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नेट-जीरो का लक्ष्य तो तय, लेकिन नक्शा गायब; स्टील-सीमेंट जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन घटाने की योजना अब भी अधूरी

क्षेत्रवार बदलाव की ठोस योजनाओं और उस बदलाव के लिए धन के बंदोबस्त के बिना कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य, बिना नक्शे के किसी मंजिल की ओर बढ़ने जैसा है

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जनक राज   
Last Updated- September 11, 2026 | 9:03 PM IST

दुनिया के 140 से ज्यादा देशों ने वर्ष 2050 से 2070 के बीच विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन (नेट-जीरो) का लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की है। इन देशों में दुनिया के करीब 90 फीसदी कार्बन उत्सर्जन वाले देश शामिल हैं। विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य तय करना आसान हिस्सा था। असली चुनौती अब यह है कि इन बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों को अलग-अलग क्षेत्रों और कंपनियों के लिए ठोस योजनाओं में कैसे बदला जाए। खासतौर पर उन आठ क्षेत्रों को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त करना सबसे मुश्किल है जहां उत्सर्जन कम करना आसान नहीं है।

इनमें स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम, रसायन, विमानन, जहाजरानी, ट्रक परिवहन और तेल एवं गैस क्षेत्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों के कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कटौती पर अभी अपेक्षाकृत कम चर्चा हो रही है।

अब तक कार्बन उत्सर्जन कम करने की कोशिशों में दो बातें साफ दिखाई देती हैं। पहली, नीतियों और निवेश का बड़ा हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव पर केंद्रित रहा है। दूसरी, इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे क्षेत्रों में बदलाव अभी सीमित है और इसका बड़ा हिस्सा चीन में ही देखने को मिलता है।

दूसरा, इसके मुकाबले उन आठ क्षेत्रों पर बहुत कम ध्यान दिया गया है जबकि इन्हें विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन की राह पर लाने के लिए बिजली क्षेत्र की तुलना में कहीं ज्यादा निवेश की जरूरत है। बिजली क्षेत्र में सौर, पवन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों का विकास काफी आगे बढ़ चुका है और इनकी लागत भी तेजी से कम हुई है।

दुनियाभर में इन आठ अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले क्षेत्रों को वर्ष 2050 तक विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए करीब 30 लाख करोड़ डॉलर के अतिरिक्त निवेश की जरूरत का अनुमान है। ये आठ क्षेत्र मिलकर दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 40 फीसदी हिस्सा पैदा करते हैं। इनमें स्टील और सीमेंट क्षेत्र सबसे बड़ी चुनौती हैं। दोनों ही ऊर्जा की बहुत ज्यादा खपत करते हैं। इसके अलावा इनके उत्पादन की रासायनिक प्रक्रियाओं के दौरान भी बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है।

स्टील और सीमेंट के क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कटौती के लिए कार्बन कैप्चर और भंडारण (सीसीएस) तथा हाइड्रोजन आधारित प्रक्रिया पर काफी निर्भर रहना पड़ेगा। लेकिन अभी ये तकनीकें महंगी हैं और बड़े पैमाने पर इनके इस्तेमाल का पर्याप्त अनुभव नहीं है। सीमेंट उद्योग की समस्या और भी जटिल है।

सीमेंट उत्पादन से निकलने वाले कार्बन डाई ऑक्साइड का करीब 60 फीसदी हिस्सा चूना पत्थर को गर्म करने की प्रक्रिया से पैदा होता है। यानी यह केवल ईंधन जलाने की वजह से नहीं निकलता। ऐसे में सस्ती गैस या ज्यादा अक्षय ऊर्जा उपलब्ध करा देने भर से सीमेंट उद्योग की यह समस्या हल नहीं होगी।

लक्ष्य और कदम के बीच संतुलन

यहीं पर क्षेत्रवार बदलाव की योजना (एसटीपी) की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ये योजनाएं किसी देश के जलवायु और विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को उद्योगों और कंपनियों की ठोस कार्रवाई से जोड़ने का काम करती हैं। इसमें यह बताया जाता है कि कब तक कितना उत्सर्जन कम करना है, किन तकनीकों और उत्पादन प्रक्रियाओं में बदलाव करना होगा और इसके लिए कितने निवेश की जरूरत होगी।

इसके साथ ही ऐसी योजना में सरकार से मिलने वाली जरूरी नीतिगत मदद की भी पहचान की जाती है। इन योजनाओं के बिना कार्बन उत्सर्जन को शून्य के करीब लाने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है।

भारत में नीति आयोग एसटीपी उत्सर्जन कम करने की दिशा और अलग-अलग क्षेत्रों के लिए जरूरी बदलावों का खाका देता है। लेकिन यह योजना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसमें हर संयंत्र के लिए यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कब तक कौन-सा बदलाव करना होगा। इसे लागू कराने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने की व्यवस्था भी नहीं है। यही वजह है कि कंपनियों को इस बदलाव के लिए जरूरी फंड जुटाने में दिक्कत आती है।

योजना से पूंजीगत खर्च तक

कंपनियों की बदलाव की योजनाएं यह बताती हैं कि कोई कारोबार अपनी रणनीति, काम करने के तरीके और बड़े निवेश को किस तरह बदलकर उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य के अनुरूप लाएगा। इन योजनाओं में यह तय किया जाता है कि कंपनी को क्या लक्ष्य हासिल करने हैं, कौन-सी तकनीक अपनानी है, फैसलों और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी होगी और अलग-अलग चरणों में कितने धन की जरूरत पड़ेगी।

दुनिया में अब अंतरराष्ट्रीय मानक, वर्गीकरण व्यवस्था और बहुपक्षीय विकास बैंक भी ऐसी योजनाओं के लिए स्पष्ट नियम और दिशा तय करने में मदद कर रहे हैं। हालांकि, इन बदलाव की योजनाओं को अपनाने की स्थिति हर देश में एक जैसी नहीं है। ब्रिटेन में करीब 66 फीसदी और यूरोपीय संघ में 59 फीसदी बड़ी कंपनियां अब अपनी बदलाव की योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक कर रही हैं। इसके पीछे वहां लागू नियमों और कंपनियों के लिए जानकारी सार्वजनिक करने की अनिवार्यता की बड़ी भूमिका है।

इसके उलट, भारत, चीन, इंडोनेशिया और ब्राजील मिलकर दुनिया के 60 फीसदी से ज्यादा स्टील और करीब 70 फीसदी सीमेंट का उत्पादन करते हैं।

इसके बावजूद इन देशों में अभी तक ऐसा कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी और निवेश के लिहाज से क्षेत्रवार बदलाव की भरोसेमंद योजना नहीं है जिसके आधार पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जा सके। कंपनियों के सर्वेक्षण भी इस कमी को उजागर करते हैं। ज्यादातर कंपनियों ने अभी यह तक तय नहीं किया है कि उत्सर्जन कम करने के लिए उन्हें कौन-कौन से ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसे में उनके लिए इसके लिए जरूरी बजट तय करना तो और भी दूर की बात है।

पूंजीगत खर्च से उत्सर्जन कम करने की दिशा

बदलाव के लिए मिलने वाला फंड उन कंपनियों और उद्योगों को मदद देता है, जिनसे अभी काफी ज्यादा उत्सर्जन होता है, लेकिन जो समय के साथ अपने कारोबार को कम-कार्बन वाला बनाने के लिए बड़े निवेश करना चाहते हैं। यह ग्रीन फाइनैंस से अलग है। ग्रीन फाइनैंस उन परियोजनाओं के लिए दिया जाता है जो पहले से ही कम-कार्बन उत्सर्जन वाली हैं, जैसे सौर ऊर्जा संयंत्र, पवन ऊर्जा परियोजनाएं और इलेक्ट्रिक वाहन।

अभी तक दुनिया में ग्रीन फाइनैंस पर ज्यादा जोर रहा है जबकि बदलाव से जुड़ी फंडिंग पर कम ध्यान दिया गया है। यही वजह है कि स्टील, सीमेंट और दूसरे ऐसे क्षेत्रों में बहुत कम पैसा पहुंच रहा है जहां उत्सर्जन कम करना सबसे मुश्किल है।

कई सर्वेक्षणों में निवेशकों ने कहा है कि इसके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट कंपनियों की व्यावहारिक और निवेश के लिहाज से भरोसेमंद बदलाव की योजनाओं का अभाव है। इन योजनाओं के बिना विशुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है क्योंकि जिन उद्योगों को सबसे ज्यादा बदलाव की जरूरत है, वहां जरूरी निवेश पहुंच ही नहीं पाएगा।

कैसी हो निवेश के लायक योजना?

स्वच्छ ऊर्जा में बदलाव के लिए वित्तपोषण आकर्षित करने के लिए दो चीजें सबसे जरूरी हैं। पहली, मुश्किल क्षेत्रों के लिए विस्तृत और भरोसेमंद क्षेत्रवार बदलाव की योजनाएं होनी चाहिए।

इनमें हर संयंत्र के लिए बदलाव की समय-सीमा, जरूरी बुनियादी ढांचा, सरकारी नीतियां और प्रोत्साहन तथा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों की जानकारी होनी चाहिए। फिलहाल ज्यादातर देशों में ऐसी क्षेत्रवार योजनाएं केवल दिशानिर्देश हैं, उन्हें लागू करना कानूनी रूप से जरूरी नहीं है। इसलिए निवेशकों को परियोजनाओं में पैसा लगाने के लिए जरूरी भरोसा नहीं मिल पाता।

दूसरी, इस तरह के निवेश के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए। मसलन, ऐसी परियोजनाओं के लिए एक मान्यता प्राप्त पहचान या लेबल होना चाहिए, जिन्हें बदलाव करने के लिए फंडिंग की जरूरत है। साथ ही यह भी साफ होना चाहिए कि किन परियोजनाओं को इस फंडिंग की श्रेणी में रखा जाएगा।

इसके अलावा, विकास बैंकों को कुछ जोखिम अपने ऊपर लेकर निजी बैंकों और निवेशकों को भी ऐसे क्षेत्रों में पैसा लगाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। कंपनियों की अपनी बदलाव की योजनाओं में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वे इसके लिए कितना पूंजीगत निवेश करेंगी।

दुनिया के ज्यादातर देशों ने कार्बन उत्सर्जन को शून्य के करीब लाने का लक्ष्य तो तय कर लिया है लेकिन इन लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए जरूरी विस्तृत क्षेत्रवार योजनाएं अब भी नहीं हैं। जब तक कानूनी रूप से मजबूत और निवेश के लिहाज से भरोसेमंद योजनाएं नहीं बनेंगी और बदलाव से जुड़ी फंडिंग के लिए नियम स्पष्ट नहीं होंगे तब तक जरूरी धन इन मुश्किल क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पाएगा।

सरल शब्दों में कहें तो विशुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य बिना क्षेत्रवार बदलाव की योजना के ऐसा है जैसे मंजिल तो तय हो, लेकिन वहां पहुंचने का नक्शा ही न हो। जो देश सबसे पहले भरोसेमंद क्षेत्रवार योजनाओं को निवेश करने योग्य बदलाव वाले फंड से जोड़ पाएंगे, वे स्टील, सीमेंट और दूसरे मुश्किल क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने की अगली बड़ी मुहिम में सबसे आगे रहेंगे।

(लेखक सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस, नई दिल्ली में वरिष्ठ अध्येता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : September 11, 2026 | 8:59 PM IST