प्रतीकात्मक तस्वीर
कुछ वर्ष पहले यूरोपीय संघ (ईयू) ने बाहर से आयात होने वाले भोजन एवं खाद्य उत्पादों में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से संबंधित निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों का सीधा मतलब था कि ईयू समूह में शामिल देशों में मछली, दुग्ध और शहद जैसे पशु उत्पादों के आयात की इजाजत नहीं होगी। ईयू का कहना था कि यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि इन चीजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए इनमें एंटीबायोटिक का इस्तेमाल किया गया गया था। ईयू ने उन एंटीबायोटिक की एक सूची भी जारी की जिन्हें इंसानों के लिए बहुत जरूरी माना जाता है और कहा कि इन्हें जानवरों के इलाज में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
जब वर्ष 2023 में यह निर्देश जारी हुए थे तो भारत का नाम उन देशों की सूची में शामिल नहीं था जिन्हें सितंबर 2026 से ईयू को जलीय कृषि उत्पाद (एक्वाकल्चर) और पोल्ट्री (मुर्गी पालन) उत्पाद निर्यात करने की इजाजत थी। सितंबर 2026 ये निर्देश लागू होने वाले थे। ईयू के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि भारत के खाद्य-उत्पादन क्षेत्रों में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के बारे में जानकारी और नियमों की कमी थी।
भारत सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया दी। अक्टूबर 2024 में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने उन एंटीबायोटिक की एक सूची जारी की जिन पर मांस, दूध, पोल्ट्री, अंडे और जलीय कृषि उत्पादों के उत्पादन के किसी भी चरण में इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी। इसने उन एंटीबायोटिक के लिए सहनशीलता सीमा या टॉलरेंस लिमिट (जिसे अधिकतम अवशेष सीमा भी कहा जाता है) भी तय की। इसके तहत उत्पादकों को यह पक्का करना था कि भोजन में इनकी मात्रा तय सीमा से ज्यादा अधिक न हों।
मई 2025 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक मसौदा अधिसूचना जारी की जिसमें उन 37 एंटीबायोटिक में 34 के पशुओं पर इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात कही गई जिन्हें ईयू बहुत जरूरी मानता है। उसी साल सितंबर में इसकी सूचना दी गई और कहा गया कि पशुओं की बीमारियों के इलाज के लिए सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं। मई 2026 में ईयू ने अपनी अपवाद सूची में बदलाव किया और भारत को उन देशों की सूची में शामिल कर लिया जिन्हें सितंबर 2026 के बाद इस समूह को पशु-उत्पाद निर्यात करने की अनुमति हासिल थी।
मैं यहां कुछ खास विषयों पर चर्चा करना चाहती हूं। सबसे पहले, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी इतनी महत्त्वपूर्ण नीतियां बाहरी उपभोक्ताओं के दबाव में क्यों बनाई जाती हैं? एंटीबायोटिक प्रतिरोध एक खामोश महामारी है और हम जानते हैं कि भारत सरकार इस मुद्दे को लेकर बहुत गंभीर है। एक देश के तौर पर हम जीवन रक्षक दवाओं के बेअसर होने से पड़ने वाले स्वास्थ्य बोझ को नहीं झेल सकते इसलिए सरकार दुग्ध एवं मांस सहित अन्य उत्पाद देने वाले मवेशी में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल रोकने के लिए कदम उठा रही है।
वर्ष 2010 में सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के एक विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर सरकार ने शहद में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के खिलाफ एक सलाह जारी की की थी। इस सलाह के बाद संबंधित एंटीबायोजिटक पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वर्ष 2019 में सरकार ने खाद्य-उत्पादक जानवरों और जलीय कृषि उत्पादों में कोलिस्टिन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया। इसकी वजह यह थी कि कोलिस्टिन इंसानों के लिए सबसे महत्तवपूर्ण एंटीबायोटिक है और इसका अत्यधिक इस्तेमाल रोकने एवं इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है।
इसके बाद नीति-निर्माता पशु आहार में एंटीबायोटिक पर प्रतिबंध लगाने और अन्य कदमों पर विचार कर रहे थे मगर उन्होंने कोई व्यापक ढांचा नहीं अपनाया। आखिरकार, हमारे निर्यात बाजारों की सुरक्षा की जरूरत ध्यान में रखते हुए ऐसा किया गया। अच्छी बात यह है कि ये नियम सिर्फ ईयू (यूरोपीय संघ) को भेजे जाने वाले खाद्य पदार्थों के लिए ही नहीं हैं,बल्कि भारत में बिकने वाले मांस, दूध, अंडे, शहद और मछली पर भी लागू होंगे। इससे हमारी सेहत की रक्षा होगी।
यहां मुद्दा सिर्फ एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नहीं है। सवाल जो भोजन हम ग्रहण करते हैं उसकी सुरक्षा से भी जुड़ा है। हमें कीटनाशक अवशेषों, खाद्य योजकों और अन्य विषाक्त पदार्थों के लिए कड़े मानकों की जरूरत है। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना नहीं कि भारत के खाद्य पदार्थ निर्यात के लिए बेहतर हों बल्कि सेहत की रक्षा के लिहाज से भी ऐसा करना आवश्यक है। संयुक्त राज्य खाद्य एवं दवा प्रशासन (यूएसएफडीए) के आयात-अस्वीकृति डेटाबेस पर एक नजर डालने से पता चलता है कि वर्ष 2024-25 में भारत से भेजे गए लगभग 2,700 खाद्य पदार्थों की खेप अमेरिका में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी गई। इनमें मसाले, चावल और दालें शामिल थीं जिन्हें अत्यधिक या वर्जित कीटनाशक अवशेषों के कारण रोका गया था।
इससे अगला सवाल उठता है। ये मानक कैसे लागू किए जाएं? आयात करने वाले देशों ने अधिकृत प्रयोगशालाओं और यहां तक कि अपनी सीमाओं पर गुणवत्ता और अवशेषों की जांच के आधार पर निगरानी प्रणालियां विकसित की हैं। ईयू की योजना अपने निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना है। इसके लिए वह हर खेप के साथ एक स्वास्थ्य प्रमाण पत्र की मांग करेगा जिसे खाद्य पदार्थ निर्यात करने वाली कंपनी के बजाय किसी सरकारी एजेंसी द्वारा जारी किया गया हो।
वह निर्यात करने वाले देशों में अंकेक्षण (ऑडिट) और सीमा की औचक जांच भी करेगा। यह तंत्र इस तरह बनाया गया है कि अगर कोई खाद्य वस्तु विश्लेषण जांच में असफल रहती है तो ‘रेड बटन’ दबाकर भौतिक जांच की संख्या बढ़ा दी जाती है। कई बार असफल होने पर गंभीर नतीजे हो सकते हैं। मगर उस भोजन एवं खाद्य पदार्थों का क्या जो निर्यात नहीं किए जाते हैं?
तीसरा सवाल यह है कि किसान एंटीबायोटिक्स या कीटनाशकों और अन्य विषाक्त पदार्थों का उपयोग किए बिना उत्पादन कैसे बढ़ा सकते हैं? अंततः यह केवल एक नियामक चुनौती नहीं है और इसके लिए खाद्य उत्पादन के तरीके में बदलाव की आवश्यकता है। किसान तीन उद्देश्यों के लिए एंटीबायोटिक का उपयोग करते हैं यानी पशुओं के विकास को बढ़ावा देने के लिए, स्वच्छता की कमी या पशुओं की अधिक संख्या के कारण होने वाली बीमारियां रोकने के लिए और फिर बीमारियों के उपचार के लिए।
अब किसानों को एंटीबायोटिक का उपयोग कर नहीं बल्कि पशुओं के प्रजनन और खाद्य उत्पादन की स्थितियों में सुधार कर बीमारियां रोकनी होंगी। राष्ट्रीय दुग्ध विकास बोर्ड (एनडीडीबी) ने किसानों के साथ मिलकर पशु स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा दिया है और दिखाया है कि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल घटाना संभव है। यही वह पारस्परिक लाभ है जिसकी हमें आज के दौर में सख्त जरूरत है।
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से जुड़ी हैं।)