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टाटा संस की लिस्टिंग पर इतना शोर क्यों? जानिए RBI के नए संशोधन का असली मतलब

सबसे पहले, जानें कि टाटा संस का स्वरूप क्या है? यह एक कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) है

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तमाल बंद्योपाध्याय   
Last Updated- July 09, 2026 | 10:15 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के किसी निर्देश को विभिन्न व्यापारिक समाचार पत्रों द्वारा इतनी अलग-अलग तरह से शायद ही कभी पढ़ा गया हो। यहां मैं आरबीआई (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां-पंजीकरण, छूट और पैमाने आधारित विनियमन के लिए ढांचा) द्वितीय संशोधन निर्देश 2026 की बात कर रहा हूं, जो 24 जून को जारी किया गया था।

एक अखबार की हेडलाइन में कहा गया कि केंद्रीय बैंक के निर्देश के बाद टाटा संस शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो सकती है। एक अन्य वित्तीय अखबार ने कहा कि संशोधन में उल्लिखित नए नियम टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से कुछ समय के लिए राहत दे सकते हैं। एक अन्य समाचार पत्र का कहना था कि आरबीआई के इस फरमान के बाद टाटा संस की लिस्टिंग अधर में लटक गई है। टाटा संस भारतीय बहुराष्ट्रीय समूह टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है।

सबसे पहले, जानें कि टाटा संस का स्वरूप क्या है? यह एक कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) है, यानी एक विशिष्ट गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) जिसका मुख्य व्यवसाय समूह की कंपनियों में निवेश/हिस्सेदारी रखना है। यह एनबीएफसी है, लेकिन होल्डिंग कंपनी है, और सीधे तौर पर जनता को ऋण देने या कभी-कभी जमा स्वीकार करने के एनबीएफसी व्यवसाय में शामिल नहीं है। 

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 में प्रमुख व्यावसायिक मानदंडों (पीबीसी) का उल्लेख है, लेकिन इसे परिभाषित करने का अधिकार नियामक को दिया गया है। पीबीसी को कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। आरबीआई को समय-समय पर इसे निर्धारित करने की छूट है। एनबीएफसी के लिए, आरबीआई ‘50:50 मानदंड’ का पालन करता है।

यदि किसी कंपनी की वित्तीय परिसंपत्तियां कुल परिसंपत्तियों का कम से कम 50 फीसदी हैं और ऐसी परिसंपत्तियों से होने वाली आय उसकी सकल आय का कम से कम 50 फीसदी है, तो वह एक एनबीएफसी है। हालांकि, आरबीआई ने एनबीएफसी के लिए न्यूनतम शुद्ध स्वामित्व निधि (एनओएफ) की आवश्यकता को चरणबद्ध तरीके से 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दिया है। मौजूदा एनबीएफसी को 31 मार्च, 2027 तक अपनी निधि को नई सीमा तक बढ़ाने का समय दिया गया है, जबकि नए प्रवेशकों को शुरुआत से ही इस आवश्यकता को पूरा करना होगा।

सीआईसी एक गैर-संचालित होल्डिंग कंपनी होती है जिसकी आय का प्राथमिक स्रोत समूह कंपनियों से अर्जित लाभांश और ब्याज है। इसकी अपनी पूंजी और भंडार होते हैं, लेकिन चूंकि यह समूह कंपनियों में निवेश करती है और उन्हें ऋण देती है, इसलिए इसकी शुद्ध परिसंपत्ति ऋणात्मक हो सकती है। यही कारण है कि सीआईसी के लिए, आरबीआई समायोजित शुद्ध परिसंपत्ति के मानदंड का पालन करता है।

पीबीसी के संदर्भ में, सीआईसी के लिए मानक अनुपात 90:60 है। इक्विटी शेयर, प्रेफरेंस शेयर, बॉन्ड, डिबेंचर, ऋण या लोन के रूप में निवेश के तौर पर समूह कंपनियों में सीआईसी की हिस्सेदारी उसकी कुल परिसंपत्ति का कम से कम 90 फीसदी होनी चाहिए। इसमें से समूह कंपनियों के इक्विटी शेयरों में उसका निवेश उसकी कुल परिसंपत्ति का कम से कम 60 फीसदी होना चाहिए।

यदि कोई सीआईसी इन मानदंडों को पूरा करने में विफल रहती है, तो वह एक सामान्य एनबीएफसी बन जाती है। नियामक दिशानिर्देशों के अनुसार, एनबीएफसी के लिए न्यूनतम पूंजी पर्याप्तता अनुपात (सीएआर) 15फीसदी है। यह विवेकपूर्ण विनियमन सभी सीआईसी पर लागू नहीं होता है। लेकिन, एक ‘प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण’ सीआईसी को अपनी कुल जोखिम भारित परिसंपत्तियों और बैलेंस शीट से बाहर के मदों के न्यूनतम 30 फीसदी के बराबर समायोजित शुद्ध संपत्ति बनाए रखना आवश्यक है।  अंततः, आरबीआई के मास्टर सर्कुलर के अनुसार, एक सीआईसी अपनी समायोजित शुद्ध परिसंपत्ति के 2.5 गुना तक बाजार से ऋण ले सकती है। 

आरबीआई के 24 जून के निर्देश के माध्यम से ऊपरी स्तर के वर्गीकरण मानदंडों में संशोधन किया गया। अब यह केवल परिसंपत्ति के आकार से जुड़ा है। इसकी सीमा 1 लाख करोड़ रुपये है। वर्गीकरण मानदंड में बदलाव हुआ है, ऊपरी स्तर की एनबीएफसी पर लागू होने वाले विवेकपूर्ण विनियमन में नहीं। ऐसी एनबीएफसी के लिए लिस्टिंग मानदंडों में कोई संशोधन नहीं किया गया है। इसी ढांचे में यह भी उल्लेख किया गया है कि जो एनबीएफसी ‘सार्वजनिक निधियों’ का उपयोग नहीं करते और जिनका ‘ग्राहक संपर्क’ नहीं होता, उनकी जोखिम प्रोफाइल भिन्न होती है और इसलिए उन्हें अलग नियामक व्यवहार की आवश्यकता होती है। इन्हें टाइप 1 एनबीएफसी कहा जाता है। 

संयोगवश, जून के निर्देश से पहले, 29 अप्रैल को, टाइप 1 एनबीएफसी के लिए एक नया नियामक ढांचा निर्धारित किया गया था (जो 1 जुलाई से लागू हुआ)। ‘अपंजीकृत सीआईसी’ की अवधारणा की तरह, इस ढांचे में ‘अपंजीकृत टाइप 1 एनबीएफसी ‘ की अवधारणा भी शामिल की गई है। दोनों को आरबीआई के साथ पंजीकरण से छूट दी गई है, बशर्ते कि वे सार्वजनिक धन न लें और उनका ग्राहकों से कोई सीधा संबंध न हो।

सार्वजनिक निधियों में सार्वजनिक जमा, वाणिज्यिक पत्र, डिबेंचर, अंतर-कॉरपोरेट जमा और बैंक वित्त के माध्यम से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुटाई गई निधियां शामिल हैं। इनमें 10 वर्षों के भीतर अनिवार्य रूप से इक्विटी शेयरों में परिवर्तनीय साधनों के निर्गम द्वारा जुटाई गई निधियां शामिल नहीं हैं। और, ग्राहक संपर्क का अर्थ है व्यवसाय संचालन के दौरान एनबीएफसी और उसके ग्राहकों के बीच होने वाली बातचीत। टाइप 1 एनबीएफसी और सीआईसी दोनों को ही आरबीआई पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। इस मामले में कुछ भी नहीं बदला है। टाइप 1 के लिए, पंजीकरण हेतु संपत्ति का आकार 1,000 करोड़ रुपये होना अनिवार्य है (29 अप्रैल को अधिसूचित)। 24 जून के निर्देश में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसी प्रकार, जून के निर्देश में ‘अपंजीकृत सीआईसी’ के बारे में भी कोई बदलाव नहीं हुआ है।

मेरे तर्क का मुख्य बिंदु यह है कि पंजीकरण, छूट और पैमाने-आधारित विनियमों के ढांचे में दूसरे संशोधन से संबंधित 24 जून का निर्देश, पैमाने-आधारित विनियमन के तहत उच्च स्तरीय गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए संशोधित पात्रता मानदंडों से संबंधित है। आरबीआई द्वारा 29 अप्रैल को जारी संशोधन निर्देशों में उल्लिखित सार्वजनिक निधियों का संदर्भ और उसकी परिभाषा, या 24 जून के निर्देश से उसका हटाया जाना, टाटा संस से संबंधित प्रतीत नहीं होता है।

संक्षेप में, टाटा संस पंजीकृत हो या अपंजीकृत, एक सीआईसी ही बनी रहेगी। उसे 90:60 के सिद्धांत का पालन करना होगा। यदि यह उच्च श्रेणी में आती है, तो सार्वजनिक लिस्टिंग इसके लिए आवश्यक नियामक शर्तों में से एक होगी। हालांकि, यदि यह ‘अपंजीकृत सीआईसी’ की श्रेणी में आती है, तो यह विवेकपूर्ण विनियमन से मुक्त रहेगी।

First Published : July 9, 2026 | 10:14 PM IST