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जल जीवन मिशन 2.0 की सफलता अब आंकड़ों से नहीं, हर घर तक सही तरीके से पानी पहुंचाने से तय होगी

जल जीवन मिशन ने करोड़ों घरों तक नल पहुंचाए, लेकिन अब असली चुनौती हर घर को नियमित, सुरक्षित और पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने की है

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विनायक चटर्जी   
Last Updated- July 21, 2026 | 9:35 PM IST

लाल किले के प्राचीर से 15 अगस्त, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सबसे महत्त्वाकांक्षी और दुनिया के सबसे बड़े ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम जल जीवन मिशन (जेजेएम) की घोषणा की। इसका लक्ष्य 2024 तक सभी 19.35 करोड़ ग्रामीण घरों को नल कनेक्शन उपलब्ध कराना था। इसके लिए कुल 3.60 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी 2.08 लाख करोड़ रुपये थी। जेजेएम ने अपने पूर्ववर्तियों से एकदम अलग राह अपनाई। इसने मापदंड को बस्तियों से बदलकर व्यक्तिगत घरों तक सीमित किया, पानी की समितियों के माध्यम से सामुदायिक स्वामित्व को अनिवार्य बनाया और अपने ढांचे में स्रोत की स्थिरता को शामिल किया। स्वतंत्रता के सात दशकों बाद ग्रामीण नल जल की सार्वभौमिक उपलब्धता के लिए भारत की पहली स्पष्ट प्रतिबद्धता की घोषणा वास्तव में ऐतिहासिक थी।

मार्च 2026 में सरकार ने जेजेएम को जेजेएम 2.0 के रूप में पुनगर्ठित किया और इसकी समयसीमा को दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया। इसके साथ ही उसने कुल आवंटन बढ़ाकर 8.69 लाख करोड़ रुपये कर दिया। मिशन के उद्देश्य को भी अधोसंरचना संबंध जुड़ाव के बजाय उपयोगिता आधारित सेवा आपूर्ति मॉडल में बदल दिया गया।

अब तक का डिलिवरी रिकॉर्ड उल्लेखनीय है। जब यह योजना शुरू हुई थी तब भारत के 19.35 करोड़ ग्रामीण घरों में से केवल 16.7 फीसदी के पास नल कनेक्शन था। मार्च 2026 तक कवरेज बढ़कर 81.6 फीसदी हो गया यानी सात साल से कम समय में 12.55 करोड़ नए कनेक्शन जोड़े गए। इसके परिणामस्वरूप प्रतिदिन पानी लाने में लगने वाले 5.5 करोड़ घंटे की बचत हुई (विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार) और 2.77 लाख गांवों को हर घर जल के रूप में प्रमाणित किया गया।

लेकिन यही आंकड़े कार्यान्वयन संबंधी कुछ गंभीर खामियों को भी उजागर करते हैं। 2024 में एक मूल्यांकन किया गया जिसमें 761 जिलों के 19,812 प्रमाणित हर घर जल गांव शामिल थे। उसमें पाया कि 98 फीसदी घरों में नल कनेक्शन था लेकिन केवल चार में से तीन घरों को ही मिशन के मानकों यानी मात्रा, गुणवत्ता और नियमितता के अनुरूप पानी मिला। इस अंतर के पीछे सात संरचनात्मक खामियां हैं।

गलत परिणाम सूचकांक: मिशन ने सफलता का पैमाना इसे बनाया कि कितने नल लगाए गए न कि इस बात को कि कितना पानी वास्तव में लोगों तक पहुंचा। वर्ष 2024 के सर्वेक्षण में पाया गया कि केवल 80 फीसदी परिवारों को ही न्यूनतम निर्धारित मात्रा में पानी मिल रहा था जबकि मात्र 76 फीसदी परिवारों को सुरक्षित (पीने योग्य) पानी उपलब्ध हो रहा था।

गुजरात और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने भले ही 100 फीसदी कवरेज का दावा किया हो, लेकिन वहां वास्तविक रूप से काम कर रहे जल कनेक्शन की दर 50 फीसदी से भी कम पाई गई। हरियाणा के मेवात में तो केवल 33 फीसदी परिवारों को ही पेय योग्य पानी उपलब्ध था।
जेजेएम 2.0 इस कमी को दूर करने के लिए प्रत्येक प्रशासनिक स्तर पर जल आपूर्ति की नियमितता, मात्रा और गुणवत्ता के स्पष्ट सेवा मानक लागू करता है।

‘गैर मौजूद नल’ की समस्या: जल जीवन मिशन का डैशबोर्ड कई जगह बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े प्रस्तुत करने का माध्यम बन गया। इसका सबसे चर्चित उदाहरण मणिपुर है, जहां ऐसे जल कनेक्शन दर्ज किए गए जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे। मार्च 2026 में लोक सभा में दिए गए एक उत्तर के अनुसार, पूरे देश में 18,790 शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से 86 फीसदी केवल उत्तर प्रदेश से थीं।

राजस्थान में 960 करोड़ रुपये के रिश्वत और जालसाजी के एक घोटाले में अधिकारियों ने फर्जी कार्य-पूर्णता प्रमाणपत्र जमा किए। इस मामले में लगभग 2,400 अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई और कई ठेकेदारों को काली सूची में डाल दिया गया। जेजेएम 2.0 के तहत ‘सुजलम’ नामक भौगोलिक सूचना प्रणाली से जुड़ी राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाई जा रही है। इसमें प्रत्येक गांव को एक विशिष्ट पहचान संख्या दी जाएगी, ताकि किसी भी योजना का सत्यापन किए बिना धनराशि जारी न की जा सके।

संचालन एवं रखरखाव की चुनौती: जेजेएम 1.0 में यह परिकल्पना की गई थी कि पानी समितियां स्थानीय स्तर पर सामुदायिक जल उपयोगिता संस्थाओं के रूप में विकसित होंगी। वे जलापूर्ति के तकनीकी और वित्तीय/व्यावसायिक दोनों पहलुओं का प्रबंधन करेंगी और इसमें समुदाय का 5 फीसदी वित्तीय योगदान भी होगा। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हो पाया। वर्ष 2022-23 तक केवल 12 राज्यों ने संचालन एवं रखरखाव संबंधी नीतियां अधिसूचित की थीं। यह संख्या 2026 की शुरुआत तक बढ़कर 23 राज्य हुई।

जेजेएम 2.0 में संचालन एवं रखरखाव को अनिवार्य शर्त बना दिया गया है। अब कोई भी ग्राम पंचायत तभी ‘हर घर जल’ का प्रमाणन कर सकेगी जब राज्य सरकार यह सुनिश्चित कर दे कि संचालन एवं रखरखाव की व्यवस्था तथा उपयोगकर्ता शुल्क की प्रणाली प्रभावी रूप से लागू है।

स्रोत की कमी: संसदीय जल संसाधन समिति ने मार्च 2026 में चेतावनी दी कि 8.69 लाख करोड़ रुपये उन नलों पर व्यर्थ खर्च हो गए जो एक से दो वर्षों के भीतर सूख गए। नासा के ग्रेस उपग्रह के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि भूजल हर साल लगभग एक-तिहाई मीटर की दर से घट रहा है। नीति आयोग के अपने जल सूचकांक से पता चलता है कि भारत के आधे से अधिक कुएं गिरावट में हैं। जेजेएम 2.0 की निर्णय समर्थन प्रणाली, सुजलाम भारत के तहत स्रोत स्थिरता योजना को अनिवार्य बनाती है जिससे 30-वर्षीय स्रोत गारंटी फिर से लागू होती है जिसे जेजेएम 1.0 ने दरकिनार कर दिया था।

क्रय विफलताएं: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के 2024 के कर्नाटक अंकेक्षण में 9,342 एकल बोली वाले अनुबंध पाए गए, अनुमान से 5 से 61 फीसदी अधिक टेंडर प्रीमियम और गुणवत्ता लागू करने के लिए कोई त्रिपक्षीय समझौते नहीं थे। जेजेएम 2.0 ने धनराशि वितरण को सुधार-आधारित समझौता ज्ञापनों पर निर्भर बनाया। मार्च 2022 के 15-दिवसीय राष्ट्रीय जल अभियान जल महोत्सव 2026 के अंत तक नौ राज्यों ने ऐसे समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए थे। पहली किश्त 1,561 करोड़ रुपये की थी जो पांच राज्यों को (अप्रैल 2026 में ) केवल अनुपालन सत्यापित करने के बाद जारी की गई।

लंबित बिल: लेवल 1 (थोक प्रसार), लेवल 2 (गांव वितरण), और लेवल 3 (अंतिम पाइपलाइन) बिछाने वाले ठेकेदारों ने भुगतान में 6 से 20 महीने तक की देरी की बात कही है। आंध्र प्रदेश में 750 छोटे और मझोले ठेकेदारों के लगभग 4,500 करोड़ रुपये के बिल दो साल से लंबित थे। असम में भी 4,500 करोड़ रुपये के स्वीकृत बिलों का भुगतान नहीं हुआ। उत्तराखंड में 15,500 योजनाएं कथित तौर पर ठेकेदारों की व्यक्तिगत बचत पर चल रही थीं। केंद्र ने वित्त वर्ष 25 (संशोधित अनुमान) में आवंटन को दो-तिहाई से अधिक घटा दिया जिसके परिणामस्वरूप राज्यों ने फंडिंग की कमी का बोझ ठेकेदारों पर डाल दिया।

बजट राशि, उपलब्ध राशि: वित्त वर्ष 25 संशोधित अनुमान में दो-तिहाई की इस कटौती (70,163 करोड़ रुपये से घटाकर 22,694 करोड़ रुपये) और 2026 की शुरुआत में वितरण निलंबन, राज्यों की अनुपालन-निष्क्रियता का हवाला देते हुए, गंभीर परिणाम लेकर आया। जेजेएम 2.0 ने स्वचालित फंड रिलीज को शर्तों से बदल दिया। यानी फंड केवल भौगोलिक सत्यापन और समझौता ज्ञापन अनुपालन के बाद ही प्रवाहित होते हैं। बजट 2025-26 ने महत्त्वाकांक्षा को फिर से बहाल किया। 67,000 करोड़ रुपये की यह राशि पिछले साल के संशोधित प्रावधान से लगभग तीन गुना है।

अब प्रश्न निदान या संरचना का नहीं बल्कि कार्यान्वयन का है। जेजेएम उन केंद्रीय कार्यक्रमों की लंबी सूची में शामिल हो गया है जिनकी मंशा अच्छी थी लेकिन रायसीना हिल से राज्य की राजधानियों, फिर जिला कार्यालयों और ग्राम पंचायतों तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर हो गए।
इरादा सराहनीय है, लेकिन भारत की ऐतिहासिक घरेलू जल कथा ईमानदार और उद्देश्यपूर्ण कार्यान्वयन से ही लिखी जाएगी।

(लेखक अधोसंरचना के विशेषज्ञ हैं। वह द इन्फ्राविजन के संस्थापक और प्रबंध न्यासी भी हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : July 21, 2026 | 9:35 PM IST