए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) वाले कॉल सेंटर और साइबर सुरक्षा में निवेश करने पर हो सकता है।
लीक से हटकर सोचने के लिए एनपीसीआई और रिजर्व बैंक (आरबीआई) इनोवेशन हब इसमें कारगर भूमिका निभा सकते हैं। इन दोनों की ही बात नियामक सुनता है और बैंकिंग तंत्र पर उनका अच्छा-खासा असर है। क्या वे व्हाइट-लेबल बचत उत्पाद पर काम करने को तैयार हैं? जैसा भीम के मामले में हुआ था क्या उसी तरह एनपीसीआई बैंकों के साथ एक इंटरफेस या बैकग्राउंड इंजन के तौर पर काम करेगा? व्हाइट लेबल उत्पाद वह उत्पाद होता है जिसे कोई बड़ा उत्पादक खुदरा विक्रेता को बेचने के लिए बनाता है और फिर खुदरा विक्रेता उस पर अपना लोगो और ब्रांड लगाकर उसे अपने उत्पाद के रूप में बेचता है।
इस क्षेत्र में तकनीक आधारित नवाचार की सख्त जरूरत है। अगर बैंक उधार देने के साथ-साथ उधार लेने वालों की संपत्ति को भी अपने रिकॉर्ड में शामिल कर सकें तो ग्राहकों से मिलने वाली बचत से लोन के बोझ से जुड़ा तनाव कम हो जाएगा। मगर सवाल यह है कि कोई इस ओर ध्यान दे भी रहा है?
(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलूरु में प्राध्यापक हैं। इस विषय पर सलाह देने के लिए वह मिशा शर्मा, प्रिया गणेशन और दिलीप अस्बे के आभारी हैं)