इलेस्ट्रेशन: अजय मोहंती
पिछले कई दशकों में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) ने ग्रामीण वित्त की तस्वीर बदल दी है। इस आंदोलन ने कई पुरानी धारणाओं को चुनौती दी। उसने यह दिखाया कि यदि अनौपचारिक लेनदेन की अच्छी बातों को समझकर और अलग तरीके की सोच के साथ उन्हें एक व्यवस्थित रूप दिया जाए तो एक सफल वित्तीय व्यवस्था बनाई जा सकती है। अब नीतिगत सवाल यह है कि क्या हमें जमीनी स्तर से विकसित हो रही इस व्यवस्था को स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ने देना चाहिए या फिर उसे तेजी से बढ़ाने के लिए बाहर से अतिरिक्त सहारा देना चाहिए?
स्वयं सहायता समूह आंदोलन की शुरुआत बचत से हुई थी। ग्रामीण वित्त व्यवस्था में उस समय यह एक अलग तरह की पहल थी क्योंकि इसमें शुरुआत से ही ऋण को सामूहिक तौर पर केंद्र में नहीं रखा गया। इसके बजाय लोगों को पहले छोटी-छोटी रकम बचाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस आंदोलन का खास लक्ष्य ग्रामीण गरीब महिलाएं थीं। इससे उस पारंपरिक सोच को भी चुनौती मिली जिसमें माना जाता था कि परिवार का मुखिया गरीबी दूर करने वाली योजनाओं के केंद्र में होना चाहिए जो आमतौर पर पुरुष होता है।
कुछ लोग इसकी वजह यह बता सकते हैं कि महिलाएं परिवार की देखभाल करती हैं और इसलिए उनमें स्वाभाविक रूप से बचत करने की प्रवृत्ति अधिक होती है। लेकिन बात केवल इतनी नहीं है। इस कार्यक्रम की बनावट को देखें तो यह मूल रूप से एक अच्छे वित्तीय उत्पाद की डिजाइन का मामला था।
महिलाएं नियमित रूप से छोटी और निश्चित रकम बचाती थीं। यह रकम हर सप्ताह या हर महीने जमा की जाती थी और यह इस बात पर निर्भर करता था कि स्वयं सहायता समूह कैसे बनाया गया है। एक तय दिन समूह की बैठक होती और सभी सदस्य अपनी बचत वहां जमा करतीं। बैठक ऐसी खुली और नजदीकी जगह पर होती थी, जहां महिलाओं के लिए पहुंचना आसान हो। अधिकांश समूह बचत पर कोई ब्याज नहीं देते थे। फिर भी महिलाएं पैसे जमा करती थीं क्योंकि वे अपनी थोड़ी-सी रकम सुरक्षित और भरोसेमंद जगह पर रखना चाहती थीं।
लेकिन बचत ही इस व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य नहीं था। समूह में जमा रकम को उन सदस्यों को ऋण के रूप में दिया जाने लगा जिन्हें तत्काल पैसों की जरूरत होती थी। इस ऋण पर समूह ब्याज लेता था। ब्याज की दर आम तौर पर स्थानीय अनौपचारिक ऋण बाजार की दरों के आसपास रखी जाती थी ताकि ब्याज दर में बहुत ज्यादा अंतर का फायदा उठाकर कोई अनुचित लाभ न उठा सके। इस व्यवस्था की एक खास बात यह थी कि ब्याज की दरें महिलाओं की समझ के अनुसार स्थानीय भाषा और तरीके से बताई जाती थीं।
इस तरह स्वयं सहायता समूह एक तरह का छोटा स्थानीय बैंक बन गया था। समूह में जमा होने वाली अतिरिक्त राशि को हर साल दीवाली और दशहरे जैसे त्योहारों पर सदस्यों के बीच उपहार के रूप में बांटा जाता था। इससे वित्तीय व्यवस्था स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से भी जुड़ी रहती थी।
इसके बाद अगला स्वाभाविक कदम था कि समूह की जमा बचत को आधार बनाकर उसे बैंक से जोड़ा जाए और समूह के लिए बैंक ऋण लिया जाए। जैसे-जैसे समूह मजबूत और व्यवस्थित होते गए, उनका औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जुड़ना भी शुरू हुआ। लेकिन स्वयं सहायता समूह की इस मूल भावना को व्यापक रूप से समझने के बजाय, सरकार और व्यवस्था ने धीरे-धीरे इसे गरीबी दूर करने और आजीविका बढ़ाने के पुराने तरीके से जोड़ दिया। समूहों को अनुदान के रूप में पैसा दिया जाने लगा, जिसे वे आगे सदस्यों को सस्ते ऋण के रूप में दें। साथ ही, समूहों को अधिक से अधिक बाहरी ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसका एक अनपेक्षित परिणाम सामने आया। कई समूहों और उनके सामुदायिक संगठनों के पास आज बड़ी मात्रा में निष्क्रिय नकदी पड़ी है जबकि उनके सदस्य ऋण नहीं ले पा रहे हैं।
स्वयं सहायता समूह आंदोलन वास्तव में बैंकिंग व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा अवसर था। बैंक इन समूहों को अपने साथ जोड़कर छोटे-छोटे बचतकर्ताओं और उधार लेने वालों को एक साथ संगठित कर सकते थे। इससे बैंक अपनी पूरी वित्तीय व्यवस्था में समूहों की सामूहिक ताकत और कम लागत वाली पहुंच का फायदा उठा सकते थे।
जब भी गरीब लोगों की छोटी-छोटी बचत की बात होती है, तो अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इतनी छोटी रकम के साथ बड़े बैंकों के लिए काम करना आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं है। यहीं पर हमें अनौपचारिक वित्तीय व्यवस्थाओं से सीखने की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे सूक्ष्म ऋण ने अनौपचारिक व्यवस्था से कई बातें सीखीं। हमें यह समझना होगा कि समस्या वास्तव में कहां है और फिर उसका व्यावहारिक समाधान खोजना होगा। इसके बजाय यह मान लेना कि गरीब ग्राहक खुद अपने हित को नहीं समझते और उनके लिए फैसले हमें लेने चाहिए यह वास्तव में एक संरक्षकवादी सोच है। ग्राहक पढ़-लिख न पाए हों, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वे समझदार नहीं हैं। वे अपनी जरूरतों, पैसों और जोखिमों को अच्छी तरह समझते हैं।
गरीब लोग वित्तीय उत्पादों की असल उपयोगिता को समझते हैं। उन्हें इस बात से बहुत फर्क नहीं पड़ता कि मौद्रिक नीति में ब्याज दर बदलने के बाद उनके बचत खाते की ब्याज दर में कुछ आधार अंक यानी कुछ मामूली बदलाव हुआ या नहीं। उनके लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि पैसा जमा करना कितना आसान है, सेवाओं तक उनकी पहुंच कितनी करीब है और जरूरत पड़ने पर लेनदेन कितनी आसानी से हो सकता है।
गरीबों की बचत को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ते समय भी इसी तरह का नजरिया अपनाना चाहिए। अनौपचारिक बचत व्यवस्थाओं को देखें तो गरीब आम तौर पर ज्यादा रिटर्न की तलाश में नहीं रहते। वे चाहते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित रहे, पास में रहे और उसे जमा करना या निकालना आसान हो। कई मामलों में तो वे अपनी बचत को सुरक्षित रखने के लिए इसके बदले कुछ पैसे देने को भी तैयार रहते हैं। ऐसे में नीति-निर्माता छोटे और नियमित बचत खातों के लिए कम ब्याज दर की व्यवस्था पर भी प्रयोग कर सकते हैं। इससे वित्तीय संस्थानों की लागत कम हो सकती है और गरीब लोगों के लिए बचत की सुविधा बढ़ाई जा सकती है। असली समाधान ज्यादा ब्याज देने में नहीं, बल्कि बचत तक आसान पहुंच उपलब्ध कराने में हो सकता है।
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में एक स्वयं सहायता समूह ने बचत को बीमा से जोड़ने का एक दिलचस्प प्रयोग किया। अनंतपुर के इस समूह ने एक बीमा एजेंट की मदद ली और सदस्यों के लिए लंबी अवधि की ऐसी बीमा पॉलिसी ली, जिसमें पॉलिसी की अवधि के दौरान कोई अनहोनी न होने पर जमा किया गया पैसा वापस मिलना था। लेकिन इसमें एक समस्या थी। बीमा कंपनी समूह को मासिक प्रीमियम जमा करने की सुविधा नहीं देना चाहती थी क्योंकि समूह छोटा था और बीमा की रकम भी कम थी। समूह ने इसका एक सरल समाधान निकाला। सभी सदस्यों को सालाना प्रीमियम वाली पॉलिसी में शामिल कर दिया गया। हर सदस्य को सालाना प्रीमियम भरने के लिए ब्याज-मुक्त ऋण दिया गया। इस तरह स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के लिए सालाना प्रीमियम व्यावहारिक स्तर पर मासिक भुगतान जैसा हो गया। प्रीमियम का आधा हिस्सा समूह के अपने फंड से दिया गया जो पैसा वास्तव में समूह ने समय के साथ बचत और मुनाफे से जमा किया था।
यह उदाहरण बताता है कि यदि अंतिम व्यक्ति तक वित्तीय सेवा पहुंचाने के तरीके में थोड़ी रचनात्मकता दिखाई जाए तो छोटी रकम और कम ग्राहक संख्या की समस्या को भी दूर किया जा सकता है। अब समय आ गया है कि नीति-निर्माता और वित्तीय बाजार यह तर्क देना बंद करें कि गरीबों के लिए बचत योजनाएं आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं हैं। इसी तरह वित्तीय साक्षरता और सशक्तीकरण के नाम पर गरीबों को लगातार यह समझाना भी बंद होना चाहिए कि उन्हें अपने पैसे के बारे में क्या करना चाहिए। जरूरत है कि पहले उचित वित्तीय योजना का डिजाइन तैयार किया जाए। अगर योजना उनकी जरूरत, आय और व्यवहार के अनुकूल होगी तो गरीब लोग खुद उसकी उपयोगिता समझ लेंगे।
समस्या यह नहीं है कि गरीब बचत नहीं कर सकते। समस्या यह है कि वित्तीय सेवा देने वाले उनकी जरूरत को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। अब जरूरत है कि इस विषय पर बातचीत आगे बढ़े और ये बातचीत किसी ठोस, व्यावहारिक और लागू की जा सकने वाली पहल में बदले।
(लेखक, सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी, भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलूरु में प्रोफेसर हैं)